बिजनेस स्टैंडर्ड - वारिसों के लिए कैसे छोड़ें बड़ी जायदाद
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वारिसों के लिए कैसे छोड़ें बड़ी जायदाद

तिनेश भसीन /  05 20, 2018

जब कोई व्यक्ति अपने पोते-पोतियों के लिए कोई विरासत छोडऩा चाहता है तो आम तौर पर वह जीवन बीमा पॉलिसी खरीद लेता है या उन छोटे बच्चों के नाम पर सावधि जमा (एफडी) में कुछ रकम निवेश कर देता है। कुछ लोग ही जायदाद का ऐसा पोर्टफोलियो बनाने की सोचते हैं, जो उनके बेटे-बेटियों या पोते-पोतियों को दिया जा सकता है। अगली पीढ़ी को विरासत में जो पारिवारिक संपत्ति मिलती है, उसमें सामान्य तौर पर जमीन-जायदाद और सेवानिवृत्ति कोष से बचने वाली रकम शामिल होती है। लेकिन अगर सोच-समझकर योजनाबद्घ तरीके से काम किया जाए तो अगली पीढिय़ों  के लिए आप बहुत अधिक धन छोड़ सकते हैं। 

 
हरेक बच्चे या पोते-पोती के नाम एकमुश्त रकम निवेश करने के बजाय व्यक्ति अलग-अलग संपत्तियों में निवेश कर एक निवेश पोर्टफोलियो तैयार कर सकता है। संपत्ति प्रबंधन कंपनी पॉजिटिव वाइब्स कंसल्टिंग ऐंड एडवाइजरी में पार्टनर मल्हार मजूमदार ने कहा, 'व्यक्ति लंबी अवधि वाली ऐसी आसान संपत्तियों में निवेश कर सकता है, जिनका बार-बार जायजा लेने की जरूरत नहीं पड़ती। ऐसा पोर्टफोलियो दशकों तक बना रहेगा और अगर आप ब्याज की रकम नहीं निकालते हैं तो चक्रवृद्घि ब्याज के बल पर अगली पीढ़ी के लिए आप अच्छा खासा धन छोड़ सकते हैं।'  अगर आपके पोर्टफोलियो में हर साल 6 फीसदी की दर से भी इजाफा होता है तो 10 लाख रुपये का निवेश करने पर आपको 25 साल बाद करीब 43 लाख रुपये मिल जाएंगे। अगर प्रतिफल 8 फीसदी हो तो 25 साल में आपका 10 लाख का निवेश बढ़कर 68 लाख रुपये हो जाएगा।
 
बड़ी धनराशि के लिए ट्रस्ट
 
अगर संपत्ति अच्छी खासी है तो उसे अगली पीढ़ी के हाथ में सौंपने का सबसे अच्छा तरीका ट्रस्ट बनाना है। प्रमाणित वित्तीय योजनाकार अर्णव पांडय़ा कहते हैं, 'ट्रस्ट बना लिया जाए तो उसका लाभ हासिल करने वालों के बीच विवाद की कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाती। अगर वसीयत लिखी जाए तो ऐसे विवाद होना आम बात है। इसलिए ट्रस्ट बनाने से संपत्ति सुरक्षित हो जाती है। ऋणदाता भी उन संपत्तियों को कुर्क नहीं करा सकते, जो किसी ट्रस्ट में होती हैं।' हालांकि ट्रस्ट के ढांचे में लचीलापन नहीं होता। एक बार ट्रस्ट तैयार कर लिया जाए तो उसे बदलना बहुत मुश्किल होता है। उसे खत्म करना तो और भी पेचीदा काम होता है। इसलिए आपको पहले ही तय कर लेना चाहिए कि कौन-कौन सी संपत्ति ट्रस्ट में रखनी हैं और उसके लाभार्थी कौन-कौन होंगे।
 
