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क्या रिजर्व बैंक को दरें बढ़ानी चाहिए?
जिरह
बीएस संवाददाता /  January 20, 2010

ब्याज दरों में बढ़ोतरी की बन रही है गुंजाइश
धर्मकिर्ती जोशी
निदेशक और प्रधान अर्थशास्त्री, क्रिसिल लिमिटेड

रिजर्व रिजर्व बैंक ने अक्टूबर में मौद्रिक नीति की तिमाही समीक्षा में सख्ती बरते जाने के संकेत दिए थे।

रिजर्व बैंक के निर्णय से ऐसा लगा कि बाजार में नकदी का प्रवाह बढ़ाने के लिए पहले लिए गए कुछ निर्णयों में बदलाव किए जाएंगे। सुस्ती के दौरान कई ऐसे अनौपचारिक कदम उठाए गए थे जो आम तौर पर नहीं उठाए जाते।

अक्टूबर में रिजर्व बैंक के रुख से साफ था कि ऐसे गैर-परंपरागतकदमों को पलटना, उदार मौद्रिक नीति से बाहर निकलने के रास्ते के तौर पर चुना गया। सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआर) में बढ़ोतरी किया जाना ऐसा ही एक निर्णय था, पर सुस्ती के बाद हुए सुधारों के बने रहने पर संदेह था, लिहाजा रिजर्व बैंक ब्याज दरों को प्रभावित करने वाले ज्यादा कठोर फैसले नहीं ले पाया।

अब अहम सवाल यह उठता है कि उस समय से लेकर अब तक क्या बदलाव हुए हैं? अक्टूबर 2009 की तुलना में अब भारतीय अर्थव्यवस्था में ज्यादा मजबूती आई है। दूसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की दर 7.9 फीसदी रही थी जिसने सबको चौंका दिया था। इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही तक सरकार की तरफ से किए जा रहे खर्च बाजार में मांग की मुख्य वजह था।

ऐसा अभी भी है। निवेश में भी बढ़ोतरी हुई है। हाल-फिलहाल के आंकड़े निर्यात में बढ़ोतरी दिखा रहे हैं। हालांकि, इसके पीछे एक बड़ी वजह आधार का कम होना है। इन सभी कारणों ने मिलकर चालू वित्त वर्ष के लिए विकास संभावनाओं को बेहतर बना दिया है। पिछली नीति के बाद से महंगाई ऐसी चीज है जो रिजर्व बैंक की नीतियों पर प्रभाव डालेगी।

सामान्य परिस्थितियों में महंगाई और विकास दर दोनों के साथ-साथ बढ़ने पर ब्याज दरों में वृद्धि होती है, पर इस बार महंगाई का स्वरूप मौद्रिक नीति के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। भारत में फिलहाल विकास और महंगाई का स्वरूप रिजर्व बैंक के लिए असमंजस की स्िथिति पैदा कर रहा है।

मौजूदा परिस्थितियों में दरों में बढ़ोतरी की जाए, इस बात का निर्णय लेना न सिर्फ भारतीय रिजर्व बैंक के लिए मुश्किल है, बल्कि दुनिया के दूसरे देश भी असमंजस की इस स्थिति को झेल रहे हैं। अगर दरें जल्दबाजी में बढ़ाई जाती हैं तो सुधार पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। वहीं, अगर इसमें देरी होती है, तो महंगाई अनियंत्रित हो सकती है।

मौद्रिक नीति का अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक असर होता है, इसलिए इसे पूरी समझदारी से तय किया जाना चाहिए। मंट उम्मीद करता हूं कि अब रिजर्व बैंक को बेहतर नीति अपनानी चाहिए ताकि खाद्य वस्तुओं की आसमान छूती महंगाई को रोका जा सके। महंगाई पर लगाम लगाने के लिए सुधार का इंतजार करना खतरनाक हो सकता है।

इससे हो सकता है कि बढ़ती महंगाई को रोकने में जरूरत से ज्यादा देर हो जाए। जनवरी में रिजर्व बैंक नकद आरक्षित अनुपात में बढ़ोतरी और अल्पकालीन ब्याज दरों में 25 आधार अंकों की वृद्धि के साथ शुरुआत कर सकता है। सुधार की रफ्तार और महंगाई के दबाव दोनों का असर ब्याज दरों के बदलावों पर होगा।

अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं होगी दरों में बढ़ोतरी
चंद्रजीत बनर्जी
महानिदेशक, सीआईआई

जैसे-जैसे भारत और बाकी दुनिया वैश्विक आर्थिक संकट से बाहर निकलने के संकेत दे रहे हैं, रिजर्व बैंक का काम और जटिल होता जा रहा है। आर्थिक सुधार अपने आप में इतनी मजबूत स्थिति में नहीं है कि ब्याज दर में अधिक बढ़ोतरी को झेल सके।

हालांकि, कोई भी कदम उठाने से पहले उसके संभावित परिणामों पर गौर करना चाहिए। जल्द सख्त रुख अपनाने और फिलहाल इंतजार करने की नीति, दोनों के फायदे-नुकसान की पड़ताल करना सही होगा। हालांकि, औद्योगिक विकास के हालिया आंकड़े काफी आकर्षक हैं, लेकिन इसे लेकर संदेह है कि मौद्रिक राहत वापस लिए जाने पर यह टिक पाएगा या नहीं।

ब्याज दरों में बढ़ोतरी मांग को कम कर सकती है। मांग में कमी उद्योगों को अपनी नीति में बदलाव करने पर मजबूर कर सकता है। इसका कंपनियों का निवेश योजनाओं पर नकारात्मक असर पर सकता है।

पिछले साल की तरह इस साल भी मॉनसून ने धोखा दिया, तो इसका खासा असर ग्रामीण लोगों की आय पर होगा। इस तरह, कुल मिलाकर उपभोक्ता मांग घटेगी, इसलिए काफी हद तक संभव है कि विकास की ताजा मांग को आसान मौद्रिक नीति से सहारा दिया जाए।

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और थोक मूल्य सूचकांक दोनों में महंगाई बढ़ने के पीछे मुख्य वजह खाद्य वस्तुओं की लगातार बढ रही कीमतें हैं। अन्य वस्तुओं की तुलना में पिछले काफी समय से खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी से इजाफा हो रहा है। दिसंबर के दौरान खाद्य उत्पादों की कीमतें 19 से 20 फीसदी बढ़ी हैं। इसलिए मौद्रिक नीति इस समस्या का समाधान करने में कितना सफल हो पाएगी, इस बात पर संदेह है।

फिलहाल समस्या सिर्फ कृषि क्षेत्र में है। ऐसे में मौद्रिक नीति को सख्त किया जाना तमाम क्षेत्रों के लिए एक रूखा कदम है, जबकि इलाज की जरूरत सिर्फ एक क्षेत्र को है। वैश्विक वित्तीय संकट के बाद सरकारी ऋण में अचानक हुई बढ़त की वजह से भारत में ब्याज दर पहले से ही ज्यादा हैं।

10 साल के सरकारी प्रतिभूति पर बेंचमार्क आय जनवरी 2009 के 5.0 फीसदी से बढ़कर फिलहाल 7.6 फीसदी पर है। इसने कुछ हद तक आसान मौद्रिक नीति के असर को कम किया है। इससे नीति में जिस सीमा तक दरें कम की गईं उस हद तक वास्तविक उधारी दरों में कमी नहीं हई।

बैंकों के पास अतिरिक्त नकदी है। इसलिए औद्योगिक हालात सुधरने की वजह से 12 सालों के सबसे निचले स्तर पर पहुंचने के बाद एक बार फिर बैंकों की तरफ से बांटे जा रहे ऋण में बढ़ोतरी हो रही है। अगर इस समय रिजर्व बैंक दरों में वृद्धि करता है, तो इससे बैंकों को व्यावसायिक उधारी कम करने का प्रश्रय मिलेगा।

उपभोक्ता मांग कम होने से औद्योगिक निवेश घट सकता है। बैंक ब्याज दर घटाकर उन्हें आकर्षित करने के बजाए सरकारी बॉन्डों का रुख करेंगे। मौद्रिक नीति में सख्ती से सिर्फ बॉन्ड आमदनी बढ़ेगी। इससे सरकार की ब्याज लागत बढ़ेगी।

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