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क्या विदेशी शिक्षा संस्थान विधेयक से फायदा होगा?
जिरह
बीएस /  March 25, 2010

निजी निवेश से गिरेगा देश में उच्च शिक्षा का स्तर
बी राज
कंट्री हेड एवं निदेशक (स्टैमफोर्ड इंडिया एजुकेशन सेंटर)

विदेशी शैक्षणिक संस्थान विधेयक, 2010 को अगर उच्च शिक्षा में मौजूदा खामियों के साथ पारित कर दिया जाता है तो इससे उच्च शिक्षा का स्तर गिरेगा और शिक्षण व्यवस्था में भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलेगा।

पूर्व मंत्रियों की तरह ही कपिल सिब्बल ने भी उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधार लाने के लिए ईमानदार कोशिशें की हैं, मगर वह दुर्भाग्यवश इस विधेयक को उतना आकर्षक नहीं बना पाए हैं कि विदेशी विश्वविद्यालय भारत में उच्च शिक्षा को बेहतर बनाने में दिलचस्पी लें और 21 फीसदी का सकल पंजीकरण अनुपात (जीईआर) हासिल करें।

भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली दुनिया की सबसे बड़ी प्रणालियों में से एक है। मुल्क में इस वक्त करीब 430 विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षा के 22 हजार संस्थान हैं। मुल्क का उच्च शिक्षा में जीईआर करीब 12 फीसदी का है, जबकि वैश्विक औसत 23.2 फीसदी का है। विकसित मुल्कों में यह आंकड़ा 54.6 फीसदी और एशियाई मुल्कों में 22 फीसदी का है।

सरकार इसे बढ़ाकर 2017 तक 21 फीसदी तक लाना चाहती है। सरकार ने 2011-12 तक जीईआर को 15 फीसदी के स्तर तक लाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में 2.1 करोड़ छात्रों को एडमिशन देने की जरूरत है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इसमें निजी और गैर सहायता प्राप्त उच्च शिक्षण संस्थानों की हिस्सेदारी 51 फीसदी की होगी। जाहिर सी बात है कि सरकार सिर्फ अपने बूते पर जीईआर के लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकती है। इसके लिए उसे निजी क्षेत्र से भी भागीदारी चाहिए होगी।

कैबिनेट के इस विधेयक को मंजूरी देने के बाद सिब्बल का कहना था कि, 'यह एक मील का पत्थर साबित होगा। इससे प्रतिस्पध्र्दा बढ़ेगी और गुणवत्ता में भी सुधार आएगा। टेलीकॉम सेक्टर से भी बड़ी क्रांति हमारा इंतजार कर रही है।' उच्च शिक्षा में निजी निवेश कंपनियां को फायदा कमाने का अधिकार नहीं है। फिर भी ये छात्रों से मोटी रकम फीस के रूप में वसूल कर रही हैं।

हालांकि, निजी निवेश से उच्च शिक्षा काफी सुधरने के आसार हैं क्योंकि इनसे लोगों की उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ेगी और प्रतिस्पध्र्दा से शिक्षा के स्तर में सुधार आएगा। हालांकि, मुल्क में सचमुच कैंपस स्थापित करने की इच्छुक विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए सरकार ने बहुत थोड़ी सी रियायत दी है।

भारत में आने के लिए इन विश्वविद्यालयों को कम से कम 51 फीसदी पूंजी का निवेश करना पड़ेगा। इसके अलावा, 49 फीसदी के लिए उन्हें ऐसे किसी साझेदार की जरूरत होगी, जो मुनाफा कमाने का इच्छुक न हो। यह काम किसी भी सूरत में आसान नहीं है। ऊपर से इसके यूजीसी कानून, 1956 के तहत सिर्फ मानद विश्वविद्यालय का तमगा दिया जा सकता है।

साथ ही, एनसीएचईआर विधेयक के तहत वे अपना कुलपति भी नियुक्त नहीं कर सकते। भारत में उच्च शिक्षा जटिल कानूनों में फंसी रही है। वैसे, कई लोगों का मानना है कि इस विधेयक की वजह से सरकार हर साल मुल्क से बाहर जाने वाली 7.5 अरब डॉलर की उस रकम बचाने में कामयाब होगी, जो 5 लाख देसी छात्र विदेशी संस्थानों में उच्च शिक्षा हासिल करने में खर्च करते हैं।

वे सिर्फ विदेशी डिग्री के लिए नहीं, बल्कि वहां की संस्कृति और वातावरण को समझने के लिए विदेश जाते हैं। साथ ही, उन्हें वर्क परमिट की भी चिंता होती है, जो वहां पढ़ाई करने से उन्हें आसानी से मिल सकती है। ये चीजें उन्हें देश में चल रही विदेशी यूनिवर्सिटी से नहीं मिल सकती है। 