आप निवेश की नीति के बारे में कोई विवरण लिख सकते हैं, जिसमें बताया जाएगा कि निवेश के सामान्य लक्ष्य क्या हैं, उसका मकसद क्या है। उसमें यह भी लिखा होगा कि निवेश के किस तरह की रणनीति अपनाई जानी हैं। इस काम के लिए आप शुल्क देकर किसी निवेश सलाहकार की मदद भी ले सकते हैं। उसे केवल एक बार शुल्क देना होगा, जो 20,000 रुपये से 45,000 रुपये के बीच होगा। ट्रस्ट बनवाने के लिए वकील करीब 25,000 रुपये लेते हैं। ट्रस्ट बनाने के बाद आपको इसके रखरखाव पर हर साल करीब 15,000 रुपये से 20,000 रुपये खर्च करने होते हैं। ये खर्च साल दर साल होते हैं और इनमें अनुपालन से जुड़े खर्च भी होते हैं और खाता संभालने तथा वार्षिक रिटर्न भरने के एवज में चार्टर्ड अकाउंटेंट को दिया जाने वाला शुल्क भी शामिल होता है। लैडर7 फाइनैंशियल एडवाइजर्स के संस्थापक सुरेश सदगोपन ने कहा, 'जिन लोगों के पास संपत्ति कम है, उनके लिए वसीयत बनाना ही काफी होगा।'
 
सुरक्षा मुख्य मकसद
 
ज्यादातर लोग अगली पीढ़ी के लिए विरासत छोडऩे के बारे में तब सोचते हैं, जब उनकी उम्र 50 साल के पार पहुंच जाती है या वे सेवानिवृत्त हो जाते हैं। उनका मकसद अगली पीढ़ी को अच्छी खासी रकम सौंपना ही होता है। उस समय तक पूंजी को बचाए रखने के लक्ष्य के साथ वह बहुत पहले से चल रहे होते हैं। लेकिन आप विरासत पोर्टफोलियो में जो भी निवेश करते हैं, वह लंबी अवधि को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए और आपके लक्ष्य की अवधि के मुताबिक ही उसे होना चाहिए। अगर आप 55 साल के हैं और आपको लगता है कि 85 साल की उम्र तक आप आराम से जीते रहेंगे तो आपके पास अपने लक्ष्य पूरे करने के लिए 30 साल हैं। ऐसे निवेशक को उस तरह की योजनाएं चुननी चाहिए, जिनके प्रबंधन में खुद नहीं लगना पड़े।
 
पोर्टफोलियो का निर्माण
 
अगर किसी फंड का सक्रिय प्रबंधन करना हो तो निवेशक को बार-बार उसका जायजा लेना होगा। यह न तो वरिष्ठï नागरिक के लिए मुमकिन है और न ही सेवानिवृत्ति के करीब पहुंच रहे व्यक्ति के लिए ऐसा करना आसान होगा। इसीलिए निवेश सलाहकारों की सलाह है कि अगर लंबी अवधि के लिए निवेश करना है और उस पर बार-बार नजर रखने के झंझट से भी बचना है तो इंडेक्स फंड चुनना सबसे अच्छा होगा। इसमें निवेशक को फंड के प्रदर्शन पर नजर बनाए रखने की चिंता नहीं करनी पड़ती। कोई ऐसा इंडेक्स फंड चुनें, जो डेरिवेटिव में निवेश नहीं करता है और जिसमें खर्च का अनुपात अपेक्षाकृत कम है। ऐसा फंड चुनें, जो निफ्टी50 या एसऐंडपी बीएसई सेंसेक्स में निवेश करता है।  आप सीधे शेयरों में निवेश के बारे में भी विचार कर सकते हैं, लेकिन आपको चुनिंदा शेयरों का ही चयन करना चाहिए। आपको सेंसेक्स या निफ्टी के ब्लूचिप शेयरों पर दांव लगाना चाहिए। आपको ऐसी कंपनियों के शेयरों में निवेश करिए, जिन्हें देखकर आपको लगता है कि कई दशक बाद भी इनके शेयर ब्लूचिप ही बने रहेंगे यानी अच्छी खासी कीमत वाले रहेंगे। आईटीसी और एचयूएल जैसी रोजमर्रा का सामान बनाने वाली कंपनियां या ओएनजीसी जैसी सरकारी कंपनियां इस जमात में शामिल हो सकती हैं। शेयरों में पोर्टफोलियो का 15 से 25 फीसदी हिस्सा निवेेश किया जाना चाहिए और यह हिस्सा व्यक्ति की जोखिम लेने की क्षमता पर निर्भर करता है।
 
