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अनुशासन आवश्यक
संपादकीय /  March 27, 2012

बीते दो दशकों के दौरान विनिवेश सरकार के एजेंडे में शामिल रहा है लेकिन इसका उद्देश्य विकृत हो चुका है। पहली बार जब सरकारी कंपनी में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी बेचने का सुझाव आया था और इस पर अमल किया गया था तब इसका मुख्य मकसद उनकी क्षमता में सुधार करना था। तर्क दिया गया था कि विनिवेश से इनके परिचालन में अनुशासन आएगा। किसी सरकारी कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्घ करने का मतलब था कि वह बाजार के नियमों से चलेगी और सरकार उसकी कमान संभालने के बजाय एक ऐसी हिस्सेदार भर रह जाएगी जिसके हाथों में उसका नियंत्रण होगा। लेकिन अब विनिवेश को सरकारी खजाने के लिए संसाधन जुटाने का एक जरिया भर समझा जा रहा है। इस प्रक्रिया में नुकसान कंपनियों को उठाना पड़ रहा है। अपने रोजमर्रा के काम में उनको आज भी सरकार के निर्देशों का पालन करना पड़ता है और अब तक इस प्रक्रिया में बदलाव के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया गया है। बीते दो सप्ताह के दौरान ब्रिटेन के हेज फंड 'द चिल्ड्रंस इन्वेस्टमेंट फंड (टीसीआई)' ने कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) को चलाए जाने के तरीके के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। उसका ध्यान सरकार निर्देशित उस नीति पर है जिसके तहत कोयले को अंतरराष्ट्रीय बाजार के मुकाबले कम दर पर बेचा जा रहा है। टीसीआई का तर्क है कि सीआईएल में दूसरा बड़ा साझेदार (1.01 फीसदी हिस्सा) होने के नाते एक अल्प हिस्सेदारी वाले अंशधारक के बतौर उसके अधिकारों की बहुलांश धारक यानी केंद्र अनदेखी कर रहा है। टीसीआई के मुताबिक सरकार को अधिक मूल्य वसूल करना चाहिए जबकि वह ऐसा नहीं कर रही है। उसने डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यूकोल4इंडियाडॉटकॉम नामक एक वेबसाइट बनाई है, जहां वह जन समर्थन जुटा रहा है। उसने सरकार को लिखा है कि वह सीआईएल के बोर्ड जिसे उसने 'बोर्ड ऑफ शेम' का नाम दिया है, को बदल डाले। उसने सीआईएल के निदेशकों पर मुकदमा करने की धमकी भी दी है। टीसीआई भारत की न्याय प्रक्रिया की धीमी गति को लेकर भी हतोत्साहित नहीं है। उसने घोषणा की है कि भारत और ब्रिटेन के बीच की द्विपक्षीय निवेश संधि के तहत वह भारत सरकार के खिलाफ कार्यवाही करेगा। हेज फंड का यह प्रयास अव्यावहारिक है और उसे असफलता हाथ लगेगी। सीआईएल का आरंभिक निर्गम ओवर सब्सक्राइब हुआ था और सरकार मान सकती है कि टीसीआई अपनी हिस्सेदारी बेच देगा लेकिन टीसीआई का इतिहास थोड़ा अलग है। इसी नाम से बच्चों की परोपकारी संस्था चलाने वाला हेज फंड लाभ का अधिकांश हिस्सा उसी को देता है। उसे कठोर अभियानों के लिए जाना जाता है। वह एबीएन एमरो के अलगाव का कारण बना, उसने डायचे बोर्स के सीईओ को इस्तीफा देने पर मजबूर किया और राजनीतिक विरोध के बीच मित्तल को आर्सेलर का अधिग्रहण करने में मदद की। अंशधारक की सक्रियता उसकी पहचान है और वह इस मामले से जल्द हटने वाला नहीं है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। भारत के अंशधारकों ने सूचीबद्घ सार्वजनिक उद्यमों में सरकारी कुप्रबंधन को सहज स्वीकार कर लिया है। यह समस्या यहीं  तक सीमित नहीं है। सरकारी कंपनियों खासतौर पर पेट्रोलियम क्षेत्र की कंपनियों को राजनीति प्रेरित मूल्य संबंधी निर्णयों के कारण काफी नुकसान सहना पड़ा है। उन्हें भी ऐसी सक्रियता की आवश्यकता है जिसके तहत सरकार को निवेशकों के हितों की अनदेखी करने का जिम्मेदार ठहराया जा सके। पीएसयू परिचालन में सुधार की सरकारी प्रतिबद्घता की गैर मौजूदगी में इस पर बाजार का अनुशासन लागू करना चाहिए।

Keyword: disinvestment, agenda, PSU,
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