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बढ़ते जा रहे आयात की फिसलन पर खाद्य तेल

रमेश चंद /  05 31, 2018

सभी तरह के खाद्य तेलों के आयात पर शुल्क लगाने से भारत में खाद्य तेल उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल सकती है। इसकी अहमियत विस्तार से बता रहे हैं रमेश चंद

अक्सर यह दावा किया जाता है कि हरित क्रांति ने भारत को खाद्य क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया। हालांकि खाद्य तेलों के मामले में हालात सुधरने के बजाय भारत को आत्मनिर्भरता के मोर्चे पर गहरा आघात लगा। 1990 के दशक की शुरुआत में खाद्य तेलों के कुल उपभोग का पांच फीसदी से भी कम हिस्सा आयात करना पड़ता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह हिस्सेदारी बढ़कर 66 फीसदी पर जा पहुंची है। भारत अब दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक बन चुका है। वह सालाना 65,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य का 1.5 करोड़ टन खाद्य तेल आयात कर रहा है। वहीं 1992-93 में भारत ने केवल 1.1 लाख टन खाद्य तेल का आयात किया था। खाद्य तेल में तीव्र वृद्धि होने से देश में खाद्य तेलों का उपभोग भी तेजी से बढ़ा है। वर्ष 1992-93 में जहां प्रति व्यक्ति उपभोग छह किलोग्राम से भी कम था, वहीं हाल में यह 18 किलोग्राम तक हो चुका है। भारत में किसी भी अन्य खाद्य उत्पाद के उपभोग में इतनी तीव्र वृद्धि नहीं देखी गई है।

यह प्रवृत्ति कई अहम सवाल खड़ा करती है। क्या खाद्य तेल आयात में बढ़ोतरी घरेलू उत्पादन के मांग के मुताबिक नहीं बढऩे के चलते हुई है? या फिर आयात को बढ़ावा देने वाली नीतियां ही इसके लिए जिम्मेदार हैं? प्रति व्यक्ति तेल उपभोग में यह बढ़ोतरी क्या सस्ते आयात के चलते हुई है और क्या लोगों की सेहत पर भी कोई असर पड़ रहा है? घरेलू तिलहन अर्थव्यवस्था पर खाद्य तेल आयात का क्या असर है? दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि इन पहलुओं पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है।

आंकड़े बताते हैं कि 1970 के दशक की शुरुआत में भारत सालाना एक लाख टन से भी कम खाद्य तेल आयात करता था। लेकिन 1970 के दशक के उत्तरार्द्ध में घरेलू स्तर पर तिलहन उत्पादन स्थिर रहने से खाद्य तेल आयात बढऩे लगा और 1980-81 तक यह 15 लाख टन तक हो गया। 1987-88 में तो खाद्य तेल का आयात 20 लाख टन हो चुका था। इस बढ़ोतरी ने देश भर में व्यापक चिंता को जन्म दिया और फिर तात्कालिक नीति-नियंताओं ने खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता हासिल करने और आयात में कमी लाने के लिए घरेलू स्तर पर तिलहन उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया।

सरकार ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए 1986 में तिलहन प्रौद्योगिकी अभियान (टीएमओ) की शुरुआत की। टीएमओ में उत्पादन बढ़ाने और प्रसंस्करण तकनीक के प्रोत्साहन के अलावा तिलहन उत्पादकों को बेहतर मूल्य दिलाने के लिए एक लाभकारी माहौल बनाने पर भी जोर दिया गया। अधिकृत एजेंसी के जरिये ही खाद्य तेल के आयात की नीति का सख्ती से पालन किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि छह साल में ही तिलहन उत्पादन 78 फीसदी तक बढ़कर 2.01 करोड़ टन पर जा पहुंचा। इसी के साथ खाद्य तेल का आयात भी 1987-88 के 20 लाख टन से घटकर 1992-93 में 1 लाख टन पर आ गया। इस तरह टीएमओ ने खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता के अपने मुख्य लक्ष्य को हासिल कर लिया।