विरासत वाले निवेश पोर्टफोलियो में डेट की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा होती है। इसके लिए द्वितीयक बाजार से करमुक्त बॉन्ड खरीदें। इन बॉन्ड की अवधि भी 20 साल या उससे ज्यादा होनी चाहिए। इस समय बाजार में जाएंगे तो आपको ऐसे करमुक्त बॉन्ड मिल सकते हैं, जो 2034 और 2035 में परिपक्व होंगे। परिपक्वता तक ये 6 फीसदी से अधिक प्रतिफल आपको दे सकते हैं। लंबी अवधि के लिए निवेश करना है तो डायनैमिक बॉन्ड फंड भी अच्छे हो सकते हैं। पिछले 10 साल में इन फंडों ने 7.84 फीसदी का औसत प्रतिफल दिया है। निवेश में से करीब 35 फीसदी रकम कर मुक्त बॉन्ड और डायनैमिक बॉन्ड फंड में लगाएं। पोर्टफोलियो को एक छोटा हिस्सा लंबी अवधि की सावधि जमाओं और 7.75 फीसदी सालाना प्रतिफल देने वाले भारत सरकार के बचत बॉन्डों में भी निवेश किया जा सकता है। लेकिन ये बॉन्ड करमुक्त नहीं होंगे। लंबी अवधि के पोर्टफोलियो की बात करें तो उसके लिए सोने में निवेश जरूरी है। पांड्या ने कहा, 'पोर्टफोलियो का 5 से 10 फीसदी हिस्सा सॉवरिन स्वर्ण बॉन्ड या गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंडों के जरिये सोने में लगाया जाना चाहिए।'
 
आजीवन पॉलिसी
 
बीमा कंपनियों ने ऐसी टर्म बीमा योजनाएं बेचना शुरू कर दिया है तो पॉलिसीधारक को जीवन भर बीमा की सुरक्षा देती रहती हैं। ये योजनाएं इस समय चल रहे होल लाइफ प्लान से बेहतर हैं क्योंकि होल लाइफ प्लान असल में एंडाउमेंट योजनाएं हैं। आजीवन योजनाएं व्यक्ति को 99 वर्ष के लिए बीमा कवर देती हैं और अगली पीढ़ी के लिए संपत्ति या धन छोडऩे में बहुत मदद करती हैं। मजूमदार ने कहा, 'इन योजनाओं में प्रतिफल (करीब 6 फीसदी) कम हो सकता है, लेकिन ये कम जोखिम पर संपत्ति बनाने में मदद करती हैं।'
 
रियल एस्टेट से बचें
 
अपने विरासत पोर्टफोलियो में केवल वित्तीय संपत्तियां ही शामिल करें। रियल एस्टेट को इससे दूर रखें क्योंकि उसमें अलग किस्म के झंझट हैं। सदगोपन ने कहा, 'जिसे विरासत में संपत्ति मिलनी है, अगर वह देश के बाहर रहता हो तो क्या होगा? विदेश में रहकर इन संपत्तियों का रखरखाव बहुत मुश्किल होगा। रियल एस्टेट की बिक्री करना भी आसान काम नहीं है।' निवेश सलाहकारों का कहना है कि ज्यादातर लोगों के पास एक या दो घर होते हैं। जब उन मकानों के मालिक गुजर जाएंगे तो घर वारिसों के हाथ में ही आएंगे। इसलिए रियल एस्टेट में और निवेश करने की जरूरत नहीं है।  लेकिन यदि रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट शुरू हो जाते हैं तो उनमें निवेश का विकल्प चुना जा सकता है।
 
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