| जिरह: क्या रिटेल में एफडीआई सही है? | |
| गोविंद श्रीखंडे/प्रवीन खंडेलवाल / 07 15, 2010 | | | | |
भारत बन सकता है शॉपिंग हब
गोविंद श्रीखंडे, सीईओ, शॉपर्स स्टॉप
खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को लेकर इन दिनों देश में बहस का दौर जारी है। इससे ग्राहकों, स्थानीय खुदरा कारोबारियों और खुदरा कारोबार के वैश्विक दिग्गजों के हित जुड़े हों तो बहस होना स्वाभाविक ही है। पिछले कई साल से इस पर बातचीत जारी है लेकिन इस दौरान कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया है। फिलहाल औद्योगिक नीति एवं संवद्र्घन विभाग (डीआईपीपी) ने एफडीआई से जुड़े जिन व्यापक मुद्दों पर चर्चा पत्र पेश किया है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। इसके जरिये विभाग ने सभी अंशधारकों का पक्ष जानने की कोशिश की है।
पहले तो हमें यही जानना चाहिए कि किसी क्षेत्र में एफडीआई की जरूरत क्यों होती है? एफडीआई से जहां उपभोक्ताओं को तो फायदा होता ही ह, वहीं बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलता है। देश में दूरसंचार, वाहन और बीमा क्षेत्र में एफडीआई की वजह से आई कामयाबी को हम देख ही चुके हैं। इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर हुए निवेश की वजह से ग्राहकों को बेहतर सेवाएं और उत्पाद नसीब हुए हैं। बढ़ी प्रतिस्पद्र्घा ने भी कंपनियों को खुद को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित किया है।
भारतीय खुदरा कारोबार का एक अनोखा ढांचा है। राशनिंग के साथ शुरू हुआ इसका सफर कपड़ा और फुटवियर रिटेल से होकर गुजरा है। 1990 के दशक के आखिर में इसने तेजी पकड़ी। मौजूदा दौर में भी भारत दुकानदारों का देश है जहां करीब 1.5 करोड़ खुदरा कारोबारी हैं और यह तकरीबन 350 अरब डॉलर से भी बड़ा बाजार है। भारतीय खुदरा बाजार में असंगठित क्षेत्र का दबदबा है और कुल बिक्री का 94 फीसदी इनके जरिये ही होता है।
पिछले दशक में डिपार्टमेंटल स्टोर से लेकर हाइपर मार्केट और यहां तक कि स्पेशियलिटी स्टोर भारत में खुले हैं। कई वैश्विक दिग्गज पहले से ही भारतीय बाजार में मौजूद हैं। बड़े शहरों और मेट्रो में शॉपिंग मॉल खरीदारी के लिए मध्य वर्ग की पहली पसंद के तौर पर उभर रहे हैं। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ेगी खुदरा कारोबार का आकार भी बढ़ेगा। लोगों की क्रय शक्ति बढऩे पर बेहतर सेवाओं और उत्पादों के लिए उनकी मांग भी बढ़ेगी। इसके लिए विनिर्माण, रिटेल स्पेस, तकनीक, फूड लॉजिस्टिक्स और प्रसंस्करण में बड़े पैमाने पर निवेश की दरकार है।
अगर इसे सही तरीके से अंजाम दिया गया तो यह देश के लिए बहुत बड़े फायदे की सौगात साबित हो सकता है। ग्राहकों को किफायती कीमत पर बेहतरीन उत्पाद और सेवाएं मिल सकेंगी। बहरहाल एफडीआई को लेकर बहस सकारात्मक पहलुओं को न लेकर नकारात्मक बिंदुओं के इर्द-गिर्द हो रही है। कहा जा रहा है कि इससे छोटे कारोबारियों को नुकसान होगा और उनकी आजीविका संकट में पड़ जाएगी। एफडीआई से सबसे बड़ा लाभ यह हो सकता है कि भारत दुनिया का शॉपिंग हब बन सकता है जिससे अर्थव्यवस्था और मजबूत होगी। इस सब बातों को मद्देनजर रखते हुए हम सही तौर तरीकों से ही देश में खुदरा कारोबार में एफडीआई के पक्ष में हैं।
