बिजनेस स्टैंडर्ड - केंद्रीय बैंक और संतुलन कायम करने की चुनौती
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केंद्रीय बैंक और संतुलन कायम करने की चुनौती

अजय शाह /  06 14, 2018

रिजर्व बैंक को मुद्रास्फीति, विनिमय दर और सरकारी कर्ज के बीच संतुलन कायम करने का कठिन काम अंजाम देना है। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह

 
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का प्रमुख लक्ष्य है 4 फीसदी की खुदरा महंगाई दर निर्धारित करना। उसके दो अन्य लक्ष्य भी हैं: एक तो विनिमय दर नीति और दूसरा सार्वजनिक ऋण प्रबंधन। इन लक्ष्यों के बीच तनाव का रोचक माहौल बनता नजर आ रहा है। ऊंची ब्याज दर से विनिमय दर का बचाव किया जा सकता है और सरकारी बॉन्ड की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है। परंतु उससे अर्थव्यवस्था में धीमापन आएगा और मुद्रास्फीति भी 4 फीसदी से नीचे जा सकती है। आने वाले वर्ष में मौद्रिक नीति का संबंध भी ऐसे ही विरोधाभासी तथ्यों से निपटने का रहेगा। 
 
सन 1934 में अपनी स्थापना के बाद से फरवरी 2015 तक आरबीआई का कोई उल्लिखित लक्ष्य नहीं था। इससे भ्रम पैदा होने लगा। आरबीआई ने बार-बार अपने लक्ष्य बदले और किसी भी लक्ष्य को हासिल करने के मामले में उसकी विश्वसनीयता बाजार की नजर में कम होने लगी। इस क्षेत्र में नियमों और विवेकाधीन अधिकार के बीच तनाव जगजाहिर है। जब कभी विवेकाधिकार बहुत अधिक होते हैं तब प्रभाव में कमी आती है। एक केंद्रीय बैंक तभी शक्तिशाली बनता है जबकि उसके पास लक्ष्यों को बदलते रहने का विवेकाधिकार नहीं हो। पुराने माहौल में आरबीआई के प्रभाव को नुकसान पहुंचता था। इन समस्याओं की बदौलत मुद्रास्फीति बढ़ी और उसमें परिवर्तन आने लगे, विनिमय दर का संकट उत्पन्न हुआ और वित्तीय अस्थिरता आई।
 
मुद्रास्फीति देश की बड़ी आबादी को प्रभावित करती है। अच्छा अर्थशास्त्र और अच्छी राजनीति पूरी सुसंगता से इस बात पर ध्यान देती हैं कि मौद्रिक नीति एक काम को पूरा करे और वह है मुद्रास्फीति को 4 फीसदी के दायरे में रखना। फरवरी 2015 में मौद्रिक नीति फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इसमें 4 फीसदी महंगाई को आरबीआई का लक्ष्य बनाया गया। इसे फरवरी 2016 में आरबीआई अधिनियम में स्थान दिया गया। अब आरबीआई के इतिहास में पहली बार उसे वैधानिक तौर पर मुद्रास्फीति को कम और स्थिर रखने का काम सौंपा गया है। 
 
आरबीआई का लक्ष्य तय होने से मौद्रिक नीति की विश्वसनीयता में सुधार हुआ। धीरे-धीरे यह समझा गया है कि आरबीआई 4 फीसदी खुदरा महंगाई हासिल करने की ही दिशा में काम करेगा। सामान्य तौर पर मुद्रास्फीति को लक्षित करने वाली नई व्यवस्था से लाभ हासिल होने में कई वर्ष का समय लग जाता है। हमारे यहां तो वर्ष 2015 में की गई घोषणा के बाद से ही इसके बेहतर परिणाम नजर आने लगे हैं। आरबीआई के उद्देश्य स्पष्ट करने की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। सामान्य तौर पर दुनिया भर में मुद्रास्फीति के लक्ष्य में इजाफा विनिमय दर को मुक्त करने के साथ होता है। केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति की जवाबदेही लेता है और विनिमय दर बाजार से निर्धारित होने वाली बन जाती है। भारत के मामले में हमने वर्ष 2008-2013 की अवधि में इस बदलाव को बाजार से जोड़ा था लेकिन बाद में यह क्रम उलट गया।
 
