| कौशल के विकास की दरकार | | संपादकीय / October 22, 2009 | | | | |
भारत में काम कर रहे चीनी श्रमिकों के वीजा की प्रकृति के मुद्दे पर हाल में हुए विवाद को महज भारत और चीन के बीच तनाव की ताजा कड़ी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
यह भारत सरकार की उस असफलता को भी दर्शाता है जिसके तहत सरकार भारत के श्रम शक्ति के बीच पर्याप्त मात्रा में कुशल श्रमिक तैयार नहीं कर सकी है। सच्चाई यह है कि सरकारी क्षेत्र सहित भारतीय कंपनियां तकनीकी उपकरणों के संचालन में सक्षम श्रम शक्ति का आयात करने के लिए मजबूर हैं।
मेट्रो रेल निर्माण और दूरसंचार परियोजनाएं इस बात का उदाहरण हैं। इस संदर्भ में इस सप्ताह की शुरूआत में राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (एनएसडीसी) की शुरुआत को एक सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा सकता है।
एनएसडीसी 51 प्रतिशत और 49 प्रतिशत सार्वजनिक निजी साझेदारी वाला उपक्रम है और इसका लक्ष्य 2022 तक 30 प्रतिशत श्रमिकों को कुशल बनाना है। यह लक्ष्य काफी प्रभावशाली लगता है, लेकिन भारत में कौशल विकास की मौजूदा परिपाटी को देखते हुए यह लक्ष्य काफी महत्वाकांक्षी लगता है।
केंद्र और राज्य स्तर पर किसी के लिए भी यहां व्यावसायिक प्रशिक्षण देने वाले संस्थानों की कोई कमी नहीं है। करीब 17 मंत्रालय पहले ही 35 लाख लोगों को व्यावसायिक प्रशिक्षण दे चुके हैं। भारत में 1,200 से अधिक पॉलीटेक्निक, 5,000 से अधिक औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान हैं। इनमें से ज्यादातर निजी क्षेत्र के द्वारा संचालित किये जाते हैं।
इसके अलावा हजारों की संख्या में राज्य स्तरीय प्रशिक्षण संस्थान और निजी क्षेत्र द्वारा संचालित केंद्र हैं। इसके बावजूद भारत गुणवत्ता और संख्या के लिहाज से कुशल श्रमिकों की गंभीर कमी से जूझ रहा है। योजना आयोग का आकलन बताता है कि भारत की श्रम शक्ति में प्रतिवर्ष शामिल होने वाले 1.28 करोड़ नए श्रमिकों में से ज्यादातर के पास कौशल प्रशिक्षण का कोई अवसर नहीं होता है।
अधिक चिंताजनक स्थिति यह है कि केवल 2 प्रतिशत श्रमिकों को ही कुशलता का प्रशिक्षण मिलता है और 80 प्रतिशत ग्रामीण और शहरी श्रमिकों के पास बाजार की जरूरतों के मुताबिक कुशलता नहीं होता है। यह सही है कि साक्षरता की दर इस दिशा में एक बड़ी बाधा है क्योंकि निरक्षर श्रमिकों को प्रशिक्षित करना अधिक कठिन है और भारत के करीब 40 प्रतिशत श्रमिक इसी श्रेणी से हैं।
लेकिन ये आंकड़े समस्या का हिस्सा भर हैं। दूसरा पहलू प्रशिक्षण की गुणवत्ता से जुड़ा है। केवल कुछ लोगों को ही किस्मत से अच्छा प्रशिक्षण मिल पाता है। एनएसडीसी इन मुद्दों का मुकाबला करने पर खासतौर से ध्यान केंद्रित कर रहा है और इसके लिए प्रशिक्षण एजेंडे पर फोकस किया जा रहा है। निगम प्रशिक्षण की गुणवत्ता को नियमित करने के लिए संस्थागत ढांचे का इस्तेमाल कर रहा है।
लेकिन यहां कुशल श्रमिकों की कमी का समाधान इतना सा नहीं है। शायद अधिक संख्या में संस्थानों की आवश्यकता हो लेकिन मजबूत नियमन व सही नीतियों की सबसे अधिक जरूरत है, जैसी चीन व सिंगापुर ने अपनाई हैं। कुशलता विकास की जरूरत को और नहीं टाला जा सकता है।
योजना आयोग ने भी बताया है, भारत को जनसांख्यिकीय बढ़त हासिल है। यहां दुनिया की सबसे अधिक युवा आबादी रहती है। अगर कौशल की कमी के कारण आर्थिक विकास प्रभावित होता है तो यह डरावना होगा।
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