1992-93 के बाद देश में आर्थिक उदारीकरण और फिर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का असर दिखने लगा। उदारीकरण-समर्थक सोच खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता पर हावी होने लगी। कुछ विशेषज्ञों ने यह आकलन पेश किया कि खाद्य तेल के बजाय अनाजों का उत्पादन बढ़ाने और निर्यात पर जोर देना अधिक मुफीद है। यह भी कहा गया कि घरेलू उत्पादन बढ़ाने के बजाय आयात से खाद्य तेल की मांग पूरा करना बेहतर होगा। ऐसी दलीलों से सहमत सरकार ने एक बार फिर खाद्य तेल के आयात के दरवाजे खोल दिए। पाम ऑयल के आयात पर शुल्क की दरें 1994-95 के 65 फीसदी की तुलना में 1996-97 में 25 फीसदी पर आ गईं और उसके अगले साल यह 15 फीसदी हो गईं। खाद्य तेल के आयात के उदारीकरण ने टीएमओ अभियान की प्रगति रोक दी जिसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय तिलहन को मलेशिया एवं इंडोनेशिया से आयात किए जा रहे सस्ते पाम ऑयल से मुकाबला करना पड़ा। टीएमओ के शुरुआती छह वर्षों में तिलहन उत्पादन में हासिल की गई 78 फीसदी की वृद्धि दर 1992-93 के बाद के 25 वर्षों में कभी भी दोहराई नहीं जा सकी। नतीजतन खाद्य तेल के आयात में अनवरत वृद्धि और घरेलू खाद्य तेल अर्थव्यवस्था में गिरावट की शुरुआत हो गई। खाद्य तेलों के आयात में बड़ा हिस्सा पाम ऑयल का रहा है। हालांकि 1970 तक पाम ऑयल न तो भारतीय उपभोग का हिस्सा था और न ही उसका घरेलू उत्पादन होता था। 

कुछ अध्ययनों में समानता एवं लोक-कल्याण के पैमाने पर वनस्पति तेल के उदारीकरण को लेकर सवाल खड़े किए गए क्योंकि तिलहनों की खेती का 72 फीसदी रकबा शुष्क इलाके एवं बारिश पर निर्भर होता है। यह भी कहा गया कि भारतीय किसान दूसरे देशों की तुलना में खराब तिलहन उत्पादक नहीं हैं। लेकिन सस्ते आयात के मुकाबले ये दलीलें टिक नहीं पाईं।  लेकिन खाद्य तेलों का आयात बढ़ने के कई निहितार्थ होने से खाद्य तेलों की आयात शुल्क नीति पर नए सिरे से गौर करने की जरूरत है।

पहला, खाद्य तेल का प्रति व्यक्ति उपभोग गत 22 वर्षों में तिगुना बढ़ चुका है। आयात के बगैर देश में खाद्य तेल का प्रति व्यक्ति उपभोग अनाजों की तरह 1990 के दशक के शुरुआती स्तर पर जा सकता है। बढ़े हुए आयात ने खाद्य तेलों के मामले में भारतीयों की सोच को परंपरागत तेलों से दूर करने का काम किया है। पाम ऑयल का घरेलू उपभोग पिछले 22 वर्षों में 2 फीसदी से बढ़कर 50 फीसदी पर जा पहुंचा है। इसके चलते 2.6 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में तिलहन की खेती कर रहे लाखों किसानों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि आर्थिक समस्याओं के बावजूद तिलहन फसलों के रकबे में कोई गिरावट नहीं आई है। इसकी वजह यह है कि तिलहन किसानों के सामने अधिक विकल्प नहीं हैं क्योंकि तिलहन का 70 फीसदी रकबा सिंचाई की सुविधा से वंचित हैं। इस हालत में तिलहन के बजाय गेहूं और चावल जैसे अनाजों की खेती करना उनके लिए फायदेमंद नहीं है।

हमें खाद्य तेलों के मुक्त आयात की नीति पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। इस नीति ने भारत की विशाल तिलहन अर्थव्यवस्था और संभवत: उपभोक्ताओं की सेहत को भी गहरी चोट पहुंचाई है। हमें खाद्य तेलों के सम्मिश्रण पर भी गौर करना चाहिए क्योंकि कंपनियां उपभोक्ताओं को बेचे जाने वाले तेल की किस्म को लेकर भ्रमित कर रही हैं। सभी तरह के वनस्पति तेलों पर आयात शुल्क लगाने का सरकार का हालिया फैसला लगातार नीचे जा रहीं घरेलू तिलहन कीमतों को संरक्षण देने के लिए लिया गया है। भारत के तिलहन उत्पादन में नई जान फूंकने की दिशा में यह पहला कदम साबित हो सकता है। हमें तिलहन प्रौद्योगिकी अभियान को भी दोबारा शुरू करने की जरूरत है ताकि उत्पादकों एवं उपभोक्ताओं के व्यापक हित में घरेलू तिलहन उत्पादन की संभावना का दोहन किया जा सके।

(लेखक नीति आयोग के सदस्य हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)
Keyword: edible oil export, import,,
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