| क्या 3 जी की बोली अनुमान से ज्यादा है? | | जिरह | | | बीएस संवाददाता / May 05, 2010 | | | | |
जब होगा 3 जी का साथ तब ही बन पाएगी बात
कुणाल बजाज
पार्टनर और डायरेक्टर इंडिया - एनालिसिस मैसन लिमिटेड
ऐसे माहौल में जब 3 जी लाइसेंस हासिल करने के लिए दूरसंचार कंपनियां आधार मूल्य से पांच गुना अधिक तक भुगतान करने के लिए तैयार हैं तो यह सवाल उठना लाजिमी ही है कि क्या 3 जी के लिए ये कंपनियां कुछ ज्यादा ही रकम खर्च कर रही हैं।
इन बोलियों को न्यायसंगत बनाने के लिए आने वाले कुछ साल में देश में दूरसंचार की बदलती तस्वीर पर भी ध्यान देने की जरूरत है। तब के हालात कुछ जुदा होंगे। केवल चार या पांच बड़ी कंपनियां ही कारोबारी मैदान में बचेंगी। 3 जी की शुरुआत हो चुकी होगी और हर महीने 2 जी नेटवर्क के ग्राहकों की संख्या इकाई अंकों में बढ़ती रहेगी और कीमत ही सबसे बड़ी निर्धारक नहीं रह जाएगी।
इस तरह के हालात में 3 जी सेवाएं दूरसंचार कंपनियों के अस्तित्व के लिए बेहद अहम हो जाएंगी जो बाजार हिस्सेदारी को तय करने का काम करेगी। लेकिन इसके कुछ दूसरे असर भी हो सकते हैं। वैश्विक स्तर पर 3 जी स्पेक्ट्रम की कीमत जनसंख्या के हिसाब से तय की जाती है और इससे ही डॉलर प्रति मेगाहर्ट्ज 3 जी स्पेक्ट्रम मिलता है।
ब्रिटेन में तो यह 4 डॉलर प्रति मेगाहर्ट्ज प्रति व्याक्ति तक जा पहुंचा है जिससे इस बोली में शामिल कंपनियां दिवालिएपन की हद तक पहुंच चुकी हैं। भारत में भी कुछ सर्किल में यह 4 डॉलर के स्तर को पार कर चुका है।
स्पेक्ट्रम की वैल्यू के लिए इसे तीन पैमानों पर तोला जाता है। पहला तो यही कि ज्यादा से ज्यादा ग्राहक खींचने की 3जी की क्षमता और प्रति व्यक्ति औसत राजस्व कमाई। दूसरा यह कि ऐसे ग्राहकों से होने वाली कमाई जो पहले दूसरी कंपनी के ग्राहक थे जो 3 जी स्पेक्ट्रम हासिल करने में सफल नहीं हो पाई। तीसरी और आखिरी यह कि ऊंची आमदनी वाले ग्राहकों को अपने साथ बरकरार रख पाना।
भारत के मामले में एक बात और अहमियत रखती है कि कंपनी के पास आखिर कितना स्पेक्ट्रम है। इसकी रणनीतिक वैल्यू है क्योंकि भारत में इस बात की निश्चिंतता नहीं है कि आगे कब स्पेक्ट्रम के लिए बोली लगाई जाएगी। वैसे कंपनियों के लिए मौजूदा ग्राहक बेहद अहम हैं और उन्हें बरकरार रखना उनके लिए बेहद फायदेमंद होता है।
भारतीय दूरसंचार कंपनियों की 30 फीसदी कमाई और 45 फीसदी एबिटा शीर्ष स्तर के 10 फीसदी उपभोक्ताओं के जरिये ही आता है। नंबर पोर्टेबिलिटी के बाद इसमें एक और नया मोड़ आने वाला है, जिसका आगाज इस साल के आखिर तक होने की उम्मीद है।
इससे उन कंपनियों को अपने ग्राहकों से हाथ धोना पड़ सकता है जो पहले 2 जी सेवा का इस्तेमाल कर रहे हैं और अपनी मौजूदा कंपनी का साथ इस बात को लेकर छोड़ रहे हैं क्योंकि उनकी कंपनी 3 जी स्पेक्ट्रम हासिल नहीं कर पाई और उन्हें 3 जी सेवा चाहिए। नए ग्राहकों को लुभाने के लिए 3 जी स्पेक्ट्रम हासिल करना बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है।
इसकी वजह भी सीधी सी है कि 3 जी के जरिये उपभोक्ता कई ऐसी सेवाओं का आनंद उठा सकते हैं जिसके बारे में अभी तक केवल सोचा ही जा रहा है। शुरुआत में 3 जी कारोबार थोड़ा मद्धम रह सकता है लेकिन बाद में तस्वीर बदल सकती है।
