बिजनेस स्टैंडर्ड - एनसीएलटी को कारगर बनाने के लिए क्षमता बढ़ाना जरूरी
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एनसीएलटी को कारगर बनाने के लिए क्षमता बढ़ाना जरूरी

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  May 17, 2018

ऋणशोधन एवं दिवालिया संहिता के तहत चलने वाली दिवालिया प्रक्रिया के लिए प्राधिकरण के तौर पर राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट (एनसीएलटी) को जिम्मा सौंपा गया है। वर्ष 2016 में इस कानून के अमल में आने के बाद एक भी ऐसा दिन नहीं बीता है जब एनसीएलटी की दिवालिया समाधान या किसी ऋणग्रस्त परिसंपत्ति की बिक्री संबंधी गतिविधियों के बारे में कोई खबर न आती हो। ऐसे में यह वाजिब सवाल खड़ा होता है कि दोहरी बैलेंस शीट के मोर्चे पर बड़ी चुनौती का सामना कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था को उबारने में एनसीएलटी किस हद तक कारगर साबित हो रहा है? संकटग्रस्त परिसंपत्तियों से जूझ रहे बैंकों की समस्या दूर करने और भारतीय कंपनियों को अपनी बैलेंस शीट दुरुस्त करने के मामले में एनसीएलटी की काबिलियत और प्रभावोत्पादकता अहम भूमिका निभाने जा रही है।

 
फिलहाल एनसीएलटी के 11 पीठ हैं जो देश भर के अलग-अलग शहरों में गठित हैं। दिल्ली में इसके दो पीठ हैं जबकि मुंबई, बेंगलूरु, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता, अहमदाबाद, चंडीगढ़, इलाहाबाद और गुवाहाटी में भी इसके पीठ बने हुए हैं। एनसीएलटी की वेबसाइट के मुताबिक इन तमाम पीठों के समक्ष आने वाले मसलों के निपटारे के लिए महज 17 न्यायिक और नौ तकनीकी सदस्य ही हैं। लिहाजा किसी को भी अचरज नहीं होना चाहिए कि एनसीएलटी के तमाम पीठों में बैठे गिने-चुने न्यायिक एवं तकनीकी सदस्यों पर काम का भारी बोझ है। उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने भी यह शिकायत की है कि एनसीएलटी का ध्यान दिवालिया प्रक्रिया पर इस तरह केंद्रित है कि विलय एवं अधिग्रहण जैसे अन्य अहम मुद्दों के निपटारे में खासी देरी होने लगी है।
 
अजीब विडंबना है कि कंपनी अधिनियम के तहत गठित एनसीएलटी से कंपनी कानून संबंधी मामलों के निपटारे में तेजी आने की उम्मीद की गई थी लेकिन दिवालिया प्रक्रिया संबंधी याचिकाओं का समयबद्ध निपटारा करने का दबाव बढऩे से कंपनी संबंधी दूसरे कानूनी मसले लेटलतीफी का शिकार हो रहे हैं। ऐसे में हमें सोचना होगा कि एनसीएलटी पर काम का दबाव क्यों बढ़ा है? मार्च 2018 के अंत में देश भर में पंजीकृत सक्रिय कंपनियों की संख्या 11.7 लाख थी। सबसे ज्यादा 2.3 लाख कंपनियां महाराष्ट्र में पंजीकृत थीं। ऐसे में एनसीएलटी के मुंबई पीठ को न केवल इन कंपनियों से संबंधित मामलों को देखना है बल्कि उसके पास गोवा और छत्तीसगढ़ में पंजीकृत 11,000 अन्य कंपनियों का भी क्षेत्राधिकार है।
 
