बिजनेस स्टैंडर्ड - वेतन में घटेगा भत्तों का वजन!
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Thursday, June 21, 2018 02:31 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम जिरह खबर

वेतन में घटेगा भत्तों का वजन!

सोमेश झा / नई दिल्ली 06 13, 2018

सरकार का प्रस्ताव, मूल वेतन के 50 फीसदी से अधिक नहीं होंगे अन्य भत्ते
मूल वेतन का हिस्सा बढऩे से पीएफ, ग्रैच्युटी आदि में बढ़ेगा कर्मचारियों का अंशदान
इस प्रस्ताव से कर्मचारियों के हाथों में कम पैसा आएगा, नियोक्ता की बढ़ेगी लागत
कर्मचारियों की कर योग्य आय में भी होगा इजाफा, बढ़ेगी कर देनदारी

निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन ढांचे में जल्द बदलाव आ सकता है क्योंकि सरकार श्रम कानून में सुधार लाने की योजना बना रही है। इसके तहत सरकार चाहती है कि कर्मचारियों के पारिश्रमिक में मूल वेतन का हिस्सा ज्यादा हो ताकि सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में उनका अंशदान बढ़ सके। सरकार के प्रस्ताव के अनुसार वेतन में मूल वेतन का हिस्सा ज्यादा होना चाहिए। हालांकि इससे कर्मचारियों के हाथ में आने वाला वेतन कम हो सकता है क्योंकि भविष्य निधि और ग्रैच्युटी में उनका अंशदान बढ़ जाएगा, वहीं कर देनदारी भी बढ़ सकती है।

सरकार का प्रस्ताव है कि वेतन का ढांचा ऐसा होना चाहिए जिसमें कर्मचारियों को दिए जाने वाले भत्ते, जैसे मकान का किराया, बोनस, अवकाश यात्रा भत्ता, ओवरटाइम भत्ता अािद कुल मूल वेतन के 50 फीसदी से अधिक न हो। इस सीमा से ऊपर कर्मचारी को दिया जाने वाला कोई भी वेतन मद को मूल वेतन माना जाएगा। इससे कर्मचारियों के भविष्य निधि, गै्रच्युटी में योगदान बढ़ेगा। सरकार के इस कदम का कुछ श्रम संगठनों ने स्वागत किया है, वहीं उद्योग इसका विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्हें वेतन बिल बढऩे का डर सता रहा है।

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने सभी 19 कानूनों में वेतन की समान परिभाषा के लिए विस्तृत नोट तैयार कर किया है। मंत्रालय ने वेतन के लिए दो तरह की परिभाषा का प्रस्ताव दिया- पहला कर्मचारियों की सभी वित्तीय बाध्यताओं के लिए है, जिनमें पीएफ, ग्रैच्युटी, बीमा आदि शामिल हैं और दूसरा अन्य श्रम कानून के लिए है जो प्रस्तावित वेतन विधेयक संहिता 2017 का हिस्सा है। इस कवायद का मकसद यह है कि विभिन्न कानूनों के तहत वेतन की परिभाषा अलग-अलग है, जिस हिसाब से कर्मचारी, श्रम कानून से जुड़े इंसपेक्टर और अदालत उसकी अलग व्याख्या करते हैं।

उदाहरण के लिए पीएफ और पेंशन लाभ कर्मचारी भविष्य निधि कानून, 1952 के तहत आते हैं और इसकी गणना मूल वेतन, महंगाई भत्ता और कंपनी में बने रहने के भत्ते के आधार पर की जाती है। श्रम मंत्रालय ने कहा कि कई ऐसे मामले देखे गए हैं जिसमें मूल वेतन तथा महंगाई भत्ता को काफी कम यानी पूरे वेतन का 10 से 30 फीसदी रखा जाता है और बाकी वेतन अन्य भत्तों के तौर पर दिए जाते हैं।  भविष्य निधि में कंपनी और कर्मचारी दोनों आधा-आधा योगदान देते हैं।

