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सार्वजनिक बस सेवाओं का कायांतरण मुमकिन

विनायक चटर्जी /  05 28, 2018

भारतीय रेल का इस्तेमाल रोजाना 2.2 करोड़ लोग आवागमन के लिए करते हैं। इतनी बड़ी संख्या में यात्री ले जाने और भारत के सामाजिक-आर्थिक जीवन में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए रेलवे के लिए एक अलग मंत्रालय बनाया गया है। दो साल पहले तक संसद में रेलवे के लिए अलग से एक बजट भी पेश किया जाता था जबकि किसी अन्य मंत्रालय को ऐसा विशेषाधिकार नहीं हासिल था। रेल बजट सुर्खियों में रहता था और मीडिया में उस पर खूब चर्चा होती थी। 

हालांकि भारत में परिवहन का एक और साधन है जो रोजाना 6.8 करोड़ लोगों (रेलवे की तुलना में तिगुना) को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम करता है। इसके बावजूद रेलवे की तुलना में इसे कम तवज्जो मिलती है। ये शहर के भीतर और दो शहरों के बीच चलने वाली सार्वजनिक बस सेवाएं हैं। राज्य सड़क परिवहन निगम (एसआरटीसी) विभिन्न राज्यों में अलग-अलग बस सेवाओं का परिचालन करते हैं। अमूमन इन निगमों को मीडिया में जगह तभी मिलती है जब बस सेवाएं बाधित होती हैं या उनकी बस जानलेवा हादसे का शिकार होती हैं। राज्य सरकारों के नियंत्रण में काम करने वाले इन निगमों के कामकाज के बारे में बहुत कम ही पता होता है। 


परिवहन निगमों के प्रदर्शन की समीक्षा करने वालीं रिपोर्ट के आधार पर कहा जा सकता है कि उनका कामकाज उतना अच्छा नहीं है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की तरफ से राज्य सड़क परिवहन निगमों के प्रदर्शन की समीक्षा रिपोर्ट हर साल जारी की जाती है। अंतिम रिपोर्ट वर्ष 2015-16 के लिए जारी की गई थी। इस रिपोर्ट में देश भर में सक्रिय 54 एसआरटीयू में से 47 के आंकड़े दर्ज हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन 47 में से 40 निगम घाटे में चल रहे हैं। रेलवे की तुलना में तिगुनी सवारियां ढोने के बावजूद सार्वजनिक बस सेवाएं रेलवे की तुलना में एक तिहाई राजस्व भी नहीं जुटा पाती हैं। आलोच्य अवधि में रेलवे ने 1.68 लाख करोड़ रुपये का राजस्व जुटाया था जबकि सार्वजनिक बस सेवाएं 51,700 करोड़ रुपये ही कमा पाईं।

खुद रेलवे की वित्तीय हालत खराब है लिहाजा परिवहन निगमों की खस्ताहालत के बारे में कल्पना करना अधिक मुश्किल नहीं है। वर्ष 2015-16 में राज्य बस निगम कुल 113,500 करोड़ रुपये के घाटे में रहे। दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) 34,100 करोड़ रुपये के साथ सबसे आगे था जबकि मुंबई का परिवहन निगम बेस्ट 10,600 करोड़ रुपये के घाटे में था।

परिवहन सेवाओं की खराब वित्तीय सेहत इस पर चौतरफा असर डालती है। बस सेवाओं में कटौती कर दी जाती है जिससे यात्री दूसरे परिवहन साधनों का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इसके अलावा क्षमता से कम यात्रियों के साथ बसों का परिचालन होने से निगमों की वित्तीय हालत और बिगडऩे लगती है। यह एक दुष्चक्र की तरह है।

इतनी अधिक संख्या में सवारियां ढोने के बावजूद निगमों को अपनी सेवाओं का विस्तार करने की जरूरत है। मार्च 2015 में देश भर में पंजीकृत कुल 21 करोड़ वाहनों में से महज 19.7 लाख ही बसें थीं। इनमें से भी केवल 1.43 लाख बसें ही परिवहन निगमों के बेड़े में थीं। इसका मतलब है कि कुल वाहनों में से केवल 0.06 फीसदी ही सार्वजनिक बस परिवहन का हिस्सा थे। 

सच तो यह है कि बसें सार्वजनिक परिवहन में कहीं अधिक बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। इसके बावजूद 13 निगमों के बेड़े में कटौती की बात पता चली जबकि तीन निगमों ने एक भी बस नहीं बढ़ाई। केवल तीन राज्यों- महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के परिवहन निगमों की कुल बसें समूचे देश की सार्वजनिक बसों के 28 फीसदी से अधिक हैं। सार्वजनिक बसों की संख्या में पिछली बढ़ोतरी एनएनयूआरएम के दौरान 5-10 साल पहले हुई थी। उस अभियान में शहरी परिवहन के लिए 20,000 नई बसें बेड़े में शामिल की गई थीं। 