दूसरी समस्या सरकार के लिए बॉन्ड जारी करने से संबंधित है। फिलहाल आरबीआई सरकार के लिए ऋण प्रबंधन का काम करता है। इससे उसे सरकार के लिए सस्ता ऋण सुरक्षित करने और ब्याज दर कम रखने का लक्ष्य भी मिलता है। संभव है यह समय-समय पर मुद्रास्फीति के लक्ष्य के साथ सुसंगत न नजर आए। जब किसी केंद्रीय बैंक के लक्ष्यों के बीच टकराव होता है तो भी इससे हर रोज दिक्कत नहीं आती है बल्कि यह दिक्कत कुछ खास अवसरों पर पैदा होती है। उदाहरण के लिए जब आरबीआई ने 2008 के संकट के बाद दरों में तेज कटौती की थी तब यह ऋण प्रबंधन के लक्ष्य के लिए बेहतर था। 
 
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से इस वर्ष दो तीन बार दरों में बढ़ोतरी की जा सकती है। वैश्विक आर्थिक और भूराजनैतिक जोखिम की बदौलत वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता में इजाफा हो सकता है। इन हालात में आमतौर पर उभरते बाजारों में पूंजी की आवक की स्थिति पलट सकती है, खासतौर पर भारत के संदर्भ में।  इससे रुपये पर अवमूल्यन का दबाव बनेगा। आरबीआई के पास यह विकल्प है कि वह ऋण में पूंजीगत आवक को आकर्षित करने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी करे। उदाहरण के लिए वर्ष 2013 में 91 दिनों की दर में 400 आधार अंक की बढ़ोतरी की गई थी  ताकि विनिमय दर को बचाया जा सके। परंतु उस वक्त आरबीआई के पास कई लक्ष्यों से निपटने का दायित्व था। आज एमपीसी दरों का चयन 4 फीसदी की खुदरा महंगाई को ध्यान में रखकर करता है। एक अन्य समस्या सार्वजनिक ऋण प्रबंधन की है। आरबीआई सरकार का ऋण प्रबंधक भी है। इस क्षमता में उसके पास यह लक्ष्य है कि वह कम लागत और जोखिम वाला ऋण सरकार के लिए जुटाए। इसके लिए जाहिर है वह लंबी अवधि की परिपक्वता वाले बॉन्ड कम दरों पर बेचना चाहेगा।
 
बीते एक साल में यह काम कठिन हो गया है। अगर वैश्विक जिंस कीमतें ऊपर जाती हैं और मुद्रास्फीति को प्रभावित करती हैं तो आरबीआई को मुद्रास्फीति को 4 फीसदी पर रखते हुए दरें बढ़ानी होंगी। 10 वर्ष की दर को अगले एक दशक के लिए अल्पावधि के अनुमानित मूल्यांकन का औसत माना जा सकता है। लंबी अवधि के बॉन्ड ब्याज दरों को लेकर संवेदनशील होते हैं। 10 वर्ष की ब्याज में हर एक फीसदी बढ़ोतरी पर बॉन्ड की कीमत 10 प्रतिशत तक गिर जाती है। बैंक इस पूंजीगत नुकसान को लेकर भयभीत रहते हैं। खासतौर पर तब जबकि वे पहले ही फंसे हुए कर्ज की समस्या से दो चार हों।
 
यहां एक बात यह भी है कि लंबी अवधि की दरों के ऊपर जाने के क्रम में निवेशक दीर्घावधि के बॉन्ड से दूरी बना रहे हैं और इससे लंबी अवधि के बॉन्ड की कीमतों में गिरावट आ रही है। सामान्य वित्तीय बाजारों में प्रतिभागियों में काफी विविधता होती है जो ऐसी प्रतिपुष्टिï को रोकती है। भारत के सरकारी बॉन्ड बाजार में देसी प्रतिभागी बहुत सीमित मात्रा में हैं। विदेशी निवेशक और म्युचुअल फंड स्वैच्छिक प्रतिभागी हैं लेकिन अधिकांश अन्य नहीं। इससे जोखिम बढ़ जाता है। आरबीआई की पहेली यह है कि मौजूदा सांस्थानिक माहौल में भविष्य में इन जटिलताओं से कैसे निपटा जा सकता है?
 
मुद्रास्फीति को लक्ष्य बनाने से देश में वृहद आर्थिक स्थिरता से जुड़ा एक नया तत्त्व जुड़ा है। लंबी अवधि के दौरान हमें शेष हिस्सों में भी संस्थागत सुधार का काम करना चाहिए। इस दौरान विनिमय दर भी बाजार द्वारा निर्धारित होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त एक स्वतंत्र ऋण प्रबंधन एजेंसी और एक जीवंत बॉन्ड बाजार होना चाहिए जो निरंतर सरकार के घाटे की भरपाई करने में सक्षम हो।
Keyword: bank, loan, debt, RBI,,
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