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सुधार जरूरी

संपादकीय /  05 13, 2018

भारतीय रिजर्व बैंक ने इग्जामिनिंग ग्रॉस डोमेस्टिक प्रॉडक्ट डेटा रिवीजन इन इंडिया, शीर्षक से हाल में एक लेख जारी किया जिसमें यह दिखाया गया है कि कैसे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अग्रिम अनुमानों को पूर्वग्रह के साथ कम रखा जाता है और बाद में उनमें उत्तरोत्तर सुधार किया जाता है। जीडीपी के आंकड़ों में सुधार एक मान्य अंतरराष्ट्रीय व्यवहार है। जैसे-जैसे बेहतर आंकड़े सामने आते जाते हैं, वैसे वैसे उन्हें अंतिम आंकड़ों में शामिल किया जाना स्वाभाविक है। बहरहाल, जब शुरुआती अनुमान एक ही दिशा में पूर्वग्रह से ग्रस्त हों तो इससे यही पता चलता है कि देश की सांख्यिकीय व्यवस्था में सबकुछ ठीकठाक नहीं चल रहा। दुर्भाग्य की बात है कि यह देश की अर्थव्यवस्था को चपेट में ले रही कई दिक्कतों में से महज एक है। इन समस्याओं में सबसे प्रमुख है नई और पुरानी जीडीपी शृंखला की तुलना का अभाव। पुराना तरीका मुख्य तौर पर विभिन्न स्रोतों से हासिल उत्पादन के आंकड़ों पर आधारित था और वह नए तरीके से एकदम अलग था जो कंपनियों द्वारा कंपनी मामलों के मंत्रालय को दिए गए मूल्यवर्धित आंकड़ों पर निर्भर है। कागजी तौर पर देखें तो बाद वाली व्यवस्था बेहतर नजर आती है क्योंकि यह मूल्यवर्धित आंकड़ों पर निर्भर करती है, बजाय कि उत्पादन के आंकड़ों के। दरअसल उत्पादन के आंकड़ों को जीडीपी में तब्दील करने के पहले कई चरणों से गुजरना होता था। जब मुख्य सांख्यिकी कार्यालय स्वयं यह स्वीकार करता है कि दोनों अनुमानों की तुलना नहीं हो सकती है और वह इसका प्रबंध नहीं कर सकता है तो यही निष्कर्ष निकलता है कि देश के सांख्यिकी कार्यालय में कोई न कोई दिक्कत है। 

 
इसमें सबसे बड़ी दिक्कत आर्थिक आंकड़ों की विश्वसनीयता खोने की है। इन आंकड़ों को इनकी तमाम कमियों के बावजूद दुनिया भर में सही और भरोसेमंद माना जाता था। परंतु आज, वैश्विक समुदाय को तो छोडि़ए, सरकार के भीतर भी ये पूरी तरह विश्वसनीय नहीं हैं। समस्या तब और बढ़ जाती है जब ये पुराने समय से तुलना के लायक नहीं हैं क्योंकि तुलना करने से विश्लेषण करने और कमियों को दुरुस्त करने का अवसर मिलता था। यही वजह है कि जीडीपी के पुराने आंकड़े अहम हैं। जीडीपी में सुधार और अन्य आर्थिक अनुमान भी कोई एकबारगी का मामला नहीं हैं। बल्कि यह एक निरंतर प्रक्रिया है जहां बेहतर तकनीक, तौर तरीकों और डेटा की मदद से काम जारी रहता है। तमाम उपलब्ध प्रमाणों से यह बात स्पष्टï होती है कि केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय नई अर्थव्यवस्था की मांग पूरी कर पाने में नाकाम है। इसका समाधान केवल जीडीपी अनुमान की कमियों को दूर करना नहीं है बल्कि स्वयं केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के कामकाज में भी सुधार करना होगा। 
 
अर्थव्यवस्था के संगठित क्षेत्र का तेजी से डिजिटलीकरण हुआ है। इसमें असंगठित क्षेत्र की आवश्यकताओं की महत्ता और पुरानी तथा नई व्यवस्था के सहअस्तित्व का ध्यान रखा गया है। व्यापक स्रोतों को समेटने के लिए भारतीय सांख्यिकी संस्थान जैसे संगठनों को नए तरीके तलाश करने की जरूरत है। अनुमान लगाने का काम अब केवल सांख्यिकी या अर्थशास्त्र के क्षेत्र का नहीं रह गया है। बड़े पैमाने पर आंकड़े ऐप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस के माध्यम से एकदम ताजा उपलब्ध रहते हैं। कर रिकॉर्ड, डिजिटल भुगतान या ई-कॉमर्स के आंकड़े इसके उदाहरण हैं। इसके लिए डेटा विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के पेशेवरों की जरूरत होती है जो सांख्यिकीविदों और अर्थशास्त्रियों के साथ काम करें। संसद के वित्तीय पैनल के मुताबिक देश का आर्थिक सुधार विश्वसनीय और गुणवत्तापूर्ण आंकड़ों की कमी से प्रभावित हो रहा है। महसूस किया गया कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक सेवाओं की बदलती लागत को समुचित रूप से समाहित नहीं कर पा रहा। सांख्यिकी कार्यालय को इन कमियों को दुरुस्त करना होगा।
Keyword: bank, loan, debt, RBI, GDP, economy,,
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