अब नई छलांग लगाने का वक्त आ चुका है, खासकर दो शहरों के बीच चलने वाली बसों के मामले में। इसके अलावा अंदरूनी शहरी परिवहन के लिए इलेक्ट्रिक बसों को तरजीह देनी होगी। यह अलग बात है कि निगमों की खस्ता वित्तीय हालत को देखते हुए उनके लिए नई बसें खरीद पाना काफी मुश्किल है। उनके घाटे की मुख्यत: तीन वजहें हैं: 45 फीसदी खर्च कर्मचारियों के वेतन पर ही हो जाता है, ईंधन पर खर्च उनके व्यय का 25 फीसदी हिस्सा होता है और सात फीसदी खर्च ब्याज चुकाने पर होता है। 

घाटा बढऩे से पेंशन देनदारी और पुराने बकाये के भुगतान में भी देर होती है। इससे नाखुश कर्मचारी हड़ताल पर चले जाते हैं जिससे बस सेवाएं भी बाधित हैं। केंद्र को बिजली वितरण कंपनियों की तरह सड़क परिवहन निगमों की हालत सुधारने के लिए भी कुछ कदम उठाने चाहिए। भले ही ऋण स्तर को देखते हुए बजट आवंटन हो लेकिन सख्त प्रावधानों से नजर भी रखी जाए। इसके अलावा 15वां वित्त आयोग निगमों के कर्मचारियों के वेतन एवं पेंशन बकाये के भुगतान के लिए एकमुश्त आवंटन भी कर सकता है। 

राज्य सरकारें परिवहन निगमों को रियायतें देने को कहती हैं तो उसकी भरपाई करने में आनाकानी करती हैं। इस तरह की देरी से बचना चाहिए। परिवहन निगमों को भी अपनी ताकत के हिसाब से चलना चाहिए। निगमों के पास बस डिपो और रखरखाव के लिए काफी जमीन है। अगर इन्हें विकसित कर दिया जाता है तो उससे भी निगमों को अच्छी आय हो सकती है। बसों के किराये का निर्धारण भी मेट्रो की तर्ज पर एक स्वतंत्र नियामकीय प्रणाली के जरिये किया जाए। 

तकनीक के इस्तेमाल से बस सेवाओं के परिचालन को अधिक कारगर बनाया जा सकता है। एक सार्वजनिक बस दिन भर में औसतन 305 किलोमीटर की दूरी तय करती है लेकिन उसमें सवारी क्षमता की 70 फीसदी ही होती हैं। इसके उलट निजी ऑपरेटरों की बसें रोजाना 460 किलोमीटर की दूरी तय करती हैं। निगम ऐसे सॉफ्टवेयर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं जो उन्हें मुनाफा दे सकने वाले मार्गों और अधिक सवारियों की संभावना के बारे में बता सके। 

सरकार को बसों के आवागमन का समय तय करने और ईआरपी सॉफ्टवेयर के लिए तत्काल बजट आवंटित करना चाहिए। सड़क परिवहन निगमों के राष्ट्रीय संगठन एएसआरटीयू ने सभी राज्यों के लिए एक ही सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने का सुझाव देते हुए कहा है कि ऐसा करना सस्ता पड़ेगा। सॉफ्टवेयर के विकास में 25 करोड़ रुपये लगेंगे जबकि इस्तेमाल का प्रशिक्षण देने और अलग भाषाओं के हिसाब से उसे ढालने में अतिरिक्त खर्च होगा। इसके लिए केंद्रीय बजट में प्रावधान किया जा सकता है। 

बसों का टिकट खरीदने के लिए एक सस्ता एवं सुगम डिजिटल प्लेटफॉर्म भी बस सेवाओं की पहुंच नाटकीय रूप से बढ़ा सकता है। रेलवे का अपना ऑनलाइन टिकट प्लेटफॉर्म इसके लिए एक नजीर हो सकता है। टिकटों के डिजिटल भुगतान से गड़बड़ी की आशंका भी काफी कम हो जाएगी।

अधिक वित्तपोषण, बेहतर तकनीक और सक्षम प्रबंधन की मदद से सार्वजनिक बसों के संचालन को दुरुस्त करना बहुत मुश्किल नहीं है। इसके लिए थोड़ी राजनीतिक इच्छाशक्ति और थोड़े धन की जरूरत होगी। अगर इसे जल्द पूरा किया जाता है तो यह सार्वजनिक परिवहन की सूरत ही बदल सकता है जिससे करोड़ों यात्रियों को लाभ होगा। यह राजमार्गों के तेजी से बढ़ रहे भौतिक ढांचे के लिए सॉफ्टवेयर भी साबित हो सकता है। 
(लेखक ढांचागत परामर्शदाता फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं)
Keyword: भारत, रेल, भारत, सामाजिक, आर्थिक,
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