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ये हैं भारत की आर्थिक नीति के 10 मिथक
आर्थिक नीति निर्माण में मिथक की ताकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन मिथक के बारे में विस्तार से बता रहे हैं
शंकर आचार्य /  January 15, 2010

भारत और शायद कई अन्य देशों में आर्थिक नीति मौजूदा शक्तिशाली मिथक और पूर्वग्रहों से नियंत्रित होती है।

कभी कभी ऐसा लगता है कि ठीक से विचार न किए जाने या तथ्यों की उपेक्षा से ही ये मिथक बनते हैं। कभी कभी इन धारणाओं या मिथकों को मजबूत निहित स्वार्थों की वजह से समर्थन मिलता है। या फिर ये तीनों बातें देखने को मिलती हैं।

मिथक की वजह चाहे जो भी हो, आर्थिक नीति निर्माण में इनकी ताकत को नजरअंदाज करना कठिन है। मेरे चुनिंदा 10 मिथक इस प्रकार हैं जिनमें कुछ नए तो कुछ पुराने हैं:

किसानों के अनाज के लिए उच्चतम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) अच्छा है : ऐसा नहीं है। हां, यह उन कुछ किसानों के लिए अच्छा है जिनके पास बड़ी मात्रा में बिक्री योग्य अधिशेष है और वे सरकारी खरीद कार्यक्रमों का लाभ उठाने के लिए तैयार हैं। लेकिन बड़ी तादाद में भारतीय किसान (खासकर गरीब किसान) ऊंची खाद्य कीमतों की वजह से परेशान हैं।

इसका सीधा कारण यह है कि वे इस अनाज के शुद्ध खरीदार हैं। और जब लाखों भूमिहीन श्रमिकों को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो यह स्पष्ट है कि गेहूं और चावल के लिए ऊंची एमएसपी ग्रामीण परिवारों के लिए काफी चिंताजनक है।

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से करों का बोझ घटेगा : ऐसी उम्मीद नहीं है! या फिर पहले से ही व्याप्त राजकोषीय घाटा और बढ़ेगा। सरकार की सुविचारित अपनी घोषणाओं में ऐसे सुधार के दावे किए जाते हैं, जिनसे या तो राजस्व पूर्ववत रहेगा या फिर इसमें इजाफा होगा।

लेकिन कई लोग कहते हैं कि कम कर बोझ की बात कहना भ्रामक है। इस सुधार के पीछे तर्क कर राहत नहीं है बल्कि उन दोषपूर्ण प्रोत्साहनों और बाधाओं एवं अनिश्चितताओं से कुछ हद तक राहत है जो विविध अप्रत्यक्ष करों की मौजूदा प्रणाली में व्याप्त हैं।

जब मुद्रास्फीति आपूर्ति की खामियों की वजह से हो, तो इसके लिए मौद्रिक नीति जिम्मेदार नहीं है : ऐसा नहीं है। सच्चाई यह है कि मुद्रास्फीति की मात्रा और अवधि आपूर्ति की कमी (जैसे, सूखा) पर निर्भर करती है। यदि तरलता अत्यधिक है तो मुद्रास्फीति का परिणाम अधिक होगा। यदि तरलता दबाव की स्थिति में है तो मूल्य वृद्धि में कमी आएगी। अवश्य ही मौद्रिक नीति को सख्त बनाए जाने का कार्य उत्पादन विस्तार में कमी ला सकता है।

हमारे श्रमिक कानून मजदूरों को संरक्षण देते हैं : असल में ठीक इसका उलटा है। श्रमिकों की बड़ी तादाद के लिहाज से मौजूदा कानून एक छोटे अल्पसंख्यक समूह (भारत के 45 करोड़ से अधिक श्रमिकों का लगभग 5 फीसदी, जिसमें सरकारी कर्मचारी शामिल नहीं हैं) को जरूरत से ज्यादा संरक्षण देते हैं।

संगठित क्षेत्र में श्रमिकों की छंटनी को बेहद कठिन बना कर हमारे मौजूदा कानूनों ने संगठित उद्यमों में नए श्रमिकों के रोजगार को व्यापक पैमाने पर निरुत्साहित किया है। हमारे कानून रोजगार-विरोधी हैं और इनकी वजह से हमारे संसाधनों का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता है।

विनिमय दर का सिर्फ निर्यातकों से वास्ता है : यह एक गलत आम धारणा है। यहां तक कि प्रशिक्षित अर्थशास्त्रियों के बीच भी यह मौजूद है। दरअसल, विनिमय दर अर्थव्यवस्था में बेहद महत्त्वपूर्ण कीमत है जो सभी व्यापार योग्य वस्तुओं और सेवाओं के साथ साथ गैर-व्यापार योग्य वस्तुओं (जैसे, दिल्ली में हेयरकट या मुंबई में रेस्टोरेंट में भोजन) से संबंधित लाभ को बड़े पैमाने पर प्रभावित करती है।

