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बीमा योजनाओं पर टेढ़ी नजर
नीलाद्रि भट्टाचार्य / मुंबई September 18, 2011

यूनिट-लिंक्ड बीमा योजनाओं (यूलिप) पर अपने अधिकारों का डंडा चलाने के बाद बीमा नियामक, बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) परंपरागत बीमा पॉलिसी को लेकर भी सख्त रवैया अख्तियार करने की तैयारी कर रहा है। नियामक चाहता है कि बीमा कंपनियां ऐसी पॉलिसी में मृत्यु लाभ को न्यायसंगत बनाए।
आईआरडीए से जुड़े सूत्रों के मुताबिक नियामक कुछ परंपरागत योजनाओं के साथ जुड़े कम जोखिम कवर को लेकर चिंतित है और योजना बना रहा है कि इनमें कम से कम सालाना प्रीमियम की तुलना में पांच गुना अधिक मृत्यु लाभ सुनिश्चित हो। नियामक ने यूनिट-लिंक्ड पॉलिसी में सालाना प्रीमियम (मृत्यु की स्थिति में) की तुलना में तकरीबन 10 गुना न्यूनतम गारंटी देने का आदेश दिया था। हालांकि परंपरागत योजनाओं के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।
नियामक का यह कदम ऐसे वक्त में उठ रहा है जब इस उद्योग में परंपरागत पॉलिसी की बिक्री में तेजी आई है। पिछले साल जब सितंबर में यूलिप पर सख्ती का डंडा चला उसके बाद से बीमा कंपनियों ने अपना पूरा ध्यान सामान्य बीमा पॉलिसी पर लगाया। इसका नतीजा यही निकला कि जो यूलिप पहले बीमा कंपनियों की कुल बिक्री में 80 फीसदी तक का योगदान करते थे, कुल बिक्री में उनकी हिस्सेदारी में नाटकीय रूप से गिरावट आई। इस साल अप्रैल से जुलाई के बीच जीवन बीमा कंपनियों ने नई पॉलिसियों के जरिये 26,794 करोड़ रुपये जमा किए जिसमें 80 फीसदी हिस्सेदारी परंपरागत बीमा पॉलिसियों की रही। आईआरडीए ने हाल में परंपरागत पॉलिसियों के तीन अलग-अलग प्रकारों का ब्योरा मांगा है- मसलन ऐसे उत्पाद जहां प्रीमियम (मय ब्याज और बिना ब्याज) के बदले मृत्यु लाभ परिभाषित है, ऐसे उत्पाद जिनमें शुरू में तो मृत्यु लाभ काफी ऊंचा होता है लेकिन बाद में कम होता जाता है, ऐसी पॉलिसी जिनमें बीमा कवर प्रीमियम की तुलना में नाकाफी या बहुत कम होता है जिनमें अधिकांश बचत योजनाएं होती हैं। नियामक ने बीमा कंपनियों से इस मामले पर त्वरित संज्ञान लेने और उन्हें दो दिनों के भीतर ब्योरा पेश करने को कहा है।
आईआरडीए के एक अधिकारी ने कहा, 'यह एक तरह का धोखा ही है जहां ग्राहकों से बेहतर फायदे का वादा किया जाता है लेकिन दावों (मृत्यु की स्थिति में) के मामले में जो लाभ दिया जाता है वह प्रीमियम से काफी कम होता है। एक जीवन बीमा पॉलिसी का बुनियादी सिद्घांत यही होना चाहिए कि उसमें सक्षम जोखिम कवर हो।' मिसाल के तौर पर कई निजी बीमा कंपनियों ने परंपरागत प्लेटफॉर्म पर ऐसी बचत निवेश योजनाएं पेश कर रखी हैं जहां मृत्यु की स्थिति में 5 फीसदी सालाना चक्रवृद्घि दर से प्रीमियम वापस किया जाता है। इस मामले में जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की 'जीवन आस्था' का उदाहरण भी सामने आता है जिस सिंगल प्रीमियम पॉलिसी ने वर्ष 2009 में तकरीबन 9,000 करोड़ रुपये जुटाए। नियामक से जुड़े अधिकारी ने कहा, 'जीवन आस्था ऐसी पॉलिसी का सटीक उदाहरण है जहां पहले वर्ष के बाद लगातार मृत्यु लाभ कम होता जाता है। यह कोई आदर्श स्थिति नहीं है, पॉलिसी के समस्त दौर में बीमा हिस्सा बराबर ही रहना चाहिए।' वहीं बीमा कंपनियों से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यदि यूलिप की तर्ज पर ही न्यूनतम मृत्यु लाभ  के प्रावधान को जोड़ा जाएगा तो उद्योग पर उसका बहुत व्यापक असर नहीं पड़ेगा।
उद्योग जगत के जानकारों के अनुसार बीमा नियामक आईआरडीए बीमा कंपनियों पर करीब से नजर बनाए हुए है। खासतौर से नियामक की इन कंपनियों के मिश्रित उत्पादों पर कड़ी नजर है जिसमें पिछले एक साल में परंपरागत पॉलिसी की हिस्सेदारी में जबरदस्त बढ़ोतरी आई है जहां कमीशन भी तकरीबन 30 फीसदी के आसपास लिया जा रहा है।

Keyword: insurence company market,
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