बिजनेस स्टैंडर्ड - जब जासूसों ने की शांति की पहल
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जब जासूसों ने की शांति की पहल

शेखर गुप्ता /  05 27, 2018

यह एक बहुचर्चित सत्य है कि चोरों के बीच भी आपसी मान-सम्मान जैसी चीज होती है लेकिन क्या जासूसों के बीच भी ऐसा होता है? जासूसी का इतिहास ऐसे प्रमाणों से भरा हुआ है कि ऐसी घटनाएं होती हैं और हमारी उम्मीद से कहीं अधिक होती हैं। यहां तक शीतयुद्घ के दौरान भी प्रतिद्वंद्वी न केवल मिलते और बात करते बल्कि उनमें आपसी सम्मान भी होता और वे कई बार व्यक्तिगत स्नेह का प्रदर्शन भी करते। 

हम इस विषय पर इसलिए बात कर रहे हैं क्योंकि भारतीय और पाकिस्तानी मीडिया में इन दिनों दोनों देशों के पूर्व खुफिया प्रमुखों के एक संयुक्त प्रयास के खुलासों की चर्चा है। ये हैं भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के एएस दुलत और पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई के असद दुर्रानी। यह उल्लेखनीय वार्ता दर्ज की है पत्रकार आदित्य सिन्हा ने। हम सभी जानते हैं कि दोनों देशों के जासूसी प्रमुख या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार दूरदराज इलाकों में गोपनीय तरीके से मुलाकात करते हैं। द स्पाई क्रॉनिकल्स: रॉ, आईएसआई ऐंड द इल्यूजन ऑफ पीस में एक दिल को छू जाने वाली दास्तान यह भी है कि कैसे असद दुर्रानी के बेटे को जब बंबई पुलिस ने वीजा उल्लंघन के मामले में पकड़ा था तो रॉ ने उन्हें बचाया था। यहां तक कि पुलिस कभी यह जान ही नहीं पाई कि वह पाकिस्तान के पूर्व आईएसआई प्रमुख के बेटे थे। तब दुर्रानी को सेवानिवृत्त हुए अरसा बीत चुका था लेकिन दुलत के साथ उनके अच्छे संबंध थे। दुलत ने रॉ के तत्कालीन प्रमुख राजिंदर खन्ना से इस बारे में बात की थी। जब हमारे कुछ जासूसी प्रमुख सेवा में थे तब भी गोपनीय बातचीत हुआ करती थी। राजीव गांधी के कार्यकाल में रॉ के निदेशक रहे आनंद वर्मा ने अपने निधन से पहले द हिंदू में लिखे एक आलेख में सनसनीखेज खुलासा किया था कि कैसे उन्होंने तत्कालीन आईएसआई प्रमुख हामिद गुल के साथ गोपनीय वार्ता की। यह वार्ता ज्यादातर अवसरों पर विदेश में आयोजित की गई और बाद में सार्वजनिक फोन लाइनों पर भी कूट संकेतों में बातचीत की गई। उन्होंने कहा कि वे दोनों सियाचिन विवाद निपटाने के करीब थे और कश्मीर से सेना हटाने के भी। उन्होंने यह भी कहा कि भरोसा कायम करने के लिए गुल ने गोपनीय ऑपरेशन में सिख यूनिट के चार सैनिकों को भारत को सौंपा था। ये सैनिक सन 1984 के ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद उपजे विद्रोह के बीच पाकिस्तान चले गए थे।

उन्होंने लिखा कि इस प्रक्रिया की शुरुआत पाकिस्तान ने की थी और इसे राजीव गांधी और जनरल जिया उल हक का वरदहस्त प्राप्त था। उन्होंने लिखा कि अपनी पहली मुलाकात में राजीव ने जॉर्डन के शहजादे हसन की सहायता चाही जो उनके व्यक्तिगत मित्र थे। आपको याद होगा कि उस वक्त भारत द्वारा जॉर्डन की शाही वायुसेना को यातायात के अधिकार सौंपने और शहजादे द्वारा राजीव गांधी को एक बढिय़ा कार तोहफे में दिए जाने पर काफी विवाद हुआ था। हसन की पत्नी पाकिस्तानी मूल की थीं और वहां भी उनके अच्छे रिश्ते थे। जिया उल हक के मारे जाने के बाद यह प्रक्रिया रुक गई। वर्मा आशंका जताते हैं कि इस हत्या का संबंध खुद पाकिस्तानी सेना के उन लोगों से हो सकता है जो शांति वार्ता के खिलाफ थे। दूसरी ओर केवल एक असैन्य व्यक्ति को इस बारे में जानकारी थी और वह थे पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव और भारत में उच्चायुक्त रह चुके नियाज नाइक। वह भी बाद में रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाए गए। ये बातें षड्यंत्र के सिद्धांत पर बल देती हैं। निश्चित तौर पर वर्मा ने इन बातों का खुलासा करने में करीब तीन दशक का वक्त लिया। गुल का निधन हो जाने के चलते भी उन्हें यह खुलासे करने का बल मिला होगा। 

