| संपत्ति नीलामी की अतिरिक्त रकम मालिक को लौटाएं: सर्वोच्च न्यायालय | | बीएस संवाददाता / June 03, 2012 | | | | |
संपत्ति नीलामी की अतिरिक्त रकम मालिक को लौटाएं: सर्वोच्च न्यायालययदि सार्वजनिक वसूली के लिए किसी संपत्ति की नीलामी से बकाया रकम से ज्यादा पैसा मिलता है तो शेष धनराशि संपत्ति के मालिक को लौटा दी जानी चाहिए। ऐसा करने में विफल रहने पर नीलामी के जरिये बिक्री की पूरी प्रक्रिया अवैध मानी जाएगी। 'राम किशन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसे में सभी परिणामी कार्यवाही खारिज की जा सकती है। इस मामले में एक व्यक्ति ने यूनियन बैंक ऑफ इंडिया से कृषि ऋण लिया था, जिसे वह नहीं चुका पाया था। इसकी वसूली के लिए बैंक ने एक गारंटर के खिलाफ कार्यवाही शुरू की। लेकिन वह भी बकाया रकम नहीं चुका पाया, इसलिए उसकी जमीन की नीलामी की गई। इस तरीके से प्राप्त रकम बकाया राशि से तीन गुनी ठहरी। लेकिन शेष रकम का भुगतान जमीन के मालिक को नहीं किया गया। इस वजह से न्यायालय ने कहा कि नीलामी गैर-कानूनी थी। लेकिन खरीदार के कब्जे में वह जमीन तकरीबन दो दशक से है, जब से मुकदमा शुरू हुआ था। लिहाजा उसने जमीन विकसित कर ली थी। इसलिए अदालत जमीन खरीदने वाले व्यक्ति को परेशान नहीं करना चाहती थी, लेकिन जमीन के मूल मालिक को अतिरिक्त रकम की वापसी के लिए कलेक्टर के पास आवेदन करने की अनुमति दे दी।
भ्रष्टाचार पर सख्ती
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि यदि रिश्वत की रकम बहुत कम हो तब भी इस मामले में 18 साल बाद माफी नहीं दी जा सकती क्योंकि 'भ्रष्टाचार राष्ट्र को बहुत क्षति पहुंचाता है और अंतत: अर्थव्यवस्था को कमजोर करता है।' इस मामले में भावनगर शहर सर्वेक्षण कार्यालय के दो अधिकारियों ने संपत्ति का रिकॉर्ड मांगने वाले एक व्यक्ति से 50 रुपये की रिश्वत मांगी थी। उन्हें भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया और छह महीनों के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। गुजरात उच्च न्यायाल और सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी अपील खारिज कर दी। 'नरेंद्र त्रिवेदी बनाम गुजरात राज्य' मामले में अदालत ने कहा, 'किसी भी स्तर का भ्रष्टाचार उदारता और सहानुभूति के लायक नहीं होता।'
कर कटौती
दिल्ली उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह एक अमेरिकी कंपनी जोशी टेक्नोलॉजीज इंटरनैशनल इंक की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसके तहत आयकर अधिनियम 1961 की धारा 42 के तहत मिलने वाले लाभ का दावा किया गया था। यह दावा गुजरात के ढोल्का और वावेल स्थित तेल क्षेत्रों में दो उत्पादन शेयरिंग अनुबंधों (पीएससी) से संबंधित था। आयकर अधिनियम की धारा 42 में सरकार के साथ अनुबंध के तहत कच्चे तेल के लिए सर्वेक्षण जैसे काम के मामलों में कर कटौती के प्रावधान हैं। ऐसे अनुबंध को संसद के पटल पर रखा जाना चाहिए, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया था। कर कटौती के लिए कंपनी के दावे को वर्ष 2002 में स्वीकार कर लिया गया था, लेकिन वर्ष 2005 में राजस्व अधिकारियों ने कहा कि कंपनी को गलती से कर कटौती का लाभ दे दिया गया था, लिहाजा कुछ अतिरिक्त रकम के साथ कर की मांग की गई। इस पर कंपनी ने दलील दी कि यदि अनुबंध को संसद के पटल पर नहीं रखा गया, तो इसमें उसकी कोई गलती नहीं थी। कंपनी ने यह तर्क भी दिया कि उसे 1 जनवरी, 1999 में नई खोज लाइसेंस नीति (नेल्प) की शुरुआत होने से पहले कई तेल क्षेत्रों की 216 पीएससी के लिए लाभ दिए गए थे। उच्च न्यायालय ने इन दलीलों को खारिज कर दिया और कहा कि नियमों एवं शर्तों के साथ पेट्रोलियम मंत्रालय के नोट के मुताबिक आयकर की धारा 42 के तहत कोई भी लाभ देने की बात नहीं कही गई थी।
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