| क्या आईपीसीसी के अनुमानों पर आगे भी विवाद होगा? | | जिरह | | | बीएस संवाददाता / January 27, 2010 | | | | |
ग्लेशियर पिघल रहे, इससे इनकार नहीं
चंद्र भूषण
सहायक निदेशक, सेंटर फॉर साइंस ऐंड इनवायरनमेंट
जलवायु परिवर्तन की बात से इनकार करने वाले लोग पिछले सप्ताह बड़े आनंदित हो रहे थे। दरअसल संयुक्त राष्ट्र की अंतरसरकारी समिति (आईपीसीसी) की 2035 तक हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की भविष्यवाणी में एक चूक हो गई।
इस चूक से उन्हें एक और 'प्रमाण' यह मिल गया कि जलवायु परिवर्तन कुछ वैज्ञानिकों की कोरी कल्पना है। हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने पर आईपीसीसी ने एक ऐसी रिपोर्ट का हवाला दिया था, जो पूरी तरह संशोधित नहीं थी। उसमें शामिल बातों की पुष्टि भी नहीं हो सकी थी।
जलवायु परिवर्तन का विज्ञान अभी भी विकसित हो रहा है, ऐसे में निश्चित समय बताना बेवकूफी ही कही जा सकती है। फिर भी एक सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या हिमालय के ग्लेशियर पिघल नहीं रहे हैं?
हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने के संबंध में ऊपर जितनी बातें कही गई हैं उससे बिल्कुल भी इनकार नहीं किया जा सकता है। ये सारी बातें 2009 की रैना रिपोर्ट में है, जिसे पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने जारी किया है। इसके अलावा ये बातें ग्लेशियर स्टडी ग्रुप में भी हैं, जो भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार के मार्गदर्शन में तैयार हुई है।
यह रिपोर्ट अभी प्रकाशित होनी बाकी है। लेकिन इनमें कुछ अंतर है। रैना रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियर के पिघलने में संबंध स्थापित करने के लिए काफी लंबे समय तक अध्ययन की जरूरत है। इसमें कोई शक नहीं कि विभिन्न कारकों का ग्लेशियरों पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
इन कारकों में स्थानीय व क्षेत्रीय और वैश्विक तापमान में बदलाव आदि शामिल हैं लेकिन इनमें से किसी एक कारक के असर को भयावह बनाकर दिखाना उचित नहीं माना जा सकता है, पर साथ ही यह भी नहीं कहा जा सकता कि बढ़ते तापमान का हिमालय के ग्लेशियरों पर कोई प्रभाव नहीं पड रहा है।
ग्लोबल वार्मिंग के विज्ञान पर कोई विवाद नहीं है, बल्कि इससे संबंधित आंकड़े और बयान जरूर शक के दायरे में आते हैं। भारत में जलवायु परिवर्तन पर क्या हो रहा है, हमारे लिए यह बात जाननी ज्यादा जरूरी है। आईपीसीसी की चूक को ज्यादा तवाो दी जाए तो इससे विश्व के सबसे बड़े प्रदूषक देशों को और ज्यादा बल मिलेगा।
पैनल की कार्यशैली में बदलाव की जरूरत
बेनी पीजर
निदेशक, ग्लोबल वार्मिंग, पॉलिसी फाउंडेशन
पिछले 20 सालों से आईपीसीसी की एक के बाद एक रिपोर्ट में कई तरह की अफवाहों को आसरा दिया गया है। कई बार ऐसा देखा गया है कि आईपीसीसी जिन तथ्यों के सहारे अटपटे और खतरनाक निष्कर्षों पर पहुंचती है, उसमें संतुलन, पारदर्शिता और गहन अध्ययन का सख्त अभाव होता है।
आईपीसीसी का सारा काम उन चंद लोगों का समूह देखता है, जिन्होंने ये मुगालता पाल रखा है कि उनका अनुमान बिल्कुल सटीक है। नतीजा सामने है। इसमें कोई शक नहीं कि हाल के वर्षो में आईपीसीसी की विश्वसनीयता में जबरदस्त सेंध लगी है। इतना ही नहीं, कई देश की सरकारें भी अब आईपीसीसी को उतना तवज्जो नहीं दे रही है और इसकी सलाहों पर काम नहीं कर रही है, जैसा कि कोपेनहेगन सम्मलेन में देखने को मिला है।
आईपीसीसी के अध्यक्ष आर के पचौरी का यह कहना कि हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने के संबंध में पैनल का अनुमान एक भूल थी, जिसे अलग कर के देखा जाना चाहिए, सही नहीं है। इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि आईपीसीसी की समीक्षा की प्रक्रिया में पारदर्शिता और अध्यनन दोनों का सख्त अभाव होता है।
वर्ष 2007 में आईपीसीसी ने अपनी प्रकाशित ताजातरीन रिपोर्ट में कहा कि वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी की वजह कई प्राकृतिक आपदाएं हैं, जिनमें तूफान और बाढ़ भी शामिल हैं। अपनी जिस रिपोर्ट के आधार पर पैनल ने ये बातें कही थीं, उस समय वह प्रकाशित नहीं हो पाई थी और जब यह वर्ष 2008 में प्रकाशित हुई तो जिन कारणों का हवाला दिया गया था उसके यह विपरीत था।
एक नहीं कई ऐसे मौके रहें हैं जब आईपीसीसी ने चौंका देने वाली भविष्यवाणियां की हैं। कई देशों की सरकारों के बीच आईपीसीसी की कार्यप्रणाली को लेकर गहरी चिंता है। पैनल की आर्थिक बदलावों की मांग भारत ही नहीं बल्कि कई देशों की मुश्किलें बढ़ा रही हैं।
सच्चाई यह है कि लगभग सभी देश कार्बनडाइऑक्साइड गैस के उत्सर्जन में स्वयं को अक्षम पाते हैं, क्योंकि सस्ते जीवाश्म तेल का वास्तविक विकल्प अभी भी मौजूद नहीं है। आईपीसीसी के बेतुके अनुमानों की वजह से ही विश्व के विभिन्न कोनों से आईपीसीसी में सुधार की मांग की जा रही है। जब तक पैनल में सुधार की प्रक्रिया नहीं लाई जाती है तब तक इसकी विश्वसनीयता पर लोग सवालिया निशान लगाते रहेंगे।
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