| मध्यस्थ दे सकता है ब्याज भुगतान का आदेश | | अदालत से | | | बीएस / October 25, 2009 | | | | |
सर्वोच्च न्यायालय ने 'इंडियन ह्यूम पाइप कंपनी लिमिटेड बनाम राजस्थान सरकार' मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय का फैसला निरस्त कर दिया और मध्यस्थ का फैसला बहाल कर दिया।
कंपनी और राज्य सरकार के बीच विवाद पैदा हो जाने के बाद यह मामला तीन मध्यस्थों के पास चला गया। उन्होंने पूर्व-संदर्भ अवधि से ब्याज सहित रकम चुकाए जाने का कंपनी का दावा स्वीकार कर लिया और फैसले की तारीख से भुगतान की तारीख तक ब्याज के भुगतान का आदेश दिया था।
राज्य सरकार की अपील पर उच्च न्यायालय ने तीन चरणों में ब्याज का फैसला रद्द कर दिया। इसके बाद कंपनी ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय ने फैसला दिया कि आर्बिट्रेटर को तीनों चरणों में ब्याज भुगतान का आदेश देने का अधिकार हासिल है।
स्थानापन्न मध्यस्थ नियुक्त नहीं किया जा सकता
सर्वोच्च न्यायालय ने 'एसबीपी ऐंड कंपनी और पटेल इंजीनियरिंग लिमिटेड' मामले में तीसरे मध्यस्थ के तौर पर न्यायाधीश एम एन चंदूरकर की नियुक्ति को लेकर बंबई उच्च न्यायालय का आदेश रद्द कर दिया है। पटेल इंजीनियरिंग कंपनी को कोयना पनबिजली परियोजना से संबद्ध कार्य के लिए एक ठेका दिया गया था।
कंपनी ने इस कार्य का एक हिस्सा एसबीपी को उप-अनुबंध के तहत सौंप दिया। जब दोनों कंपनियों के बीच विवाद पैदा हो गया तो एसबीपी ने आर्बिट्रेशन क्लॉज की मांग की और अपनी ओर से मध्यस्थ के तौर पर सेवानिवृत्त मुख्य इंजीनियर को नियुक्त कर लिया।
मामला बंबई उच्च न्यायालय के पास गया तो उसने आर्बिट्रेशन ऐंड कंसीलिएशन ऐक्ट की धारा 11 के तहत तीसरे मध्यस्थ के तौर पर न्यायाधीश को नियुक्त कर दिया। लेकिन एसबीपी सर्वोच्च न्यायालय में चली गई। सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि समझौते के मुताबिक इसमें सब्सटीटयूट आर्बिट्रेटर यानी स्थानापन्न मध्यस्थ नियुक्त नहीं किया जा सकेगा।
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