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भावनाओं में बहकर निवेश संबंधी फैसले लेने से बचें निवेशक
जयदीप घोष /  12 25, 2011

एक वित्तीय योजनाकार के लिए सबसे विकट स्थिति तब पैदा हो जाती है जब निवेशक भावनात्मक कारण गिनाते हुए किसी कंपनी के शेयर या म्युचुअल फंड से बाहर निकलने से इनकार कर देता है। एक वित्तीय योजनाकार बताते हैं, 'ऐसे निवेशकों के लिए वित्तीय योजनाएं तैयार करना सबसे मुश्किल होता है। हम किसी दूसरी जगह पैसा लगाकर अधिक मुनाफा नहीं कमा पाते हैं क्योंकि निवेशक किसी खास शेयर या म्युचुअल फंड से मुनाफा कमाकर भी पैसा निकालने को तैयार ही नहीं होते हैं।'
इस कड़ी में वह अपने एक निवेशक का वाकया बताते हैं जिसने सालों में हिंदुस्तान यूनिलीवर के 50,000 शेयर जुटाए थे। निवेशक उन शेयरों को बस इस कारण से बेचने को तैयार नहीं था क्योंकि उसने इस कंपनी के पहले 200 शेयर अपनी पहली तनख्वाह से खरीदे थे। बेचने की बात को छोड़ ही दें, वह इन शेयरों को डीमैट में बदलने को भी तैयार नहीं था।
इस कंपनी के शेयरों को सुरक्षित रखने के लिए निवेशक ने एक सरकारी बैंक में दो लॉकर किराये पर ले रखे थे और शेयर के कागजात को एक लाल रंग के कपड़े (पुराने समय में महत्त्वपूर्ण दस्तावेज जैसे कि बहीखातों और भौतिक शेयरों को लाल कपड़े में लपेटकर रखा जाता था, क्योंकि लाल रंग शुभ माना जाता है) में लपेट कर रखा था। उनके बेटों और वित्तीय योजनाकार को इस बात की चिंता थी कि कहीं भौतिक शेयर किसी तरह नष्ट न हो जाएं। मगर उनका क्लाइंट अपनी बात से टस से मस होने को तैयार नहीं था।
यह तो बस एक उदाहरण भर है। निवेशक कई दूसरी वजहों से भी शेयर बेचने को तैयार नहीं होते हैं। इसी कड़ी में एक दूसरे निवेश योजनाकार बताते हैं, 'निवेशकों के पास कई भावनात्मक वजहें होती हैं। जैसे शेयरों में किया गया पहला निवेश, पहली तनख्वाह से लिए गए शेयर या फिर यह सोचना कि मेरे पिताजी ने दिए हैं। वित्तीय योजना तैयार करते वक्त इस तरह की कई समस्याएं सामने आती हैं।'
मगर शेयरों में निवेश करते वक्त एक सीधा सा फॉर्मूला ध्यान में रखना चाहिए कि जब कभी मोटा मुनाफा हाथ लगे तो शेयर बेचकर बाहर निकलने को तैयार रहें। वित्तीय योजनाकार बाहर निकलने की रणनीति के पीछे दो मुख्य वजहें गिनाते हैं। पहली रणनीति लक्ष्य आधारित व्यक्तिगत रणनीति हो सकती है या फिर निवेशक को अपने पोर्टफोलियो में बदलाव करना हो या फिर उसे तत्काल नकदी की जरूरत हो। वहीं दूसरी रणनीति शेयरों के प्रदर्शन से जुड़ी हो सकती है।
निवेशक किसी शेयर को बेचकर तब बाहर निकल सकते हैं जब उनका लक्ष्य नजदीक हो। उदाहरण के लिए आप सेवानिवृत्ति के समय मकान खरीदने या फिर बच्चों की पढ़ाई को ध्यान में रखकर निवेश कर रहे हैं जिसके लिए फिलहाल 10 साल का समय है। ऐसे में निश्चित तौर पर आप म्युचुअल फंड में निवेश करना चाहेंगे और बेहतर रिटर्न के लिए लार्ज कैप शेयरों को चुनेंगे। हालांकि जैसे जैसे आपका लक्ष्य नजदीक आता जाएगा, आपको अपना निवेश शेयर से निकालकर डेट में डालना होगा ताकि आपकी जमा रकम सुरक्षित बनी रहे। वित्तीय योजनाकार गौरव मशरूवाला बताते हैं, 'आदर्श स्थिति में आपको अपने लक्ष्य से 2 से 3 साल पहले ही अपना पैसा इक्विटी से निकालकर डेट में लगा देना चाहिए।'
कई बार आपको अपने पोर्टफोलियो को संतुलित बनाने के लिए इसमें बदलाव की भी जरूरत पड़ती है। इक्विटी और डेट के प्रदर्शन को देखते हुए ही निवेश आवंटन में बदलाव करना पड़ता है।
कई बार आपको अचानक से पैसों की जरूरत पड़ जाती है और तब भी आपको शेयर बेचकर निवेश से बाहर निकलना पड़ता है। ऐसे में निवेशक को काफी सोच समझकर फैसला लेना चाहिए। उसे यह देखना होगा कि किसी निवेश से हासिल रिटर्न कर मुक्त है या नहीं। ऐसे में अगर बहुत अधिक जरूरी न हो तो शेयरों से तब तक पैसा निकालने से बचें जब तक कि इनमें निवेश किए हुए एक साल न बीत चुका हो। अगर एक साल से पहले शेयरों से पैसे निकालते हैं तो आपको शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स भरने को तैयार रहना होगा।
अक्सर ऐसा भी देखने को मिलता है कि कुछ शेयर या म्युचुअल फंड योजनाएं लगातार खराब प्रदर्शन कर रहे होते हैं और तब आपको मजबूरन इन्हें बेचकर बाहर निकलना पड़ता है। कई बार म्युचुअल फंड योजनाएं अपनी प्रकृति के अनुरूप निवेश नहीं करतीं। जैसे एक लार्ज कैप फंड लगातार मिड कैप या स्मॉल कैप शेयरों में निवेश करता जाता है। ऐसे में उस फंड का प्रदर्शन प्रतिद्वंद्वी फंडों की तुलना में पिछड़ा रह जाता है।
मशरूवाला कहते हैं, 'आमतौर पर निवेशकों को उन योजनाओं को चुनना चाहिए जिनका करीब 8 से 10 साल पुराना रिकॉर्ड रहा है। इसके बाद निवेशकों को उस फंड को प्रदर्शन के लिए कम से कम 2 से 3 तिमाहियों का समय देना चाहिए। अगर फिर भी फंड का प्रदर्शन खराब ही रहता है तो फिर आगे उस फंड में और पैसे डालने का कोई मतलब नहीं है। लगातार 3 से 4 तिमाहियों तक खराब प्रदर्शन जारी रहता है तो उससे पैसे निकालना ही बेहतर रहेगा, चाहे नुकसान के साथ ही बाहर क्यों न निकलना पड़े।'

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