मेरा मानना है कि वर्मा ने घटनाओं का सही ब्योरा दिया होगा। मैंने ऐसी कुछ बैठकों में हिस्सा भी लिया है। इनमें से एक को बलूसा समूह का नाम दिया गया था और  इसके एक दौर की मेजबानी जॉर्डन की राजधानी अम्मान में शहजादे हसन ने की थी। इस बैठक में वायुसेना के पूर्व प्रमुख एयर चीफ मार्शल एस के कौल, उनके भाई और पूर्व कैबिनेट सचिव तथा अमेरिका में भारतीय राजदूत पी के कौल, लेफ्टिनेंट जनरल सतीश नांबियार, पूर्व पाकिस्तानी उप सेनाध्यक्ष जनरल के एक आरिफ और शीर्ष उद्योगपति बाबर अली शामिल थे। इस समूह के सबसे गंभीर सदस्यों में से एक थे सेवानिवृत्त मेजर जनरल महमूद दुर्रानी (उनका असद से कोई रिश्ता नहीं)। वह मुझे सबसे समझदार, शांतिप्रिय पाकिस्तानी जनरल लगे। आश्चर्य नहीं कि कई पाकिस्तानी टीकाकारों ने उन्हें जनरल शांति का नाम दे दिया। बाद में सन 2008 में बतौर पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार उन्होंने नैतिक साहस दिखाया और ईमानदारी से यह स्वीकार किया कि कसाब पाकिस्तानी था और इस हकीकत को नकारना बेतुका था। उन्हें इसकी कीमत अपनी नौकरी देकर चुकानी पड़ी।

चूंकि वह एक पाकिस्तानी देशभक्त और एक जांबाज सैनिक थे इसलिए किसी ने किसी तरह का शुबहा नहीं किया। उन्होंने युवावस्था में बतौर टैंक कमांडर सियालकोट क्षेत्र में भारतीय सेना से जमकर लोहा लिया था। खासतौर पर फिलोरा और चविंडा की लड़ाई में जहां 1 आर्मर्ड डिवीजन के नेतृत्व में भारतीय टुकड़ी आगे बढ़ गई थी। बलूसा की इटली में आयोजित एक बैठक में उन्होंने मुझसे बातचीत में सन 1965 की जंग को याद किया। 

उन्होंने कहा कि वह एक कड़ी लड़ाई थी क्योंकि दोनों ओर के जनरल रणनीतिक चालाकी और पहल के मामले में पीछे थे। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना की ओर से एकमात्र शानदार रणनीतिक कदम लेफ्टिनेंट कर्नल एबी तारापोर ने उठाया था। उन्होंने हमले में अपनी रेजिमेंट का नेतृत्व किया लेकिन मारे गए। उस युद्ध में दो परमवीर चक्र दिए गए जिनमें से एक उनके नाम हुआ। तारापोर का शव महमूद दुर्रानी के हाथ लगा और उनके मन में दूसरे देश के साथी सैनिक के लिए सम्मान था। 

यह कभी आधिकारिक तौर पर कहा नहीं गया लेकिन आम जानकारी है कि सियाचिन को लेकर दोनों देश लगभग समझौते पर पहुंच ही गए थे। यह पूरी कवायद परदे के पीछे की गतिविधियों पर आधारित थी। यही वजह है कि एकदम नाटकीय अंदाज में रुझान युद्ध से शांति की ओर हो गया। इसके बाद यथास्थिति बरकरार हो गई। मैं उस वक्त वर्मा द्वारा दिए गए सुझावों से भी इत्तफाक रखता हूं कि जिया उल हक की नरमी के चलते ही कट्टर रुख रखने वालों ने उन्हें रास्ते से हटा दिया। परंतु मेरा यह भी मानना है कि बाद में शांति समर्थक हो गए गुल की इसमें भूमिका रही होगी। जिस समय गुल आईएसआई के प्रमुख थे उस वक्त देश के राष्ट्रपति और सैन्य तानाशाह की हत्या हो गई और वह इसके एक साल बाद भी अपने पद पर बने रहे। उन्हें बेनजीर भुट्टो ने उस पद से हटाकर मुल्तान में एक अहम कोर का नेतृत्व सौंप दिया। ध्यान रहे उन्हें आईएसआई प्रमुख के पद से बर्खास्त नहीं किया गया था। 

पुनश्च: लेफ्टिनेंट जनरल असद दुर्रानी से मेरी पहली मुलाकात भारत-पाकिस्तान के बीच आयोजित एक ट्रैक-2 सम्मेलन में हुई थी। इसका आयोजन लंदन के इंटरनैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रैटजिक स्टडीज ने मालदीव में माले के निकट एक रिजॉर्ट में किया था। यह सन 1998 के जाड़ों की बात है और ऐसा लग रहा था कि अटल बिहारी वाजपेयी और नवाज शरीफ के नेतृत्व में दोनों देश शांति बहाली की ओर अग्रसर हैं। दुर्रानी ने अचरज जताते हुए मुझसे पूछा कि भारत ने इस बात पर इतने नाटकीय अंदाज में यकीन कैसे कर लिया। मैंने कहा क्योंकि कश्मीर में पूर्ण शांति थी और हालात सामान्य थे। मैंने देखा कि जनरल ऊपर की ओर देख रहे थे, उनके माथे पर सिलवटें थीं। उन्होंने कहा कि जमीनी हालत बदलने में वक्त नहीं लगता। गौरतलब है कि लगभग उसी दौर में पाकिस्तान ने करगिल में पहली घुसपैठ की थी। इसके छह महीने बाद दोनों सेनाओं के बीच उस इलाके में जंग शुरू हो गई। दुर्रानी इसके पांच साल पहले सेवानिवृत्त हो चुके थे। परंतु वह आईएसआई प्रमुख रह चुके थे, लाजिमी है कि उन्हें कुछ जानकारी रही होगी। 

Keyword: शीतयुद्घ, प्रतिद्वंद्वी, भारतीय, पाकिस्तानी, मीडिया,
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