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सरकार की योजनाएं दिख रहीं असरदार

ज्योति मुकुल / नई दिल्ली 05 16, 2018


अनूठे और आकर्षक नाम, भव्य समारोह और सोशल मीडिया पर जोरदार अभियान के साथ कार्यक्रम शुरू करना राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार की खासियत रही है। केंद्र सरकार के कार्यकाल का आखिरी साल शुरू होने वाला है और इन कार्यक्रमों का असर भी अब नजर आ रहा है। सरकार के सूत्रों का दावा है कि पिछले कुछ चुनावों में भाजपा को मिली धमाकेदार सफलता के पीछे इन योजनाओं का बहुत बड़ा हाथ है। इन योजनाओं का जोर लोगों को ऊर्जा उपलब्ध कराने, डिजिटल और वित्तीय बदलाव लाने, बेहतर और साफ सुथरे शहर तथा राजमार्ग देने पर है।

लेकिन असल मायनों में ये योजनाएं सरकार के लिए कितनी अहम हैं? शहरी विकास मंत्रालय के पूर्व सचिव एम रामचंद्रन कहते हैं, 'योजनाओं में लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं और फिर इन्हें हासिल करने की कोशिश की जाती है। लक्ष्य कितने खास हैं और उन्हें हासिल करने की कितनी इच्छा है, यही अहम है।'

योजना आयोग के पूर्व सदस्य किरीट पारिख के मुताबिक ये प्रमुख योजनाओं में अधिकतर कल्याणकारी योजना हैं। उन्होंने कहा कि इन कार्यक्रमों से जीवन स्तर को बेहतर बनाने में मदद मिली है। इनसे आर्थिक विकास को गति मिलती है या नहीं और रोजगार पैदा होता है या नहीं, यह अलग मुद्दा है। योजनाएं तैयार करते समय शायद इन बातों पर जोर भी नहीं दिया गया है।'

रामचंद्रन ने कहा कि ये कार्यक्रम आम आदमी को आकर्षक तो लगते हैं कि यह कहना मुश्किल है कि वोट देते समय उसमें दिमाग में ये रहते हैं या नहीं। वह कहते हैं, 'यह आकलन करना बेहद मुकिश्ल है कि आम मतदाता किस तरह प्रतिक्रिया देगा।' राजग सरकार के गठन के कुछ ही महीनों में स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया गया था। अक्टूबर, 2014 में शुरू हुए इस अभियान का उद्देश्य देश को 2 अक्टूबर, 2019 तक खुले में शौच की समस्या से मुक्त कराना है।

जब स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत हुई थी तो देश में 38.70 फीसदी ग्रामीण परिवारों के पास शौचालय था। सरकार का दावा है कि अब 2014-15 से 7.196 करोड़ शौचालय बनाए गए हैं और अब 83.71 फीसदी ग्रामीण परिवारों के पास शौचालय है। अलबत्ता आलोचकों का कहना है कि केवल लक्ष्य पूरा करने के लिए शौचालय बनाने से बाद में कुछ दिक्कतें आ सकती हैं, जैसे कुछ शौचालयों का इस्तेमाल बंद हो जाना।लोगों का रहन-सहन और आदतें बदलने के लिए राजग सरकार ने केवल शौचालय को जरिया नहीं बनाया है।

ऊर्जा उपलब्ध कराना भी एक तरीका है, जिसके जरिये सबका साथ, सबका विकास का राजनीतिक संदेश घर-घर तक पहुंच रहा है। वंचितों तक बिजली पहुंचाने के लिए खास तौर पर दो योजनाएं बनाई गई हैं। गरीब परिवारों को मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन देने के लिए प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना और ग्रामीण परिवारों को बिजली देने के लिए दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना शुरू की गई है।

उज्ज्वला योजना की शुरुआत 1 मई, 2016 को की गई थी। इसके तहत 2019 तक 8 करोड़ परिवारों को रसोई गैस कनेक्शन दिया जाना है। अब तक 3.9 करोड़ परिवारों को इसका फायदा मिल चुका है। इस वर्ष 28 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिजली से वंचित देश के 18,374 गांवों के राष्ट्रीय ग्रिड से जुडऩे की घोषणा की। लेकिन दोनों योजनाओं में पेच यह है कि ज्यादा कीमत होने के कारण लोग गैस सिलिंडर नहीं भरवा रहे और महंगी बिजली का कनेक्शन भी नहीं लगवा रहे।

भारतमाला कार्यक्रम का मकसद देश में बेहतरीन सड़कों का जाल बिछाना है। इस कार्यक्रम को पिछले साल अक्टूबर में मंत्रिमंडल की मंजूरी मिली, जिसके बाद इसके लक्ष्य तय किए गए। इस व्यापक कार्यक्रम के तहत कई परियोजनाएं चल रही हैं और इसका पहला चरण 2021-22 में पूरा होना है। इस दौरान कुल 24,800 किलोमीटर सड़कें तैयार होनी हैं।

इसके अलावा राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना के तहत बाकी 10,000 किमी सड़कें भी बननी हैं। जाहिर है कि सरकार की कोशिश इनमें से कुछ परियोजनाओं को 2019 के आम चुनावों से पहले पूरा करने की होगी। जहां तक इंटरनेट और ई-सेवाओं के जरिये संपर्क मुहैया कराने का सवाल है तो सरकार ने ई-प्रशासन और ई-ऑफिस के लिए लक्ष्य निर्धारित किए हैं।

पारिख कहते हैं कि ई-प्रशासन के क्षेत्र में कुछ सुधार हुआ है जिससे सरकारी क्षेत्र की सेवाएं बेहतर तरीके से मिलने लगी हैं। लेकिन ग्रामीण इलाकों में टेलीफोन की संख्या बढ़ाने के मामले में अभी तक कोई पुख्ता नतीजा नजर नहीं आया है। ग्रामीण क्षेत्रों में 100 लोगों पर 57 टेलीफोन कनेक्शन हैं। आधार भले ही पिछली सरकार के दिमाग की उपज थी लेकिन मोदी सरकार ने इसे पूरी शिद्दत के साथ लागू किया।

120 करोड़ लोगों का आधार पंजीकरण हो चुका है। 432 योजनाओं का सरकारी लाभ देने के लिए प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल हो रहा है। जन धन योजना के तहत 2 मई तक 31.5 करोड़ लोगों के बैंक खाते खोले गए हैं जिनमें से 59 फीसदी ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में हैं। इसी तरह प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मार्च, 2019 तक 1.02 करोड़ आवास बनाए जाने हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2017-18 तक 34 लाख मकान बनाए गए थे। इसमें चुनौती यह है कि मार्च 2019 से पहले बाकी 66 लाख मकान बनाने के लिए निर्माण की रफ्तार दोगुनी करनी होगी।

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