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रेलवे का असली काम स्कूल चलाना या ट्रेन!

विवेक देवरॉय /  06 06, 2018

भारत और पाकिस्तान जैसे कुछ देशों में ही रेलवे ट्रेन चलाने के अलावा स्कूलों का भी संचालन करता है। रेलवे स्कूलों की प्रासंगिकता का परीक्षण कर रहे हैं विवेक देवरॉय

 
जी हडलस्टन ईस्ट इंडियन रेलवे के मुख्य अधीक्षक थे। वर्ष 1906 में उन्होंने एक पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ द ईस्ट इंडियन रेलवे' लिखी थी जिसके एक अध्याय का शीर्षक 'हिल स्कूल' था।  ईस्ट इंडियन रेलवे कंपनी (ईआईआरसी) का गठन 1845 में हुआ था और उसने कई रेल लाइन बिछाई थीं। ईआईआरसी का 31 दिसंबर, 1879 को राष्ट्रीयकरण कर दिया गया लेकिन रेल लाइन 1919 तक की लीज पर उसे ही दे दी गईं।  हडलस्टन की किताब के मुताबिक, 'कंपनी में हिस्सेदारी लेने के बाद यह पता चला कि चार लाख रुपये से अधिक राशि सेविंग बैंक और फाइन फंड्स के नाम पर जमा है।' ऐसे में सवाल उठा कि इस रकम को किस तरह खर्च किया जाए? 'यूरोपीय एवं यूरेशियाई कर्मचारियों के बच्चों के लिए एक स्कूल शुरू करना कैसा रहेगा?' कंपनी पहले ही मैदानी इलाकों के अपने सभी बड़े स्टेशनों पर कार्यरत कर्मचारियों के बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल चला रही थी। 
 
लेकिन विदेशी मूल के कर्मचारियों की तरफ से यह मांग रखी गई कि उनके बच्चों के लिए पहाड़ी इलाके में एक स्कूल खोला जाए। पहली बात, कंपनी के पास कुछ अतिरिक्त रकम थी।  दूसरी, मैदानों में रेलवे कर्मचारियों के लिए स्कूल थे लेकिन यूरोपीय कर्मचारी अपने बच्चों के लिए पहाड़ के ठंडे माहौल में एक स्कूल चाहते थे। 'दार्जिलिंग, मसूरी, नैनीताल और शिमला जैसे कुछ हिल स्टेशनों पर पहले से ही स्कूल चल रहे थे। उन स्कूलों में भी यूरोपीय कर्मचारियों के बच्चों को भेजा जा सकता था। लेकिन शिक्षा अनुदान की प्रकृति या इन स्कूलों की ऊंची फीस के चलते ईआईआरसी के अधिकतर कर्मचारी अपने बच्चों को वहां दाखिल नहीं करा सकते थे। ऐसे में यह महसूस किया गया कि रेलवे का अपना स्कूल शुरू करना ही व्यावहारिक रास्ता होगा। उस स्कूल का नियंत्रण कंपनी के शीर्ष अधिकारियों के हाथों में होना चाहिए।' 
 
ऐसा नहीं था कि पहाड़ी स्कूल मौजूद ही नहीं थे। लेकिन ईआईआरसी अपना एक स्कूल चाहता था जिसमें प्रवेश और फीस पर उसका नियंत्रण हो। लिहाजा मसूरी के झरीपानी में एक संपत्ति खरीदी गई और ओक ग्रोव स्कूल की नींव रखी गई। अब भी भारतीय रेलवे इस स्कूल का संचालन कर रहा है।  ओक ग्रोव स्कूल की शुरुआत 1888 में हुई थी। स्कूल की वेबसाइट से पता चलता है कि ओक ग्रोव स्कूल 19वीं सदी के तीन बेहतरीन उपहारों- भारतीय रेल, हिल स्टेशन और पब्लिक स्कूल संस्कृति के एक साथ आने का नतीजा रहा है। हडलस्टन की किताब में कहा गया है कि ईआईआरसी ने इस स्कूल की शुरुआत का फैसला प्रतिद्वंद्विता की एक भावना के चलते भी लिया था।
 
