| महंगा उधार एसएमई को कर रहा बीमार | | बीएस संवाददाता / October 16, 2011 | | | | |
छोटे और मझोले उद्योगों को ऊंची दरों पर मिलने वाले कर्ज के चलते यह उद्योग घरेलू और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा की दौड़ के साथ-साथ विकास में भी पीछे रह जाता है। साथ ही महंगा कर्ज इन उद्योगों की बीमार होने का भी एक बहुत बड़ा कारण बनता जा रहा है।
ये बातें पीएचडी चैंबर द्वारा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, उत्तराखंड, पंजाब, चंडीगढ़ और दिल्ली के छोटे और मझोले उद्योगों के बीच कराए गये सर्वेक्षण के बाद सामने आई हैं।
सर्वेक्षण के मुताबिक लगभग 80 फीसदी एसएमई अपनी पूंजी जरूरतों के लिए बैंकों पर निर्भर करते हैं जबकि करीब 16 फीसदी का विश्वास परिवार जैसे आंतरिक स्रोतों पर है। ज्यादातर छोटे-मझोले उद्योगों का कहना है कि बैंकों से कर्ज लेना आसान काम नहीं है। करीब 55 फीसदी लोगों का कहना है कि गिरवी रखने के पर्याप्त साधनों की कमी भी बैंकों से ऋण लेने में एक बड़ी बाधा है। 17 फीसदी लोगों का कहना है कि दस्तावेजों की कमी के चलते बैंकों से उधार मिल पाने में देरी होती है जबकि 13 फीसदी लोग शिकायत करते हैं कि बैंकों से व्यक्तिगत संबंधों की कमी और परियोजना प्रस्तावों को स्वीकार न किये जाने की वजह से ऋण मिलने में दिक्कत होती है। लगभग 2 फीसदी लोगों का मानना है कि परियोजना प्रस्ताव में प्रवर्तकों की कम हिस्सेदारी के कारण भी बैंक उधार नहीं देना चाहते हैं। चैंबर का कहना है कि इन सभी प्रतिक्रियाओं से ऐसा लगता है कि बैंक
एसएमई क्षेत्र में नए कारोबार को ऋण देने का जोखिम नहीं लेना चाहते हैं।
ज्यादातर लोगों की बैंकों से सबसे पहली अपेक्षा यह है कि बैंक जल्द से जल्द ऋण प्रस्तावों को मंजूरी दें और उधारी सीमा (के्रडिट लिमिट) भी पर्याप्त हो। सर्वेक्षण के दौरान यह बात भी सामने आई कि बैंकों से ऋण मिलने में होने वाली देरी के चलते बीमार इकाइयों के पुनस्र्थापन में भी देरी होती है। साथ ही उद्यमों को दैनिक कामकाज में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
आम तौर पर बैंक ऋण देने से कतराते हैं जब तक कि कोई सरकारी योजना उन्हें इस बात के लिए बाध्य न करे। रकम मिलने में देरी के चलते एसएमई के बेहतर कर्मचारियों, नवीनतम मशीनों और सबसे उन्नत तकनीक इस्तेमाल करने की क्षमता पर असर पड़ता है। चैंबर ने सलाह दी है कि बैंकों को जोखिम कम करने के लिए व्यापारिक लेनदेन के बजाए ग्राहकों से संबंधों की ओर ध्यान देना चाहिए। परियोजना के एक बार ऋण के उपयुक्त साबित होने के बाद बैंकों को कर्ज देने में कोताही नहीं बरतनी चाहिए। ऋणदाताओं को एसएमई को कर्ज देते समय अपनी लंबी प्रक्रियाओं और अन्य नियमों में भी ढील देनी चाहिए। चैंबर ने सुझाव दिया है कि जमानत की उपलब्धता के बजाए ऋण की मंजूरी साफ-सुथरी बैलेंस शीट और सरकार को करों के नियमित भुगतान पर भी निर्भर होनी चाहिए।
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