| जिरह: नई पेंशन योजना में सुधार की है जरूरत? | | डी स्वरुप/बलराम पी भगत / August 04, 2010 | | | | |
प्रोत्साहन मिलना है जरूरी
डी स्वरुप, पूर्व अध्यक्ष, पीएफआरडीए
घरेलू स्तर पर नई पेंशन व्यवस्था (एनपीएस) एक बेहतर डिजाइन की गई पेंशन योजना के तौर पर उभरी है। इसमें कई तरह की विशेषताएं हैं, मसलन किसी भी तरह की नौकरी में इसे अमल में लाया जा सकता है, इसमें कोई भौगोलिक सीमाओं का बंधन नहीं है। इसमें जोखिम लेने की क्षमता के अनुकूल निवेश का विकल्प भी है।
कई फंड मैनेजरों में से चयन का विकल्प भी है, साथ ही इसमें न तो प्रवेश प्रभार है और न ही निकासी प्रभार। दुनिया में शायद सबसे कम फंड प्रबंधन का शुल्क इसमें लिया जाता है। इस योजना का निरीक्षण एक नियामक करता है। यह बेहद आदर्श स्थिति नजर आती है। लेकिन एनपीएस ने कई खुदरा निवेशकों को आकर्षित नहीं किया।
आलोचकों का मानना है कि एनपीएस उतनी प्रभावकारी साबित नहीं हो पाई क्योंकि कोई भी इसे म्युचुअल फंड और बीमा योजनाओं की तरह प्रमोट नहीं कर रहा है। एनपीएस ने प्रत्यक्ष बिकवाली के मॉडल को अपनाया है ताकि लागत कम रखी जा सके। वितरक और एजेंट मुक्त यह मॉडल किसी व्यक्ति की सुरक्षा के लिए बनाया गया था। इसे धीमी शुरुआत के जोखिम के साथ अपनाया गया था।
एनपीएस को बनाने का मकसद रिटायरमेंट के लिए बचत के जरिये अच्छी खासी रकम तैयार करना था। यह एक स्वैच्छिक दीर्घावधि की योजना है जिसके लिए इंसेटिव दिया जाना चाहिए। केंद्र सरकार ने पहले ही 31 मार्च 2013 तक के लिए प्रति वर्ष 1,000 रुपये सब्सक्राइबर के लिए सह-योगदान के तौर पर दिया है।
सार्वजनिक भविष्य निधि (पीपीएफ) को लंबी अवधि की बचत योजना के बजाय कर बचत के वित्तीय उपकरण के तौर पर देखा जाता है। अब वक्त आ चुका है कि हम धीरे-धीरे पीपीएफ को खत्म करें ओर एनपीएस को प्रमोट करें क्योंकि यह वास्तव में एक ऐसी योजना है जो बुढ़ापे में आय की सुरक्षा मुहैया करा सकती है।
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि एनपीएस फंडों का प्रबंधन करना व्यावहारिक नहीं है क्योंकि इनकी लागत कम है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) की पूंजी के फंड प्रबंधन की बात समझी जा सकती है क्योंकि इसे भी कम लागत पर किया जा रहा है।
सरकार उठाए कुछ कदम
बलराम पी भगत, सीईओ, यूटीआई रिटायरमेंट सॉल्यूशंस लिमिटेड
कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) या सार्वजनिक भविष्य निधि (पीपीएफ) से इतर है नई पेंशन योजना (एनपीएस) जहां सरकार रिटर्न की गारंटी देती है जिसका नियमन पीएफआरडीए करता है। एनपीएस में किए गए निवेश को परिपक्वता/रिटायरमेंट होने से पहले तक निकाला नहीं जा सकता है।
रिटायरमेंट पर आपकी राशि के एक हिस्से को एकमुश्त के तौर पर निकाला जा सकता है। बाकी की पूंजी का भुगतान सालाना पेंशन भत्ते के तौर पर दिया जा सकता है। इस योजना को 18-55 साल का कोई व्यक्ति ले सकता है।
आपको यह तय करना होगा कि आप अपनी पूंजी का निवेश किस तरह से करना चाहते हैं। सूचनाओं से लैस सब्सक्राइबर बेहतर चयन करता है और वह अधिकतम 50 फीसदी इक्विटी और बाकी डेट का विकल्प चुन सकता है। हालांकि इक्विटी और डेट का संतुलन भी उम्र के लिहाज से तय होता है। करीब 35 साल की उम्र तक इक्विटी निवेश 50 फीसदी हो सकता है और बाकी का निवेश डेट में हो सकता है।
हालांकि इसके बाद इक्विटी में कमी आएगी और 55 साल की उम्र तक इक्विटी का स्तर 10 फीसदी के स्तर पर पहुंच जाएगा। एनपीएस में फिक्स्ड और वेरिएबल लागत दोनों ही होती है जिससे फंड की वैल्यू कम होती है। लेकिन यह मौजूदा रिटायरमेंट योजनाओं और किसी निश्चित योगदान वाली योजनाओं के मुकाबले कम है।
इसमें भी कर लाभ मिल सकता है लेकिन इसकी पूंजी पर निकासी के वक्त कर लगाया जाता है और यह ईपीएफ और पीपीएफ से अलग है जिससे छूट-छूट-छूट (ईईई) का प्रावधान है। हालांकि प्रत्यक्ष कर संहिता में यह प्रस्ताव रखा गया है कि एनपीएस को छूट के योग्य माना जाए।
निवेश पोर्टफोलियो में इक्विटी की मौजूदगी से परंपरागत डेट निवेश के मुकाबले एनपीएस के तहत रिटर्न मिलने की गुंजाइश है मसलन पोस्ट ऑफिस योजना, बैंक जमा। हालांकि इक्विटी आधारित म्युचुअल फंडों के मुकाबले जोखिम कम रहने की संभावना है।
इसकी वजह यह है कि इक्विटी में इंडेक्स फंड के जरिये निवेश की इजाजत है और इक्विटी में 50 फीसदी निवेश की गुंजाइश ही बनाई गई है। एनपीएस सब्सक्राइबर को छूट देता है।
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