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नए साल में निवेश के सुरक्षित विकल्पों पर ही रहे जोर
बाजार नजरिया
देवांग्शु दत्ता /  January 16, 2011

अगर किसी कारोबार का उचित मूल्य पता करना है तो आप इसकी ब्रेक-अप वैल्यू का पता लगाइये यानी कि नेट वर्थ में से कुल बकाये को घटाकर प्राप्त होने वाला आंकड़ा। यह एक परंपरागत तरीका है और इसमें भविष्य के मुनाफे को दरकिनार किया जाता है। एक दूसरा तरीका डिस्काउंटेड नकदी प्रवाह (डीसीएफ) को ध्यान में रखकर आकलन करना हो सकता है। किसी कंपनी या संगठन का कारोबार कितना बेहतर है, इसका पता लगाने का एक तीसरा तरीका यह हो सकता है कि आप उस कंपनी की प्रतिद्वंद्वी कंपनियों से उसकी तुलना करें। यह तरीका ज्यादा बढिय़ा भी है और अपेक्षाकृत ज्यादा इस्तेमाल में भी लाया जाता है। साझा पूंजी उद्योग, निवेश बैंकर्स और अधिग्रहण और विलय के विशेषज्ञ किसी कंपनी का मूल्य पता लगाने के लिए इन्हीं तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। खुदरा निवेश भी इन तरीकों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इन तरीकों को अपनाकर कम से कम सैद्घांतिक तौर पर तो किसी कंपनी का भाव पता लगाया जा सकता है। अगर चाहें तो इन तरीकों का इस्तेमाल कर पूरे बाजार का भाव तय किया जा सकता है। वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था के इस युग में जहां निवेश और हेज फंड बड़ी आसानी से एक बाजार से दूसरे बाजार में अपना पैसा लगाते हैं, सभी बाजारों की एक दूसरे से तुलना करना जरूरी हो चुका है।
इन पैमानों के आधार पर हमेशा से भारतीय बाजार को बेहतर आंका गया है। भारतीय बाजार दूसरी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में ऊंचे औसत पीई पर कारोबार करता रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय बाजारों ने निरंतर बेहतर प्रतिफल दिया है और भविष्य के लिए इसके अनुमान भी हमेशा पहले से बेहतर आंके गए हैं।
हालांकि जब भी आर्थिक पंूजी बाजार में किल्लत महसूस हुई है तो विदेशी संस्थागत निवेशकों ने विकासशील देशों में अपने निवेश को कम किया है। ऐसे समय में दूसरे विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की तरह ही भारतीय इक्विटी बाजार में भी निवेशकों का पैसा घटा है। आमतौर पर निवेशक इस बात पर जोर देते हैं कि उन्होंने जो रकम निवेश किया है अगर वह बढ़ता नहीं है तो कम से कम घटे नहीं। यानी उनकी प्राथमिकता अपने पैसे को सुरक्षित रखने की होती है, न कि जोखिम भरे विकास की। इस नए साल में बाजार में तेजी के बजाय गिरावट की संभावना अधिक नजर आती है। वर्ष 2011 के पहले दो हफ्तों में बाजार में बड़ी गिरावटें देखने को मिली हैं। कई देश की अर्थव्यवस्थाएं संतुलित नजर नहीं आ रही हैं और यूरो और डॉलर दोनों ही पर दबाव बना हुआ है। मुद्रा के उतार-चढ़ाव की वजह से वैश्विक निवेशक सचेत हो चुका है। जब कभी वैश्विक अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव का रुख नजर आता है तो निवेशक उन्हीं अर्थव्यवस्थाओं के संरक्षण में जाना पसंद करते हैं जिनकी मुद्रा मजबूत हो। भले ही भारत का राजकोषीय घाटा और बढ़ती महंगाई अधिकांश दूसरे देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में है, लेकिन भारतीय रुपया सबसे मजबूत मुद्राओं में से एक नहीं है। यही वजह है कि भारत भले ही कई देशों की तुलना में बेहतर आर्थिक स्थिति में हो लेकिन यहां की कमजोर मुद्रा एक बड़ी परेशानी है। भारतीय बाजार में गिरावट का यह एक बड़ा संकेत है। डीसीएफ से भी यही संकेत मिलता है कि भारतीय बाजार में गिरावट देखने को मिल सकती है। चूंकि घरेलू ब्याज दरें बढ़ रही हैं, ऐसे में डिस्काउंट दर भी बढऩी चाहिए जो कि भारतीय शेयर बाजार का एनपीवी है और इस तरह इसका बाजार पूंजीकरण भी घटना चाहिए। बाजार के आकलन का एक और तरीका उस कीमत को जानना हो सकता है जिसे अधिकांश संस्थागत निवेशक उचित मानते हों। कैलेंडर वर्ष 2010 की दूसरी छमाही में घरेलू संस्थागत निवेशक (डीआईआई) निफ्टी के 5400-5500 के स्तर के ऊपर शुद्घ विक्रेता थे। वर्ष 2010 में एफआईआई 6100 के स्तर के ऊपर ही शुद्घ विक्रेता थे। मगर जनवरी 2011 में 5650 के करीब ही भारी बिकवाली का रुख है। जोखिम भरे माहौल में ऊंचे स्तरों पर संस्थागत निवेशकों द्वारा बड़े पैमाने पर निवेश की संभावनाएं कम ही नजर आ रही हैं। ऐसे में 5400 से 5500 के स्तर के ऊपर निफ्टी को बड़ा समर्थन नजर नहीं आता है। इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि बाजार में इसके नीचे भी बड़ी गिरावट जारी रहे। परंपरागत आकलन के मुताबिक 5500 का स्तर भी अधिक ही है क्योंकि निफ्टी 21 के पीई पर कारोबार कर सकता है।
अनिश्चितता भरे माहौल में निवेशकों के लिए बाजार में निवेश की परंपरागत रणनीति अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएगी। बेहतर है कि फिलहाल निवेश के दूसरे विकल्पों जैसे फिक्स्ड डिपोजिट आदि का ही चयन किया जाए। निवेशक अपने पास नकदी जमा कर रखें ताकि जब बाजार अपने निचले स्तर पर पहुंच जाए तो वे इस पैसे से खरीद कर सकें। फिर भी अगर शेयर बाजार में ही निवेश करना हो तो कुछ चुनिंदा शेयरों को शॉर्ट करना एक विकल्प हो सकता है। साल 2011 के एक बड़े हिस्से या यूं कहें कि लगभग पूरे साल ही बाजार में गिरावट से उबरने का कोई चमत्कारी फॉर्मूला नजर नहीं आता है।

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