वर्तमान में कर्मचारी मूल वेतन का 12 फीसदी अंशदान देते हैं जबकि नियोक्ता का हिस्सा भी 12 फीसदी होता है। मूल वेतन बढऩे से पीएफ, बीमा योजना, ग्रैच्युटी आदि में कर्मचारी का अंशदान बढ़ेगा। लेकिन इससे कंपनियों के वेतन बिल में भी इजाफा होगा।

भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) के महासचिव बृजेश उपाध्याय ने कहा, 'कर्मचारी का प्रतिनिधि होने के नाते मैं कह सकता हूं कि यह प्रोत्साहित करने वाला कदम है। इससे कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा एवं कल्याण में सुधार होगा। आमतौर पर  कंपनियां पीएफ में ज्यादा अंशदान देने से बचने के लिए मूल वेतन को कम रखती हैं।'  

सरकार के प्रस्ताव के अनुसार अगर किसी कर्मचारी का सकल वेतन 20,000 रुपये प्रतिमाह हो और मूल वेतन 8,000 रुपये है, तो भत्ते 4,000 रुपये से अधिक नहीं होंगे। इसका मतलब यह हुआ शेष 8,000 रुपये को भी मूल वेतन में शामिल कर पीएफ, ग्रैच्युटी और बीमा की कटौती की जाएगी।

मैक्स लाइफ इंश्योरेंस के निदेशक और मुख्य जन अधिकारी शैलेश सिंह ने कहा, 'इसके कई उदाहरण हैं कि कर्मचारियों का मूल वेतन कम रखा जाता है ताकि पीएफ में अंशदान कम हो। यह भी सच है कि नई पीढ़ी के युवा खर्च के हाथों में ज्यादा पैसे चाहते हैं। अधिकांश कर्मचारी कुल पारिश्रमिक के आधार पर काम करते हैं। अगर सेवानिवृत्ति कोष में अंशदान का हिस्सा बढ़ता है तो वेतन के अन्य मदों का हिस्सा कम करना होगा। सरकार को वेतन की परिभाषा में स्पष्टता लाने की जरूरत है।'

टीमलीज सर्विसेज की सह-संस्थापक रितुपर्ण चक्रवर्ती ने कहा कि वेतन ढांचे में बदलाव इस तरह से करना चाहिए जिससे कर्मचारियों के हाथों में वेतन का ज्यादा हिस्सा आए। उन्होंने कहा, 'भत्तों पर सीमा लगाने से कर्मचारियों के हाथों में कम पैसा आएगा। कर्मचारियों को वेतन ढांचा तय करने की आजादी होनी चाहिए।'

निजी क्षेत्र की एक फर्म के मानव संसाधन अधिकारी ने कहा कि अगर कुल वेतन में मूल वेतन का हिस्सा बढ़ाया जाता है तो पेट्रोल तथा टेलीफोन मद में प्रतिपूर्ति घट जाएगी। श्रम कानून विशेषज्ञों का कहना है कि इस कदम को नियोक्ताओं द्वारा अदालत में चुनौती दी जा सकती है। एक्सएलआरआई जमशेदपुर के प्रोफेसर केआर श्याम सुंदर ने कहा, 'मुझे नहीं लगता कि तय और वैरिएबल वेतन के ढांचे में क्या होना चाहिए, उसे निर्धारित करना कानूनी रूप से व्यवहार्य होगा। वेतन की परिभाषा में मदों का तो जिक्र है लेकिन वह कितना होगा उसका उल्लेख नहीं है।'

सरकार को वेतन की परिभाषा में बदलाव लाने के लिए ग्रैच्युटी कानून, 1952, कर्मचारी भविष्य निधि कोष एवं विविध प्रावधान अधिनियम, 1952 तथा कर्मचारी राज्य बीमा कानून, 1948 में संशोधन करना होगा।

Keyword: labor law, company, निजी क्षेत्र, वेतन, श्रम कानून, सुधार,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या पीएनबी धोखाधड़ी मामले की जांच में आएगा नया मोड़?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.