| क्या निजी स्कूल सरकारी स्कूलों से बेहतर हैं ? | | जिरह | | | बीएस संवाददाता / February 03, 2010 | | | | |
घातक होगा प्राथमिक शिक्षा का निजीकरण
विनोद रैना
सदस्य, राष्ट्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड
कुछ लोग यह मांग कर रहे हैं कि सस्ते और गैर-मान्यता प्राप्त स्कूलों में अनिवार्य शिक्षा के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के फंडों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
इस तरह की मांग या तो लापरवाही का नतीजा है या फिर ऐसा प्रारंभिक शिक्षा के निजीकरण के अभियान के तौर पर किया जा रहा है। एक ओर जहां देश में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा कानून की शक्ल अख्तियार करने ही वाली है, ऐसे में इस तरह की वकालत समझ से परे है।
ऐसी मांगों पर विचार करने से पहले मौजूदा समय में दो बातों पर ध्यान देना काफी अहम है। पहली बात यह कि देश में प्रारंभिक शिक्षा मुहैया कराने वाले स्कूलों में 80 फीसदी सरकारी हैं और बाकी 20 फीसदी निजी स्कूल हैं।
इनमें कई निजी स्कूल तो गैर-मान्यता प्राप्त हैं। दूसरी अहम बात यह है कि शिक्षा का अधिकार कानून बनने के बाद गैर मान्यता प्राप्त स्कूल बंद हो जाएंगे।शिक्षा का अधिकार कानून के तहत केंद्र सरकार राज्य सरकारों को फंड मुहैया कराएगी, लेकिन यह सोचना गलत है कि निजी स्कूलों को सरकार की ओर से कोई वित्तीय मदद मिलेगी।
इसकी एक प्रमुख वजह यह है कि शिक्षा का अधिकार कानून के खंड 8 के तहत स्पष्ट है कि अगर माता-पिता अपने बच्चों का नामांकन किसी गैर-सरकारी स्कूल में करवाते हैं तो ऐसी स्थिति में बच्चे को प्रारंभिक शिक्षा के लिए मिलने वाले आर्थिक मदद का लाभ नहीं मिलेगा।
इस कानून में यह भी व्यवस्था दी गई है कि शिक्षा का अधिकार कानून की अधिसूचना जारी हो जाने के तीन वर्षों के भीतर इसके तहत तय नियमों और मानदंडों का अनुपालन करना होगा। इसका सीधा सा मतलब यह है कि कानून की अधिसूचना जारी होने के तीन साल बाद सिर्फ मान्यता प्राप्त स्कूल ही चल पाएंगे।
यानी इस समय जितने भी गैर-मान्यता प्राप्त स्कूल हैं या तो उन्हें तय मानदंडों पर खरा उतरना होगा या फिर वे बंद कर दिए जाएंगे। जितने भी मान्यता प्राप्त स्कूल होंगे, उन्हें कम से कम 25 फीसदी छात्रों को आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों से लेना पड़ेगा। इसके बदले सरकार इन स्कूलों को उचित मुआवजा देगी। एक और बात यह कही जा रही है कि यह कानून लागू हो जाने से सस्ते निजी स्कूल कुकुरमुत्ते की तरह उग आएंगे।
मेरी समझ से यह बात सही नहीं है, क्योंकि कानून के तहत तय नियम और मानदंडों को पूरा करने के लिए इन निजी स्कूलों को उसी हिसाब से बुनियादी सुविधाएं भी विकसित करनी होंगी। शिक्षा का अधिकार कानून से एक बात तय है कि इससे सस्ते गैर-मान्यता प्राप्त स्कूलों को लेकर शुरू विवाद खत्म हो जाएगा। हालांकि, इस कानून को न्यायालय में भी चुनौती दी जा सकती है।
इतिहास गवाह है कि विश्व का कोई भी देश सबके लिए प्रारंभिक शिक्षा का ढांचा निजी स्कूलों के जरिये हासिल करने में कामयाब नहीं हो सका है। लिहाजा, यह मांग कि भारत को थोडा इससे अलग हटकर कुछ करना चाहिए, तर्कसंगत नहीं है।
निजी स्कूलों के बिना शिक्षा की बेहतरी असंभव
पार्थ जे शाह
अध्यक्ष, सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी
मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा कानून के तहत सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह देश के हरेक बच्चे को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराए। लेकिन क्या शिक्षा पाने के लिए बच्चों को सरकारी स्कूल की शरण में जाना जरूरी है? क्या शिक्षा मुहैया कराने में यह बात ज्यादा अहमियत रखती है कि स्कूल सरकारी हैं या निजी?
