| धारावाहिकों के तेवर से चमके नकली जेवर | | विमुक्त दवे / August 19, 2011 | | | | |
गुजरात के राजकोट में रहने वाले धीरूभाई पटेल हों या महेश लिंबासिया, दोनों आजकल टेलीविजन की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं। वजह भी साफ है। दोनों ही नकली जेवरों का काम करते हैं। दो दशक पुराने इस उद्योग को इन दिनों क्षेत्रीय सिनेमा और टीवी धारावाहिकों की बदौलत बहुत सारे नए ग्राहक मिलने लगे हैं। दरअसल ज्यादातर धारावाहिकों और फिल्मों में गुजरात के इस छोटे से शहर में बने नकली आभूषणों का इस्तेमाल होने लगा है।
मुंबई स्थित श्वेता आर्ट और श्वेता कलेक्शन के कृष्णा रेड्डी का कहना है, 'हम बालिका वधू जैसे धारावाहिकों के लिए नकली जेवरों की सप्लाई करते हैं। हमारे वितरक इन जेवरों को फिल्म और धारावाहिक निर्माताओं तक पहुंचाते हैं। हम राजकोट के आभूषण निर्माताओं को डिजाइन के बारे में बता देते हैं और मुंबई के अपने ग्राहकों तक आभूषण पहुंचा देते हैं।
600 करोड़ रुपये के कुल कारोबार और लगभग 1,000 निर्माताओं वाला यह उद्योग राजकोट जिले में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 3 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मुहैया कराता है। राजकोट नकली आभूषण निर्माता संघ के अध्यक्ष विनोद वेकरिया कहते हैं कि राजकोट में बनने वाले नकली जेवरों को दक्षिण भारतीय फिल्मों में भी काफी पसंद किया जा रहा है। हमें हिंदी फिल्मों और धारावाहिकों में भी काफी काम मिल रहा है।
अभिनेता और टीवी निर्माता जेडी मजेठिया का कहना है कि टीवी उद्योग तो हमेशा से राजकोट के नकली जेवरों का खरीदार रहा है। हमारे पास एक विभाग होता है जो पहनावे और जेवरों की देखभाल का काम देखता है। जेवरों की खरीद हम सीधे राजकोट से ही करते हैं। राजकोट में ऐसे नकली जेवरों की लंबी श्रृंखला मौजूद है। आपको 5 रुपये से लेकर 5,000 रुपये तक के जेवर यहां के बाजार में मिल सकते हैं। धीरे धीरे इन नकली जेवरों की मांग गुजरात के बाहर भी बढऩे लगी है। राजकोट के ही रहने वाले और नकली जेवरों के निर्माता धीरूभाई पटेल का कहना है कि हमारे कुल कारोबार का लगभग 15-17 फीसदी हिस्सा धारावाहिकों और फिल्मों के जरिए मिलता है। वह कहते हैं, 'अभी भी इस उद्योग का 40 फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करता है। हम प्रयास कर रहे हैं कि जल्द से जल्द इन सबको संगठित कर लिया जाए। नकली जेवर निर्माता संघ के उपाध्यक्ष नरेंद्र मेहता का कहना है कि देश में कारोबार करने के अलावा हम कुवैत, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और कई अफ्रीकी देशों में इन जेवरों का निर्यात भी करते हैं।
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