बिजनेस स्टैंडर्ड - वीजा के शुल्क घटाने से नहीं बढ़ेगा डिजिटल लेनदेन
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वीजा के शुल्क घटाने से नहीं बढ़ेगा डिजिटल लेनदेन

मयंक जैन और निकहत हेटावकर / नई दिल्ली June 13, 2018

अग्रणी कार्ड नेटवर्क वीजा द्वारा हाल में डेटा प्रॉसेसिंग शुल्क में की गई भारी कटौती से नकदी पर निर्भर भारत में कॉर्ड की स्वीकार्यता को लेकर कोई खास असर नहीं पडऩे जा रहा है। उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने इसे सामान्य कारोबारी गतिविधि करार दिया है।  वीजा ने अपने 2,000 रुपये से कम के ट्रांजैक्शन पर शुल्क में 95 प्रतिशत तक कटौती कर दी है। साथ ही कंपनी ने ज्यादा मूल्य के भुगतान का शुल्क भी 2.99 रुपये से घटाकर 1.5 रुपये कर दिया है। सामान्यतया यह शुल्क बैंक शुल्क के साथ जुड़े होते हैं इसका वहन कारोबारियों को करना होता है। 
 
कंपनी को उम्मीद है कि दरें कम करने से डिजिटल स्वीकार्यता बढ़ेगी और उपïभोक्ता व कारोबारी दोनों ही इसका स्वागत करेंगे। वीजा के प्रवक्ता ने कहा, 'पिछले 18 महीनों से डेबिट कार्ड भारतीय ग्राहकों के लिए एटीएम से नकदी निकासी के साधन के अलावा ताकतवर डिजिटल भुगतान का साधन बना है। हमें विश्वास है कि देश के 80 करोड़ डेबिट कार्ड धारक भारत को डिजिटल बनाए जाने की कवायद में अहम भूमिका निभाएंगे।'  बहरहाल इस कटौती से डिजिटल लेनदेन पर कोई खास असर पडऩे की संभावना नहीं है, भले ही लेनदेन का बड़ा हिस्सा 2,000 रुपये से नीचे का होता है। इसकी प्रमुख वजह मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) का मौजूदा ढांचा है। विशेषज्ञों का कहना है कि जिस तरह से एमडीआर का ढांचा तैयार किया गया है, शुल्क का बोझ कार्ड जारी करने वाले व कारोबारी को उठाना पड़ता है और एग्रीगेटर पर बहुत कम बोझ पड़ता है। इस समय 2,000 रुपये तक के लेन देन पर एमडीआर 0.4 प्रतिशत और इससे ऊपर की राशि के लिए 0.9 प्रतिशत है, जो डेबिट कार्डों पर लिया जाता है। 
 
बहरहाल नोटबंदी के बाद सरकार ने कहा कि डिजिटल लेन देन बढ़ा है और छोटे लेन देन पर कारोबारियों के लिए छूट की योजना पेश की गई। इस योजना के तहत कारोबारी को डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड से 2,000 रुपये तक के भुगतान स्वीकार करने पर कोई शुल्क नहीं देना पड़ता है। ऐसे लेन देन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क  बैंकों को वहन करना होता है और सरकार इसके लिए सब्सिडी देती है।  विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह से देखें तो इस कटौती का सिर्फ बैंकों को लाभ होगा क्योंकि उनके परिचालन लागत में कमी आएगी। बहरहाल इसके बावजूद असर नहीं होगा क्योंकि मास्टरकार्ड और वीजा उनकी लागत का एक बहुत छोटा हिस्सा लेते हैं। भुगतान उद्योग के कारोबारियों ने भी बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि यह एकतरफा बदलाव नहीं है, कार्ड नेटवर्क हर तिमाही में अपनी लागत की समीक्षा करते हैं और ढांचे में उसके मुताबिक फेरबदल होता है। 
 
पेयू के एमडी जितेंद्र गुप्ता ने कहा, 'इससे किसी की जिंदगी में खास बदलाव नहीं होने जा रहा है। सिर्फ बैंकों के डिजिटल लेन देन की प्रक्रिया थोड़ी सी सस्ती होगी।' उन्होंने कहा कि ये नेटवर्क हर तिमाही में शुल्क बदलते हैं और वीजा के मामले में कुछ भी नया नहीं है। सरकार इस श्रेणी में पहले ही सब्सिडी दे रही है। ऐसे में देश में कार्ड की स्वीकार्यता बढऩे को लेकर कोई सुधार नहीं होने जा रहा है।  अगर भारत में प्लास्टिक मनी के इस्तेमाल की स्थिति देखें तो इसकी पहुंच बहुत कम है। रिजïर्व बैंक के आंकड़ों के मुता िभारत में सिर्फ 18 लाख प्वाइंट आफ सेल मशीन थीं, जो अब बढ़कर 30 लाख हो गई हैं। बहरहाल देश में कुल लेनदेन में क्रेडिट कार्ड की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत है, जबकि कुल जारी किए गए प्लास्टिक कार्ड में 96 प्रतिशत डेबिट कार्ड हैं। इससे कारोबारियों द्वारा इसे स्वीकार करने के खराब बुनियादी ढांचे का पता चलता है।  पेमेंट काउंसिल आफ इंडिया के चेयरमैन नवीन सूर्या ने कहा कि यह रुपे की बढ़ती दखल को देखते हुए उठाया गया कदम भी हो सकता है, जिसे अब 1,000 बैंक जारी कर रहे हैं। सूर्या ने कहा कि यह बाजार संचालित नियमित बदलाव है, सभी पेमेंट नेटवर्क अपने कारोबार की समय समय पर समीक्षा करते हैं। 
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