| क्या दबाव में संशोधन किया गया डीटीसी में? | | जिरह | | | बीएस संवाददाता / June 24, 2010 | | | | |
नया मसौदा निराशाजनक
टी एन पांडेय
पूर्व चेयरमैन, सीबीडीटी
सरकार ने कर सुधार और नई प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) को लेकर जो रवैया दिखाया है उससे आम आदमी को निराशा ही हुई है। पी चिदंबरम की अगुआई में 1996 में सरकार ने इसे शुरू किया था।
उन्होंने एक विशेषज्ञ समिति गठित की थी जिसमें भारतीय राजस्व सेवा के सात अधिकारी, एक कर अधिवक्ता और एक सेवानिवृत्त कानून सचिव शामिल थे। इस समिति को देश के कर कानूनों के कायाकल्प का जिम्मा सौंपा गया। इस समिति ने पुराने मौजूदा कानूनों को बदलने की वकालत की।
वर्ष 2005 में चिदंबरम ने फिर एक अंतरविभागीय समिति गठित की जिसमें 5 -6 राजस्व अधिकारी शामिल थे। इसका मकसद भी कर सुधार ही था। इस समिति के काम का ही नतीजा वर्ष 2009 में आए प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) के रूप में सामने आया। इसने काफी हंगामा खड़ा कर दिया जिस पर वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को आश्वासन देना पड़ा कि इसमें संशोधन किया जाएगा।
अब यही संशोधित मसौदा 15 जून को फिर जारी किया गया। इससे पहले आयकर अधिनियम, 1961 को तकरीबन दो साल के बहस-मुहाबिसे के बाद विधि आयोग ने तैयार किया था। दूसरे देशों में भी कर सुधार पूरी गंभीरता और वक्त लेकर किए जाते हैं।
मिसाल के तौर पर कनाडा में कर सुधार के लिए 1962 में कार्टर आयोग गठित किया गया और इस आयोग की रिपोर्ट के बाद 1971 में जाकर ही कर सुधार अधिनियम अस्तित्व में आ पाया। इस पूरी प्रक्रिया में करीब 9 साल लग गए। यह प्रक्रिया तीन स्तरों से होकर गुजरी। वास्तव में इस पूरी कवायद का मकसद लंबे समय तक आसान, स्थायित्व वाला और विकास की ओर अग्रसर करने वाला कर ढांचा बनाना था।
संशोधित मसौदे को देखकर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता कि पुराने मसौदे को लेकर क्यों आपत्तियां जताई जा रही थीं। इसमें बदलाव करदाताओं के उस तबके को खुश रखने के लिए भी किया गया हो जो सरकार पर दबाव डालने की कूवत रखता हो। यह बात संकेत करती है जो सरकार को दबाने की हैसियत नहीं रखते उन्हें खुद ही दबने को मजबूर होना पड़ेगा। इसमें कई बदलाव ऐसे हैं जो निजी पसंद के तहत किए गए हैं।
वित्त मंत्रालय में तैनात अधिकारी इसके पीछे तर्क दे रहे हैं करों को तय करना संसद का विशेषाधिकार है। इस विशेषाधिकार को कुंद नहीं किया जा सकता जब कर संहिता में यह दिया गया है कि इन्हें हर सालाना वित्त अधिनियम में बदला जा सकता है।
वास्तव में ऐसे बदलावों के लिए अकाटय तर्कों की दरकार है न कि इस बात कि सरकार में किसे क्या पसंद है और क्या नहीं। कर सुधार एक बेहद गंभीर प्रक्रिया है जिसे टुकड़ों में नहीं अंजाम दिया जा सकता। परामर्श पत्र निराशाजनक है और यह कहीं की चीज कहीं तोड़ी और कहीं जोड़ी की तर्ज पर बनाया गया नजर आता है।
बेहतरी की ओर बढ़ते कदम
प्रणव सायता
टैक्स पार्टनर, अर्न्स्ट ऐंड यंग
वित्त मंत्रालय ने हालिया दौर में जो सबसे कारगर कदम उठाए हैं उनमें से एक नई प्रत्यक्ष कर संहिता भी है जो करदाताओं के लिए क्रांतिकारी साबित होगी।
दुनिया भर में सरकारें कारोबारी हलकों में सक्रिय भूमिका अदा कर रही हैं और करदाताओं की राह आसान कर रही हैं। यह सब व्यावसायिक जागरूकता और खुलेपन के साये में हो रहा है। इसको बढ़िया प्रतिक्रिया भी मिल रही है।
वर्ष 2008 के अंत में ओईसीडी के एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि बड़े कारोबारी करदाताओं और कर प्राधिकरणों में ऐतिहासिक संबंध तनाव वाले रहे हैं लेकिन हाल के वर्षों में दोनों पक्षों ने सहभागी संबंधों को तरजीह दी है जिससे दोनों पक्षों को फायदा पहुंचा है।
इस सहभागिता को नए स्तर पर पहुंचाने के लिए अमेरिका में तो आंतरिक राजस्व सेवा ने हाल ही में एक अभियान चलाया है जिसमें करदाताओं को करदाता सलाहकार पैनल में शामिल होने का मौका दिया गया। भारत में भी इसकी शुरुआत हो चुकी है।
पिछले साल आए प्रत्यक्ष कर मसौदे पर उठी उंगलियों के मद्देनजर संशोधित मसौदे में 11 अहम क्षेत्रों में सुधार किए गए हैं। इसमें करदाताओं के सुझावों को बेहद सावधानी से शामिल किया गया है और इसे सही संतुलन देने के लिए जरूरी सुधार किए गए हैं। यह रवैया बेहद सकारात्मक है और घरेलू और वैश्विक स्तर पर विश्वास बहाल करने में यह बेहद अहम है।
जो कर कानून व्यावहारिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किए जाते हैं वे ज्यादा स्पष्ट और निश्चतता वाले होते हैं। इससे कानूनी पचड़े तो कम हो ही जाते हैं साथ ही लंबे समय तक स्थायित्व भी मिलता है। इसके अलावा बार-बार बदलाव की जरूरत भी नहीं पड़ती। इससे कारोबार के लिए बेहतर माहौल बनता है और कर राजस्व की उगाही भी आसान और वक्त पर हो जाती है।
कर संहिता के संशोधित मसौदे में ऐसी कई पहल की गई हैं जो इन सभी पैमानों पर खरी उतरती हैं। दोहरे कराधान से बचने के लिए की गई पहल को आप सकरात्मक बदलाव में शुमार कर सकते हैं। कुछ आलोचक इन सुधारों को लेकर वित्त मंत्रालय को कटघरे में खड़ा कर सकते हैं। कुल मिलाकर यह कदम आगे ले जाने वाला है। मिसाल के तौर पर इसमें विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) को लेकर भी स्पष्ट कर दिया गया है।
संशोधित मसौदे के अनुसार जिन सेज को नियमों के तहत कर में छूट दी गई वे तय अवधि तक ही कर छूट की पात्रता रख पाएंगे। कर संहिता में कई अहम बदलाव किए गए हैं जो भविष्य को ध्यान में रखकर किए गए हैं। नई कर संहिता के मसौदे को तैयार करने के लिए वित्त मंत्रालय ने सहभागिता का रवैया अपनाकर पारदर्शिता दिखाई है। इसे एक नई शुरुआत की ओर पहला कदम कह सकते हैं।
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