इस प्रकार रुपये में तेजी न सिर्फ निर्यात को कम लाभदायक बनाती है बल्कि इससे आयात विकल्पों के व्यापक दायरे को भी नुकसान पहुंचता है। इसमें ऐसे सामान एवं सेवाएं शामिल हैं जो बाहर से आयातित सामान से प्रतिस्पर्धा में हमारे घरेलू बाजार के लिए तैयार किए जाते हैं।

राजकोषीय घाटे में कमी विकास के लिए नुकसानदायक है : मौजूदा माहौल में, बड़ी चिंता यह है कि मौजूदा उच्च राजकोषीय घाटे (जीडीपी के 10 फीसदी से अधिक) में कमी विकास को बाधित करेगी। 2008-09 और 2009-10 का राजकोषीय घाटा वैश्विक संकट के संकुचनकारी प्रभावों का मुकाबला करने में शायद न्यायसंगत था।

लेकिन ये राजकोषीय घाटे न तो सतत थे और न ही स्थायी थे और न ही वांछनीय। दरअसल, भारतीय अर्थव्यवस्था उस दौरान तेजी से बढ़ी जब राजकोषीय घाटा कम किया जा रहा था (1992-97 और 2003-08) और उस वक्त इसकी रफ्तार धीमी हो गई थी जब यह राजकोषीय घाटा (1997-2002) बढ़ रहा था। इसकी वजह यह है कि कम सरकारी उधारी सामान्यत: अधिक सफल निजी निवेश को आसान बनाती है।

खाद्य, ईंधन और बिजली पर रियायत से मुख्यत: गरीबों को मदद मिलती है : ऐसा नहीं है। खाद्य रियायत उन सिर्फ चार या पांच राज्यों में मुख्यत: धनी किसानों और उपभोक्ताओं की मदद करती है  जहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली काफी असरदार है।  भारत में गरीबों का एक बड़ा हिस्सा रियायती अनाज तक प्रभावी पहुंच बनाने में सक्षम नहीं है।

कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और केरोसिन पर बड़ी सब्सिडी मुख्यत: उन संपन्न शहरी परिवारों को मिलती है जो कारों और एसयूवी से लैस होते हैं। कृषि के लिए बिजली पर व्यापक सरकारी सब्सिडी से बिजली वितरण नेटवर्क के विकास को कमजोर बनाने और हमारे गांवों को अंधेरे में रखे जाने को बल मिला है।

विदेशी पूंजी की आवक हमारी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी है : 20 साल पहले ज्यादातर भारतीयों की सोच इसके उलट थी। निजी विदेशी पूंजी प्रवाह ठीक नहीं था और इससे हमारी स्थिति और बदतर हुई। इस दिशा में पिछले दो दशकों में पारंपरिक ज्ञान आया है।

दरअसल, 1997-98 के एशियाई संकट और 2008-09 के वैश्विक आर्थिक संकट, दोनों ने यह दिखा दिया कि किसी विकासशील देश में विदेशी पूंजी प्रवाह का मिला-जुला असर होता है।

विशेष कर भारत के लिए, 2005-08 की पूंजी प्रवाह तेजी ने विनिमय दर में तेज बढ़ोतरी, अत्यधिक घरेलू तरलता और संपत्ति की कीमतों में उछाल जैसी गंभीर समस्याएं पैदा कर दीं। हमारे नीति-निर्माताओं, जिनमें तत्कालीन आरबीआई गवर्नर वाईवी रेड्डी भी शामिल हैं, ने ऐसे हालात में पूंजीगत लेखा प्रबंधन की जरूरत को समझा है।

इन्फ्रास्ट्रक्चर में निजी व्यवस्था सरकार के लिए प्रभावी विकल्प हो सकती है : आज निजी सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी) का बोलबाला है। चूंकि सरकार से बिजली, सड़क, बंदरगाह, पानी, सफाई आदि की सुविधा पर्याप्त रूप से मुहैया कराने में विफल रही है, इसलिए इससे मुक्ति के लिए हमें पीपीपी की तरफ मुड़ना चाहिए।

अवश्य ही यह एक बड़ा और उपयोगी कदम है जिसमें निजी क्षेत्र हमारे इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में अहम भूमिका निभा सकता है। लेकिन वैश्विक तौर पर मिलने वाला अनुभव यह बताता है कि सरकार को इस क्षेत्र में अहम भूमिका बरकरार रखनी चाहिए।

व्यापारी (या बिचौलिए) हमारी कई आर्थिक समस्याओं की जड़ हैं : यह हमारी हीन और तुच्छ धारणाओं में से एक है। जब मुद्रास्फीति की दर बढ़ती है तो सरकार लालची व्यापारियों को दोषी मानती है और उनकी जमाखोरी और अन्य गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए नियम लागू करती है।

लेकिन सच्चाई यह है कि किसी अर्थव्यवस्था के कुशल संचालन के लिए व्यापारियों की भूमिका बेहद अहम है। दुर्भाग्य से, गलत धारणाओं या मिथकों का अपना प्रभाव है।

(लेखक आईसीआरआईईआर के मानद प्रोफेसर और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं। ये विचार उनके निजी हैं।)

Keyword: India, economic policy, farmers, GST, labour law,
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