कंपनियों को मुनाफे पर ध्यान देना चाहिए
संदीप लड्ठा
कार्यकारी निदेशक - प्राइसवाटरहाउस कूपर्स
विकसित देशों में करीब एक दशक पहले ही शुरू हो चुकी 3 जी सेवाओं के बाद अब भारतीय सरकार भी तमाम बहसबाजी और चर्चाओं के दौर के बाद 2100 मेगाहट्र्ज फ्रीक्वेंसी बैंड में 3 जी स्पेक्ट्रम बेचने की तैयारी कर रही है।
एक ओर सरकार ने जहां इस पूरी कवायद से 35,000 करोड़ रुपये की कमाई की आस लगा रखी है वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठ रहा है कि इतनी मोटी रकम खर्च करने के बाद क्या दूरसंचार कंपनियां मुनाफा बनाने में कामयाब रहेंगी।
सरकार को किसी अन्य नीलामी के जरिये होने वाली आमदनी की तुलना में 3 जी स्पेक्ट्रम की नीलामी के जरिये कहीं ज्यादा राजस्व मिलने की उम्मीद है। मीडिया में चल रही खबरों के मुताबिक सरकार को 3 जी नीलामी से 50,000 करोड़ रुपये तक की आमदनी हो सकती है।
सरकार राजकोषीय घाटे का आकार कम करना चाहती है और अपनी उधारी पर लगाम लगाने की भी उसकी मंशा है। इसके लिए 3 जी नीलामी सरकार के लिए बेहद कारगर साबित होती नजर आ रही है। दूरसंचार कंपनियों के सामने दूसरे कड़ी चुनौती है कि हर महीने 2 करोड़ नए ग्राहकों को बेहतर सेवाएं मुहैया कराना है।
भारत में दूरसंचार सेवाओं की नियामक संस्था भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के मुताबिक देश में दूरसंचार ग्राहकों की संख्या बढ़कर 62.1 करोड़ हो गई है। ग्राहकों की संख्या में आई तेजी बेहद चौंकाने वाली है।
दूरसंचार सेवाओं के लिए आधारभूत तत्व स्पेक्ट्रम को हासिल करने के लिए कंपनियां बेहद उतावली हैं और अपनी जरूरत से भी ज्यादा स्पेक्ट्रम लेने को तैयार हैं क्योंकि तमाम टालमटोली के बाद ही सरकार 3 जी स्पेक्ट्रम के लिए बोली लगाने पर तैयार हुई है। दरअसल बाजार हिस्सेदारी गंवाने के चक्कर में दूरसंचार कंपनियां महंगे दाम पर भी स्पेक्ट्रम खरीद रही हैं।
इनमें से कुछ को सरकार को भुगतान करने और स्पेक्ट्रम हासिल करने के बाद उसके परिचालन के लिए पूंजीगत खर्च करने के लिए भारी मात्रा में कर्ज उठाना पड़ेगा। इस मामले में ऊंची ब्याज दरें इन कंपनियों पर बड़ा बोझ साबित होंगी। अब जो स्पेक्ट्रम जारी किया जाना है वह 2,100 मेगाहट्र्ज का किया जाना है।
फिलहाल टेलीकॉम कंपनियों के पास 800-900 और 1,800 से 1,900 मेगाहर्ट्ज के बीच का स्पेक्ट्रम मौजूद है। अभी तक 3 जी सेवाओं के जरिये अभी तक कोई जबरदस्त सेवा मुहैया कराने का भी ऐलान नहीं किया गया है। ज्यादातर आवेदकों ने ई मेल, सोशल मीडिया नेटवर्किंग, इंटरनेट, रेडियो जैसी सेवाएं मुहैया कराने की ही बात की है।
ये सभी सेवाएं पहले से ही मौजूद 2 जी और 2.5 मेगाहर्ट्ज नेटवर्क पर मौजूद हैं। केवल 3 जी तकनीक पर बेहतरीन डाटा सुविधाओं की वजह से इन सेवाओं का स्तर अच्छा होने की उम्मीद है। इस बात के पूरे आसार हैं कि 3 जी सेवाएं पहले मेट्रो शहरों में ही मौजूद होंगी और कुछ वक्त बाद ही देश के दूसरे इलाकों में उपलब्ध होंगी।
फिलहाल जो बोली प्रक्रिया चल रही है वह केवल दूरसंचार कंपनियों द्वारा मोटी रकम पर स्पेक्ट्रम खरीदने से ज्यादा कुछ नहीं है। उन्हें मुनाफे पर ध्यान देना चाहिए।
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