| बेहद जरूरी है फसल उत्पादन का समुचित आकलन | | सुरिंदर सूद / May 01, 2012 | | | | |
कृषि मंत्रालय के फसल उत्पादन अनुमान के लिए प्रयुक्त होने वाले शब्द 'अग्रिम अनुमान' में भरोसे की कमी लगती है। पहले अग्रिम अनुमान और अंतिम अनुमान में भारी अंतर का बचाव नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त फसल के रकबे और संभावित उत्पादन के आकलन का मौजूदा तंत्र शुरुआती अनुमान लगाने में अक्षम है जो नियोजन और नीति निर्माण के लिहाज से बेहद अहम है। इसके अलावा उपग्रह आधारित रिमोट सेंसिंग तकनीक जैसी आधुनिक तकनीक भी अनुपयोगी बनी हुई है।
कमजोर नीतियां कृषि जिंसों के आयात, निर्यात, आंतरिक व्यापार और भंडारण को प्रभावित करती हैं क्योंकि फसल उत्पादन का गलत अनुमान निरपवाद रूप से बाजार को विकृत करता है और उत्पादक, व्यापारियों और उपभोक्ताओं के लिए समस्या खड़ी करता है। कपास, गन्ना और तिलहन जैसी व्यावसायिक नकदी फसलों के मामले में तो यह बहुत होता है जहां आधिकारिक अनुमान आमतौर पर व्यापारिक और उद्योग जगत के अनुमान से काफी अलग होता है। इस मामले में सरकार द्वारा कपास के निर्यात पर प्रतिबंध का मामला भी आता है। इसे लेकर मचे राजनैतिक बवाल और कपास किसानों द्वारा किए गए हो-हल्ले के बाद ही दोबारा समीक्षा की गई।
निश्चित रूप से कृषि भवन फसल अनुमान की गुणवत्ता सुधार करने की दिशा में बेपरवाह नहीं है। हालांकि यह फसलों से संबंधित जानकारियों के लिए राज्यों पर हद से ज्यादा निर्भर है और इसमें तकनीकी कमी की वजह से इन जानकारियों की सत्यता संदिग्ध होती है जो इस मामले में बड़ा अवरोध बन जाती हैं। यह शायद सुनने में अद्भुत लग सकता है लेकिन तथ्य यही है फसल उत्पादन का पहला अनुमान फसल की बुआई के बाद ही लगाया जाता है जो संभावित आपूर्ति परिदृश्य का शुरुआती संकेतक होता है। यह मुख्य रूप से राज्यों के कृषि विभागों के कर्मचारियों द्वारा जमीनी स्तर पर किए गए 'प्रत्यक्ष अवलोकन' के आधार पर ही किया जाता है। इसका बदतर पहलू यही है कि ये प्रत्यक्ष अवलोकन हमेशा जमीनी स्तर पर नहीं किया जाता, कई मौकों पर सुनी-सुनाई जानकारियों के आधार पर ही इसे निपटाया जाता है।
वास्तव में फसल अनुमान और सूखा निगरानी के लिए अंतरिक्ष तकनीक की जरूरत वर्ष 1987 में मॉनसून के जबरदस्त दगा देने के बाद महसूस की गई जिसमें भारी पैमाने पर फसल का नुकसान हुआ और मवेशी मारे गए। हालांकि रिमोट सेंसिंग के जरिये फसल की स्थिति और रकबे का अनुमान लगाने की उपयुक्त विधियां और सॉफ्टवेयर पैकेजों का अभाव है। इसके अलावा रिमोट सेंसिंग की एक और सीमा है कि इसके जरिये विस्तृत जानकारी के लिए उपग्रह से चित्र लिए जाने की जरूरत होती है जिसके लिए फसल का जमीन से एक निश्चित स्तर तक ऊपर उठना जरूरी है, इसलिए यह तकनीक बुआई के स्तर पर फसल का अनुमान लगा पाने में कम मददगार होती है। उसके लिए अर्थमितीय और कृषि-वायुमंडलीय मॉडल की जरूरत होती है। ये मॉडल उन तमाम पहलुओं को समाहित कर सकते हैं जो किसानों के फैसले पर असर डालते हैं। मसलन पिछले साल फसल का रकबा और उत्पादन, पुरानी और मौजूदा बाजार दरों और चालू सत्र के मौसम का पूर्वानुमान।
इसलिए वर्ष 2006 में एक नया कार्यक्रम शुरू किया गया। यह ऐसा तंत्र है जो विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारियों को मिश्रित करता है जिसमें जमीनी स्तर के आंकड़ों और रिमोट सेंसिंग की जानकारियों का आकलन किया जाता है जिससे फसल अनुमान का समयबद्घ उचित आकलन पेश किया जा सके। 'फोरकास्टिंग एग्रीकल्चरल आउटपुट यूजिंग स्पेस, एग्रो-मेटेरोलॉजिकल ऐंड लैंड-बेस्ड ऑब्जर्वेशंस अंतरिक्ष, कृषि-वायुमंडलीय और जमीनी अवलोकन के आधार पर फसल उत्पादन का आकलन (फसल)' फसल अनुमान के लिहाज से एक विश्वसनीय तंत्र के रूप में उभर रहा है। फसल के रिमोट सेंसिंग तत्व का प्रबंधन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अहमदाबाद स्थित स्पेस ऐप्लीकेशन सेंटर द्वारा किया जाता है। इसके अलावा इसरो का हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय रिमोट सेंङ्क्षसग केंद्र भी 'राष्ट्रीय कृषि सूखा अनुमान और निगरानी तंत्र (नैडमैस)' को संचालित करता है। यह तंत्र 13 प्रमुख कृषि राज्यों में जिला और तहसील स्तर पर सूखे की भयावहता और व्यापकता से जुड़ी समयबद्घ जानकारी मुहैया कराने के लिए बनाया गया है। यह रिसोर्ससैट-1, आईआरएस 1सी और आईआरएस 1डी जैसे उपग्रहों के अत्याधुनिक व्यापक-क्षेत्रीय सेंसरों के जरिये सूखे की हर पखवाड़े रिपोर्ट तैयार करता है।
फसल और नैडमैस दोनों ही जरूरी विधियों को विकसित करने के बाद ही परिचालन स्तर पर पहुंच पाए हैं, अब इनका विलय कर उसका नियंत्रण नव स्थापित राष्ट्रीय फसल अनुमान केंद्र (एनसीएफसी) को दे दिया गया है। यह केंद्र नई दिल्ली स्थित पूसा संस्थान परिसर में है और कहा जा रहा है कि यह पर्याप्त छवि-प्रसंस्करण सुविधाओं, प्रयोगशालाओं और सॉफ्टवेयरों से लैस है। दिलचस्प बात यह है कि एनसीएफसी का नाम भारतीय सांख्यिकी संस्थान के संस्थापक और प्रख्यात भारतीय सांख्यिकीविद् पी सी महालनोबिस के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने फसल अनुमान का आकलन करने के लिए तरीके ईजाद करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। एनसीएफसी खरीफ सत्र के दौरान प्रमुख 11 फसलों के लिए फसल अनुमान और सूखे की सूचना देने के लिए तैयार है। बाद में इसमें और फसलों को भी जोड़ा जाएगा। यदि एनसीएफसी इसरो और मौसम विभाग सहित विभिन्न स्रोतों से जुटाई गई जानकारी के आधार पर फसल संबंधी जानकारियों को कौशल के साथ क्रमवार तरीके से पेश करता है, जो बुआई से पहले विश्वसनीय बन पाएं, तो यह बेहद उपयोग साबित होगा।
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