देशी संस्थान भी कर सकेंगे विदेशी मानक हासिल
बी एस सहाय
निदेशक (एमडीआई, गुड़गांव)

विदेशी शिक्षण संस्थान (प्रवेश व परिचालन नियमन) विधेयक, 2010 की हमारे साथ-साथ ज्यादातर देसी संस्थानों ने तारीफ की है। स्वस्थ प्रतिस्पध्र्दा मुल्क के विकास के लिए काफी अच्छी बात होती है। हमने टेलीकॉम, आईटी और ऑटो जैसे कई क्षेत्रों में इसके फायदे को देखा है।

मेरे मुताबिक यह उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए भी ताजा हवा के झोंके की तरह आएगी। वैसे, मैंने अब तक इस विधेयक के संशोधित मसौदे को नहीं देखा और मेरी बातों का आधार मीडिया में इसके बाबत छपी खबरें हैं। मुझे लगता है कि यह सही दिशा में उठाया गया एक सही कदम है।

हालांकि, सरकार को यह बात सुनिश्चित करनी चाहिए कि सिर्फ अव्वल दर्जे के विदेशी विश्वविद्यालयों को ही भारत में कैंपस स्थापित करने की इजाजत दी जाए। इससे देसी संस्थान को भी वैश्विक मानकों के स्तर पर आने में मदद मिलेगी। यूनिवर्सिटी को कैंपस स्थापित करने की इजाजत देने की प्रक्रिया भी पारदर्शी और पक्षपात रहित होनी चाहिए।

अहम बात यह है कि मुल्क में आने वाले विश्वविद्यालय वही पाठयक्रम अपनाएं, वही गुणवत्ता रखें और वही डिग्री दें, जो वे अपने मुल्क में देती हैं। नियमन के ढांचे में डयूल डिग्री और क्रेडिट्स की पोर्टेबिलिटी का ख्याल रखा जाना चाहिए। कुछ लोगों के मुताबिक ये संस्थान ज्यादा वेतन देंगे, तो अच्छे अध्यापक उनकी ओर जा सकते हैं।

मेरी मानें तो कुछ अध्यापक ऐसा जरूर करेंगे, लेकिन ज्यादातर अपने पुराने संस्थानों से ही जुड़े हुए रहेंगे। दरअसल, ज्यादा प्राध्यापकों ने अपनी पसंद से अध्यापन के पेशे को चुना है और उन्हें मोटी कमाई का कोई लालच नहीं रहता। सही अकादमिक और शोध वातावरण अहम होते हैं और इन्हें बेहतरीन संस्थान की स्थापना में लंबा वक्त लगेगा।

कुछ लोगों को लगता है कि विदेशी संस्थानों द्वारा यहां कैंपस खोले जाने से देसी छात्रों का पलायन रुक जाएगा। हालांकि, मेरे मुताबिक ये संस्थान तभी छात्रों का पलायन रोकने में कामयाब होंगे, जब वे एक उचित फीस निर्धारित करेंगे। नहीं तो छात्रों का पलायन बदस्तूर जारी रहेगा। उल्टे वही छात्र इन संस्थानों में एडमिशन लेंगे, जो विदेशों में जाकर विदेशी संस्थानों में नामांकन नहीं हासिल कर पाए।

इसके अलावा, विधेयक के इस पहलू पर अब भी लोग चिंतित हैं कि इसके तहत इन विदेशी संस्थानों को अपनी फीस निर्धारित करने का अधिकार होगा। साथ ही, इनके एडमिशन की भी अपनी प्रक्रिया होगी। अगर सचमुच ऐसी बात है, तो यह अधिकार देसी संस्थानों को भी मिलना चाहिए।

ये सरकार का दायित्व है कि वह सबके लिए एक जैसे नियम बनाए, चाहे वह देसी हो या विदेशी। अगर इन विदेशी संस्थानों को मुनाफा कमाने का अधिकार होगा, तो यह अधिकार देसी संस्थानों को भी मिलना चाहिए। अगर विदेशी संस्थानों में कोटा प्रणाली लागू नहीं होगी, तो देसी संस्थानों को भी इससे राहत मिलनी चाहिए। इस क्षेत्र में सबके लिए एक जैसे कायदे-कानून होने चाहिए।

सरकार को उच्च शिक्षा में जीईआर में इजाफा करने में अच्छी खासी मेहनत करनी पड़ सकती है। सरकारी योजना के मुताबिक मौजूदा 12 फीसदी के स्तर से बढ़ाकर वह इसे 2020 तक 30 फीसदी के स्तर तक लेकर जाना चाहती है।

सरकार सिर्फ अपने बूते पर जीईआर के लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकती है। इसीलिए इसमें उसे विदेशी के साथ-साथ देसी उच्च शिक्षण संस्थानों की भी मदद लेनी ही पड़ेगी।

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