सिंध, पंजाब और दिल्ली रेलवे (एसपीडी) के अलावा कुछ अन्य को मिलाकर 1886 में पश्चिमोत्तर प्रांत रेलवे (एनडब्ल्यूएस) का गठन किया गया था। एसपीडी पहले से ही झरीपानी के पास फेयरलॉन में स्कूल चला रहा था। ऐसे में ईआईआरसी के अफसरों ने सोचा कि जब एसपीडी के पास अपना स्कूल हो सकता है तो उनके पास क्यों नहीं? लेकिन ओक ग्रोव स्कूल की शुरुआत के बाद फेयरलॉन स्कूल को चलाने में पश्चिमोत्तर रेलवे को दिक्कत होने लगी।  इसका नतीजा यह हुआ कि फेयरलॉन स्कूल को ओक ग्रोव में मिला दिया गया। ऐसे में सवाल उठा कि पश्चिमोत्तर रेलवे के कर्मचारियों के बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी? हडलस्टन के मुताबिक इसका एक तरीका निकाला गया। ओक ग्रोव में प्रवेश लेने वाले पश्चिमोत्तर रेलवे कर्मचारियों के बच्चों की फीस का भुगतान कर्मचारी और रेलवे मिलकर करते थे। हालांकि हडलस्टन यह नहीं बताते हैं कि ईआईआरसी ने अपने स्कूल की शुरुआत के पहले कुछ इसी तरह का मॉडल क्यों नहीं अपनाया था? 
 
क्या आपने हाल ही में दक्षिण रेलवे के स्कूलों के बारे में आई एक रिपोर्ट पढ़ी है? इसके मुताबिक अप्रैल 2019 के बाद दक्षिण रेलवे ऐसे स्कूलों का संचालन नहीं करेगा। रेल कर्मचारियों के बच्चे कहीं भी पढ़ सकते हैं और रेलवे उनकी लागत देगी। यह काफी कुछ फेयरलॉन-ओक ग्रोव करार की ही तरह है। इन रेलवे स्कूलों में तैनात अध्यापकों का कहीं और समायोजन कर दिया जाएगा। आखिर दुनिया के किसी भी हिस्से में रेलवे का क्या काम होता है? उनका काम ट्रेनें चलाना है, स्कूल नहीं। भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान के अलावा केवल युगांडा में ही रेलवे की तरफ से स्कूल चलाने की मुझे जानकारी है। इस समय भारत में रेलवे करीब 600 स्कूलों का संचालन कर रहा है। इसका यह मतलब नहीं है कि इन स्कूलों में केवल रेलवे कर्मचारियों के ही बच्चे पढ़ते हैं। करीब 60 फीसदी बच्चे तो रेल परिवार के बाहर के होते हैं। जो भी हो, अब हमें कुछ सवाल उठाने होंगे। 
 
रेलवे स्कूलों की शुरुआत के पीछे यूरोपीय एवं आंग्ल-भारतीय कर्मचारियों के बच्चों को यूरोपीय अंदाज वाली पढ़ाई की सुविधा देने की सोच थी। क्या अब भी वह उद्देश्य महत्त्वपूर्ण है? संविधान की सातवीं अनुसूची में स्कूली शिक्षा किसका दायित्व है?  हाल के वर्षों में स्कूली शिक्षा की पहुंच काफी विस्तृत हुई है। आज के समय में स्कूल की सुविधा से वंचित इलाके बहुत ही कम बचे हैं। अगर ऐसी कोई जगह है तो वहां पर केंद्रीय विद्यालय खोलना हमेशा ही संभव होता है, वहां पर रेलवे को अपना स्कूल खोलने की जरूरत भी नहीं है। 
 
भारतीय रेलवे पर 1877 में तैयार एक रिपोर्ट में कहा गया था, 'इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता है कि भारत के मैदानी इलाकों में पढऩे वाले यूरोपीय बच्चे पढ़ाई पूरी करने तक कमजोर एवं सुस्त हो चुके होंगे। अगली पीढ़ी के बच्चों की हालत तो और भी खराब होगी। ऐसे में इन बच्चों की पढ़ाई के लिए पर्वतीय इलाकों में स्कूल खोलने पर ध्यान देना होगा।' सवाल उठता है कि वर्ष 1877 का परिवेश क्या अब भी प्रासंगिक है? रेलवे स्कूलों को तिलांजलि देने के दक्षिण रेलवे के फैसले का जो लोग विरोध कर रहे हैं, उनके लिए तो शायद ऐसा ही है।
 
(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन हैं। लेख में व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं)
Keyword: railway, train, school,,
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