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तेल का खेल

संपादकीय /  May 07, 2018

कच्चे तेल की कीमतें वर्ष 2014 के आखिरी महीनों के बाद के उच्चतम स्तर पर जा पहुंची हैं। वेनेजुएला में आर्थिक संकट गहराने और ईरान पर अमेरिका के दोबारा प्रतिबंध लगाने की आशंका से कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़े हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेंचमार्क माने जाने वाले ब्रेंट क्रूड का भाव सोमवार को 75 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गया। कीमतों में तीव्र वृद्धि का अंदाजा इसी से लगाया  जा सकता है कि जनवरी 2015 के आखिर में ब्रेंट क्रूड करीब 27 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर था। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव बढऩे से भारत का तेल आयात बिल भी तेजी से बढ़ा है। दरअसल भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा मुख्य रूप से आयात से ही पूरा होता है और यही बात उसकी चिंता बढ़ा रही है। वित्त वर्ष 2017-18 में भारत का तेल आयात बिल एक साल पहले की तुलना में 25 फीसदी बढ़कर 109 अरब डॉलर पर पहुंच गया। बढ़ी तेल कीमतें भारत का व्यापार घाटा और चालू खाता घाटा बढ़ा सकती हैं। वित्त वर्ष 2017-18 के पहले नौ महीनों में चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 1.9 फीसदी रहा था।

 
दूसरी चिंता घरेलू स्तर पर तेल की बढ़ी कीमतों के असर को लेकर है। पिछले साल जून में तेल की कीमतों का निर्धारण डाइनैमिक प्रणाली से होने की शुरुआत हुई थी। दो सप्ताह पहले तक सरकारी क्षेत्र की खुदरा तेल बिक्री कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से पेट्रोल और डीजल के दाम रोजाना तय कर रही थीं। हालांकि सरकार एक पारदर्शी एवं पूर्वानुमेय मूल्य प्रणाली के अपने वादे से पीछे हटती दिख रही है। उसने सार्वजनिक तेल कंपनियों को पेट्रोल-डीजल के भाव रोजाना आधार पर तय करने से रोक दिया है। कच्चे तेल के भारतीय बास्केट का औसत भाव अप्रैल के 63.76 डॉलर के बजाय मई में 68.88 डॉलर प्रति बैरल पहुंचने के बावजूद सरकार ने ऐसा निर्देश दिया है। मसलन, पिछले पखवाड़े भर से नई दिल्ली में पेट्रोल एवं डीजल का भाव क्रमश: 74.63 रुपये और 65.93 रुपये प्रति लीटर पर टिका हुआ है जिससे तेल विपणन कंपनियों के मार्जिन पर दबाव भी बन रहा है। एक लीटर पेट्रोल और डीजल पर 1 अप्रैल को 3.5 रुपये मार्जिन मिलता था लेकिन 1 मई को यह घटकर 1.9 रुपये प्रति लीटर रह गया। इस तरह सार्वजनिक तेल कंपनियों के मार्केटिंग मार्जिन में करीब 45 फीसदी की तीव्र गिरावट आई है। 
 
इस हालत के कई ऐसे पहलू हैं जो परेशानी पैदा कर सकते हैं। सबसे अहम तो वह फैसला है जिसमें सरकार ने बाजार-आधारित मूल्य निर्धारण प्रणाली पर अमल रोक दिया है। इसकी वजह जो भी हो लेकिन तेल कारोबार में इस तरह की दखलंदाजी ने सरकार के अपने ही नीतिगत फैसले की विश्वसनीयता को प्रभावित किया है। इससे भी बुरी बात यह है कि सरकार ने पहली बार ऐसा दखल नहीं दिया है। गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान भी सरकार ने अपने करों में कटौती कर बढ़ती तेल कीमतों का असर कम करने की कोशिश की थी। सरकार के मौजूदा फैसले के पीछे भी कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनाव को ही वजह माना जा रहा है। क्या इसका यह मतलब है कि किसी राज्य में चुनाव करीब होने पर हरेक बार सरकार तेल मूल्य निर्धारण के बारे में अपनी ही नीति का उल्लंघन करेगी? आम चुनाव में एक साल से भी कम समय बाकी रह जाने से ऐसे मनमाने नीतिगत फैसलों की संख्या बढऩे के आसार हैं। अगर ऐसा होता है तो वह बड़ी गलती होगी। वर्ष 2004 और 2014 के दौरान सत्ता में रहा संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें बढऩे के बावजूद राजनीतिक इच्छाशक्ति और संख्याबल नहीं होने से तेल के खुदरा भाव नहीं बढ़ा पाया था। इसका परिणाम यह हुआ कि तेल कंपनियों के पास पर्याप्त फंड नहीं होने से भारत की तेल खोज एवं शोधन क्षमता विस्तार की कोशिशें सुस्त हो गईं। मौजूदा सरकार बिना सोचे-समझे फैसले लिए बगैर ही यह काम कर सकती है।
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