सक्रिय पंजीकृत कंपनियों की संख्या के मामले में दिल्ली 2.1 लाख संख्या के साथ दूसरे स्थान पर है। हालांकि दिल्ली में एनसीएलटी के दो पीठ बनाए गए हैं लेकिन उन्हें दिल्ली के अलावा राजस्थान की करीब 37,000 कंपनियों से जुड़े मामले भी देखने होते हैं। कोलकाता पीठ पर तो काम का बोझ और भी अधिक दिखाई देता है। उसे पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और ओडिशा के अलावा अंडमान एवं निकोबार में सक्रिय पंजीकृत कंपनियों के भी मामले देखने पड़ते हैं। यहां पर हमें यह ध्यान रखना होगा कि सक्रिय पंजीकृत कंपनियों के मामले में पश्चिम बंगाल 1.3 लाख के साथ तीसरे स्थान पर आता है। कोलकाता पीठ के क्षेत्राधिकार वाले तीन अन्य राज्यों में भी 45,000 से अधिक कंपनी होने का अनुमान है।
 
मुंबई, नई दिल्ली और कोलकाता को छोड़कर बाकी पीठों की हालत उतनी खराब नहीं है। इसकी वजह यह है कि अन्य पीठों के क्षेत्राधिकार वाले राज्यों में पंजीकृत कंपनियों की संख्या हजारों में ही है। अहमदाबाद, हैदराबाद, इलाहाबाद, चेन्नई और बेंगलूरु पीठों को करीब 70-80,000 कंपनियों से जुड़े मामले निपटाने होते हैं। इन सभी पीठों पर काम का भारी बोझ होने से लंबित मामलों की संख्या बढऩे के साथ उनके निपटारे में भी देरी होगी। दिवालिया समाधान के लिए दाखिल आवेदनों की संख्या बढऩे और एनसीएलटी में उन्हें तरजीह मिलने से समस्या और गंभीर ही हुई है।
 
जनवरी-मार्च 2017 की तिमाही में दिवालिया समाधान के लिए 38 याचिकाएं दाखिल की गई थीं लेकिन अगली दो तिमाहियों में एनसीएलटी ने काफी अधिक संख्या में याचिकाएं स्वीकार कर लीं। अप्रैल-जून 2017 की तिमाही में 128 और जुलाई-सितंबर तिमाही में 234 याचिकाएं दिवालिया समाधान के लिए दाखिल की गई थीं। हालांकि अक्टूबर-दिसंबर 2017 की तिमाही में आवेदन दाखिल करने की रफ्तार थोड़ी सुस्त हुई। बहरहाल वर्ष 2017 के समूचे कैलेंडर साल में कॉर्पोरेट दिवालिया समाधान के कुल 540 आवेदन दाखिल किए गए थे। इस तरह एनसीएलटी पर बढ़े अतिरिक्त बोझ का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है।
 
दिसंबर 2017 के आखिर में एनसीएलटी ने 10 समाधान प्रस्तावों को स्वीकृति दी थी और 30 अन्य मामलों में पूंजीकरण की प्रक्रिया शुरू की थी। कुल दाखिल आवेदनों में से 39 पर पुनर्विचार किया जाना है जबकि बाकी 461 मामले समाधान प्रक्रिया के अलग-अलग स्तरों पर हैं। भारतीय ऋणशोधन एवं दिवालिया बोर्ड पहले ही समाधान पेशेवरों के प्रशिक्षण को तवज्जो दे रहा है और भारतीय रिजर्व बैंक ऋणग्रस्त संपत्ति के वर्गीकरण एवं आय स्वीकृति के लिए सख्त मानक अपना रहा है। ऐसे में एनसीएलटी के पास दिवालिया समाधान के लिए दाखिल होने वाले आवेदनों की संख्या में आगे चलकर और बढ़ोतरी होने के आसार हैं। इसी के साथ यह भी साफ होता जा रहा है कि दिवालिया मामलों में समाधान प्रक्रिया पूरी करने के लिए सरकारी मशीनरी की क्षमता बढ़ाई जानी चाहिए। एनसीएलटी के सभी 11 पीठों में केवल 26 सदस्यों की ही मौजूदगी काफी नहीं है। सरकार को एनसीएलटी की अधिक पीठ बनाने के साथ ही उनमें न्यायिक एवं तकनीकी सदस्यों की संख्या भी बढ़ानी चाहिए ताकि कर्ज समाधान प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके।
Keyword: NCLT, नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी),
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