सरकार शिक्षा मुहैया कराने की गारंटी भले ही देती है, लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं कि ऐसा सरकारी स्कूल के जरिये ही हो। कई लोग सोचते हैं कि स्कूल का निर्माण, नियंत्रण और संचालन सरकार करे, लेकिन ऐसा सोचना दुखद है।
ऐसी सोच रखने वाले शिक्षाविद शायद यह बात भूल चुके हैं कि देश में शिक्षा के स्वरूप में काफी बदलाव आए हैं। सरकारी स्कूलों की हालत का अंदाजा तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि वहां शिक्षकों की अनुपस्थिति रोज की बात हो गई है।
एनुअल स्टेटस ऑफ स्कूल रिपोर्ट 2009 के उनसार सरकारी स्कूलों में कक्षा 5 तक के करीब 52 फीसदी बच्चे तो कक्षा दो के पाठयक्रम को ठीक से समझ नहीं पाते हैं। सरकारी स्कूलों की ऐसी खस्ता हालत को देखते हुए अभिभावक अब अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने के बजाय निजी स्कूलों में भेज रहे हैं।
आम आदमी की सरकार को आम आदमियों के बारे में अधिक सोचना चाहिए। अभिभावकों के निजी स्कलों में अपने बच्चों के भेजने के पीछे तीन वजहें हैं। पहली तो यह कि निजी स्कूल बेहतर शिक्षा मुहैया कराते है, दूसरी सस्ती और तीसरी बात यह कि ये बच्चों और उनके अभिभावकों के प्रति अधिक जवाबदेह होते हैं। ये स्कूल अंग्रेजी माध्यम में बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराते हैं, जिसकी मांग मौजूदा समय में दिनोंदिन बढ़ती जा रही है।
निजी स्कूल बजट के हिसाब से भी सस्ते हैं। देश के विभिन्न भागों के शोधकर्ताओं ने यह साबित कर दिया है कि प्रति छात्र पर होने वाला खर्च सरकारी स्कूल की तुलना में कहीं कम है। एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि निजी और गैर -वित्तीय सहायता प्राप्त स्कूलों के शिक्षकों का वेतन सरकारी स्कूलों की तुलना में 5-7 गुना कम है।
निजी स्कूल सरकारी स्कूलों के मुकाबले बेहतर और सस्ती शिक्षा मुहैया कराते हैं और सरकार इस वास्तविकता से आंख नहीं मूंद सकती है। इसका सबसे आसान उपाय यह है कि सरकार छात्रों को फंड मुहैया कराए न कि स्कूलों को। सरकारी पैसा छात्रों पर खर्च किया जाना चाहिए न कि स्कूलों पर।
सरकार को सबसे पहले एक रकम तय कर लेनी चाहिए जो यह बच्चों पर खर्च करना चाहती है और फिर स्कूलों में नामांकित बच्चों की संख्या के आधार पर स्कूल को फंड मुहैया कराए। शिक्षा का अधिकार कानून के तहत सरकार मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों में 25 फीसदी छात्र का नामांकन आर्थिक रूप से पिछले वर्ग से होना चाहिए। क्या यह रियायत 75 फीसदी बाकी गरीब बच्चों को नहीं मिलनी चाहिए?
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