बिजनेस स्टैंडर्ड - अर्जेंटीना से सीखें सबक
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अर्जेंटीना से सीखें सबक

संपादकीय /  May 08, 2018

अर्जेंटीना की मुश्किलें भारतीय नीति-निर्माताओं और नेताओं के लिए माकूल चेतावनी दे सकती हैं। अर्जेंटीना की मुद्रा पेसो में डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड गिरावट आई है जिससे कई बार दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुका यह देश एक बार फिर बाहरी खाते को लेकर अस्थिरता के मुहाने पर खड़ा नजर आने लगा है। हालांकि भारत अर्जेंटीना नहीं है, यह न तो एक छोटी अर्थव्यवस्था है और न ही पूरी तरह डॉलर के चंगुल में है। भारत के बुनियादी आर्थिक पहलू भी अपने कई समकक्षों से बेहतर हैं। इसके अलावा भारत पर दिवालिया होने का खतरा भी नहीं मंडरा रहा है और चालू खाते में अस्थिरता के कई दौर देखने के बावजूद यह हमेशा अपनी विदेशी देनदारी के मामले में भरोसेमंद रहा है। फिर भी अर्जेंटीना उस अहम मुद्दे की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करता है कि बाहरी खाते से जुड़ी संरचनात्मक कमजोरी कभी भी पूरी तरह जाती नहीं है और इससे नीति-निर्माताओं के लिए नीतियों पर फैसला कर पाने की क्षमता प्रभावित होती है। अतीत में संरचनात्मक सुधारों को लागू करने में अनिच्छा दिखाने की वजह से भारत के समक्ष अपनी वृहद आर्थिक नीति पर से नियंत्रण खोने का खतरा मंडरा रहा है।

 
वैश्विक हालात के सकारात्मक रहने पर भारत के समग्र बुनियादी अवयव मजबूत नजर आते हैं। पिछले कुछ वर्षों में यही स्थिति देखी गई है। वैश्विक स्तर पर कम ब्याज दरों वाले दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था में फंड का प्रवाह बढऩे से चालू खाता घाटा पाटने में मदद मिली और कच्चे तेल की कम कीमतों ने भी व्यापार घाटे को काबू में रखने के साथ मुद्रास्फीति और राजकोषीय घाटे को संभालने में मदद की। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूल रहे ये दोनों पहलू हाल में कमजोर पड़े हैं। अमेरिका में ऊंची ब्याज दरों की आशंका ने अर्जेंटीना को एक और संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है और नए समग्र आर्थिक प्रोत्साहक बाहरी खाते के मोर्चे पर भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी अक्षमता बयां कर देंगे। भारत के पास 2013 वाले दौर से कहीं अधिक विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है लेकिन उसके बाद भी पूंजी का विदेश की ओर प्रवाह होने पर भंडार में कमी आएगी और रुपया दबाव में आ जाएगा। 
 
भारतीय रिजर्व बैंक भी रुपये की गिरती सेहत संभालने,  विदेशी मुद्रा भंडार बनाए रखने और स्वतंत्र मौद्रिक नीति अपनाने में नाकाम हो जाएगा। इस बीच सरकार के समक्ष उपलब्ध विकल्प भी कम हो जाएंगे। सरकार एक साथ महंगाई पर काबू रखने, राजकोषीय घाटे में कमी लाने और वृद्धि की रफ्तार बनाए रखने में अक्षम हो जाएगी। हालांकि बाहरी कमजोरी दूर करने में नाकामी से घरेलू अर्थव्यवस्था पर पडऩे वाले नकारात्मक प्रभावों को जानने के लिए भारत को अर्जेंटीना जैसे संकट से गुजरने की जरूरत नहीं है। इन मामलों में निराशावाद चौतरफा व्याप्त है और बॉन्ड बाजारों में मची भगदड़ से यह नजर भी आती है। बॉन्ड बाजारों में सरकारी प्रतिभूतियों के प्रतिफल में तीव्र वृद्धि देखी गई है। महंगाई का दौर लौटने और राजकोषीय सशक्तीकरण के अपने ही घोषित लक्ष्य से सरकार के सुस्त पड़ जाने का मेलजोल दिखाता है कि भविष्य में कैसे हालात हो सकते हैं? भारत चालू खाते के संबंध में संरचनात्मक घाटे से निपटने के लिए जरूरी सख्त कदम नहीं उठाने से ऐसी हालत में है। दूसरे शब्दों में, इसने अपने निर्यात को सही वरीयता नहीं दी है। आर्थिक इतिहास बताता है कि आयात स्थानापन्न से हासिल किए जा सकने वाले हालात की भी एक सीमा है।
 
बाहरी खाते में स्थिरता लौटाने और समग्र आर्थिक नीति अपनाने की क्षमता बहाल करने का इकलौता तरीका यह है कि भारतीय उत्पादों को प्रतिस्पद्र्धी बनाने वाले सूक्ष्म आर्थिक सुधारों को लागू किया जाए। उससे आयात में गिरावट आने के साथ निर्यात में वृद्धि भी होगी जिससे भारत उन प्रतिकूल परिस्थितियों के खतरे का बखूबी सामना कर पाएगा जिन्होंने अर्जेंटीना को अपना शिकार बना लिया है।
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