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पोषक तत्त्वों से भरपूर मोटे अनाज की खेती पर दिया जाने लगा जोर

खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  May 09, 2018

कृषि मंत्रालय ने 2018 को ज्वार, बाजरा जैसे मोटे अनाज के 'राष्ट्रीय वर्ष' के तौर पर मनाने का निर्णय लिया है। देर से ही सही, लेकिन सरकार का यह कदम पोषक तत्त्वों से भरपूर इन अनाज की अहमियत दर्शाता है। देश में हरित क्रांति का बिगुल बजने से दूसरी फसलों पर खासा जोर दिया गया, लेकिन मोटे अनाज की लगातार अनदेखी होती चली गई।  सरकार ने संयुक्त राष्ट्र से भी मौजूदा वर्ष को मोटे अनाज के 'अंतरराष्ट्रीय वर्ष' के रूप में घोषित करने का आग्रह किया था। ऐसी पहल का मकसद पोषक तत्त्वों से भरपूर इन अनाज की ओर ध्यान आकृष्टï करना और इनके उत्पादन एवं उपभोग को बढ़ावा देना है। पोषण विशेषज्ञ अब मोटे अनाज को 'न्यूट्री सीरियल्स' या सुपर फूड्स (पोषण तत्त्वों से भरपूर अनाज) कहना पसंद करते हैं और कुपोषण और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों के भोजन में इन्हें शामिल करने की सलाह देते हैं। देश में खाद्य सुरक्षा को मजबूती देने, कुपोषण एवं भूख मिटाने में चावल एवं गेहूं की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, लेकिन बाजरा आदि मोटे अनाज आवश्यक पोषक तत्त्वों की भरपाई कर पोषण सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं। भारत में परंपरागत तौर पर मोटे अनाज में बाजरा, ज्वार, रागी आदि की प्रमुख तौर पर खेती होती है। इनके अलावा कुटकी, कोदो, सावा, कंगनी, चीना और अन्य फसलों की भी खेती होती है।

 
मोटे अनाज में अहम सूक्ष्म पोषक तत्त्व होते हैं, जिनमें कुछ गेहूं या चावल में मौजूद नहीं होते हैं। मोटे अनाज पहले शुष्क एवं अद्र्ध-शुष्क प्रदेशों में प्रमुख खाद्यान्न हुआ करते थे, जिनकी जगह बाद में चावल और गेहूं जैसे छोटे अनाज ने ले ली। गेहूं और चावल का उपभोग और उत्पादन बढ़ाने में सरकार ने भी योगदान दिया। पहले तो सरकार ने इनके लिए उचित मूल्य पर बाजार मुहैया कराया और बाद में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के जरिये अत्यधिक सस्ती कीमतों पर इनकी आपूर्ति सुनिश्चित की। दूसरी तरफ मोटे अनाज अपेक्षा के शिकार हो गए और इन पर खास ध्यान नहीं दिया गया। मोटे अनाज का भोजन के साथ ही चारा, जैव-ईंधन और शराब उत्पादन के लिए कच्चे माल के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है। 
 
हालांकि, अब राहत की बात यह है कि मोटे अनाज को लेकर नजरिया बदला है। अधिक गुणवत्ता वाले प्रोटीन, एमिनो एसिड के संतुलन एवं कच्चे रेशे (क्रूड फाइबर) की अधिक मात्रा और आवश्यक खनिजों जैसे लौह, जस्ता और फॉस्फोरस आदि की मौजूदगी के कारण चावल एवं गेहूं के मुकाबले इन्हें अधिक तवज्जो दी जा रही है। इस तरह, इनके उपभोग से बड़े पैमाने पर सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी दूर की जा सकती है, खासकर महिलाओं एवं बच्चों के स्वास्थ्य के लिहाज से मोटे अनाज खासे फायदेमंद हैं। खून की कमी, पेलेग्रा और विटामिन-बी कॉम्पलेक्स की कमी मोटे अनाज से पूरी की जा सकती है। भाग-दौड़ की इस जिंदगी में मोटापा और मधुमेह जैसी बीमारियों में भी मोटे अनाज फायदेमंद हो सकते हैं, क्योंकि इनमें ग्लूटेन नहीं होता है। ये रेशे और एंटीऑक्सिडेंट से युक्त होते हैं।
 
मोटे अनाज के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि इनके लिए बड़े स्तर पर सिंचाई की जरूरत नहीं होती हैं। गैर-सिंचित, कम उपजाऊ और छोटे रकबे में भी इनकी खेती आसानी से की जा सकती है। विपरीत मौसमी परिस्थितियों का भी इन पर असर नहीं होता है और जलवायु परिवर्तन झेलने में भी ये सक्षम होते हैं। इनकी पैदावार के लिए उर्वरकों एवं कीटनाशकों पर भी अधिक रकम खर्च नहीं करनी होती है। यही नहीं, कम पैदावार या फसल खराब होने का भी खतरा नहीं रहता है। केंद्र के साथ अब कई राज्य सरकारें मोटे अनाज को बढ़ावा देने और उनका उत्पादन बढ़ाने के लिए योजनाएं तैयार करना शुरू कर चुकी हैं। नैशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (नीति आयोग) की सिफारिश पर केंद्र ने वर्तमान राष्ट्रीय खाद्य संरक्षा मिशन के तहत मोटे अनाज प्रभाग को 'न्यूट्री-सीरियल्स' पर उप-अभियान (सब-मिशन) के रूप में परिवर्तित करने का निर्णय लिया है। मोटे अनाज पर विशेष ध्यान देने के लिए यह कदम उठाया गया है। इतना ही नहीं, मोटे अनाज के लिए बाजार मुहैया कराने और पीडीएस के जरिये इनकी आपूर्ति के लिए भी जल्द ही योजनाएं आने वाली हैं। कई राज्यों में मध्याह्नï भोजन योजना में भी मोटे अनाज शामिल किए जाने की संभावना है। 
 
ओडिशा ने तो 'मिलेट मिशन' का गठन किया है और अगले फसल सत्र से उचित एवं लाभकारी मूल्य पर मोटे अनाज खरीदने का भी निर्णय लिया है। कर्नाटक सरकार सूखा प्रभावित क्षेत्रों में इन्हें बढ़ावा दे रही है और इनके लिए विपणन सहायता भी मुहैया करा रही है। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कर्नाटक सरकार मोटे अनाज उत्पादकों और मोटा अनाज आधारित स्वास्थ्य खाद्य उद्योग के बीच संबंध स्थापित करने की दिशा में भी काम कर रही है। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, उत्तराखंड, झारखंड, मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में भी इनकी खेती जोर पकड़ रही है। इनकी खेती को बढ़ावा नहीं देने की कोई वजह भी नहीं है। देश में कुपोषण मिटाने और जन स्वास्थ्य सुधारने में मोटे अनाज की अहम भूमिका हो सकती है। 
Keyword: agri, farmer, wheat, crop,,
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