देश के लिए घातक होगा
प्रवीन खंडेलवाल, महा सचिव कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स
बहुब्रांड खुदरा कारोबार में सरकार ने एफडीआई को लेकर जो चर्चा पत्र पेश किया है, वह कुछ और नहीं बल्कि घरेलू खुदरा कारोबार को पूंजीवाद के कड़े शिकंजे में लेने का ही एक जरिया है। कुल मिलाकर यह देसी खुदरा कारोबारियों के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर देगा, इसको देखते हुए कारोबारी तबका हर संभव तरीके से इसका कड़ा विरोध करेगा। यह केवल कारोबारियों को ही नुकसान नहीं पहुंचाएगा बल्कि किसानों, ट्रांसपोर्टर, कामगारों और खुदरा कारोबार से जुड़े कई अन्य पक्षों के लिए घातक साबित होगा।
अगर भारत में बहुब्रांड खुदरा को मंजूरी दे दी जा जाती है तो वैश्विक रिटेलरों का मकसद बाजार में उतरते ही ज्यादा से ज्यादा बाजार हिस्सेदारी हासिल करना होगा। उनकी आउटसोर्सिंग क्षमताओं, संसाधनों और सरकार के साथ नजदीकी को देखते हुए उनके लिए ऐसा करना बिलकुल भी मुश्किल नहीं होगा और जब एक बार वे बाजार पर काबिज हो जाएंगी तो फिर मनमाने तरीके से बाजार को चलाएंगी और लोगों से उलूल-जुलूल दाम वसूलेंगी।
चर्चा पत्र में इस बात का जिक्र किया गया है कि खुदरा कारोबार के मौजूदा ढांचे में बिचौलियों का दबदबा है और ग्राहक उत्पाद के लिए जो कीमत अदा करता है उसका केवल एक तिहाई ही किसान को मिलता है और बाकी फायदा बिचौलिये कमाते हैं। जब बिचौलियों की बात उठी है तो यह भी जानना जरूरी हो जाता है कि ये कौन लोग हैं। बैलगाड़ी चलाने वाले, ट्रांसपोर्टर, एजेंट और छोटे कारोबारी ये बिचौलिये हैं, वहीं वैश्विक दिग्गज कंपनियों के लिए ब्रांड ऐंबेसडर बिचौलियों का काम करते हैं जो कंपनियों से करोड़ों रुपये लेते हैं। इसके अलावा बिजली खपत, गोदाम और ट्रांसपोर्ट के उनके खर्चे भी बहुत ज्यादा होते हैं।
हमारे बिचौलिये न केवल अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं बल्कि देश के सामाजिक ढांचे को भी दुरुस्त रखने में मदद करते हैं। छोटे कारोबारियों पर जो दो-तिहाई मुनाफा बनाने का आरोप लगाया जा रहा है वह एकदम बेबुनियाद है। वर्ष 2005 से देश में बड़े कारोबारी घराने भी खुदरा कारोबार में शामिल हो गए हैं। अब जरा तुलना करें। उनके यहां उत्पादों के भाव या तो बाजार में चल रहे भावों के बराबर ही हैं या फिर उनसे भी ज्यादा हैं।
इस लिहाज से अगर दो तिहाई मुनाफे वाली बात लागू होती है तो उन पर ज्यादा लागू होती है। कुल मिलाकर कारोबारियों पर ज्यादा मुनाफा कमाने का आरोप केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इस बाजार में उतारने का एक जरिया मात्र है। सरकार को बहुब्रांड खुदरा कारोबार में एफडीआई को मंजूरी देने के बजाय मौजूदा खुदरा कारोबार के ढांचे को सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) की तर्ज पर विकसित करना चाहिए। सरकार को कम ब्याज दर पर कर्ज की सुविधा मुहैया करानी चाहिए। इससे खुदरा कारोबारियों को श्रृंखला बनाने में मदद मिलेगी जिसका ग्राहकों को भी फायदा मिलेगा।
|