बिजनेस स्टैंडर्ड - थकावट से भरे सैन्य इतिहास की मरम्मत
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, May 26, 2018 03:07 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

थकावट से भरे सैन्य इतिहास की मरम्मत

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  May 06, 2018

सैन्य इतिहास को लेकर घालमेल की स्थिति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगियों के बीच पैदा हुई। अगर विकीपीडिया से पुष्टि की गई होती तो उन्हें पता होता कि जनरल के एम करियप्पा (थिमैया नहीं) 15 जनवरी 1949 को पहले भारतीय सेना प्रमुख बने थे और उसी के उपलक्ष्य में हर साल इस तारीख को सेना दिवस मनाया जाता है। एक-दूसरे में उलझी और त्वरित घटनाओं से भरा अतीत आपको थोड़ी उलझन में डाल सकता है। वर्ष 1947-48 के दौर में भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों के सेना प्रमुख ब्रिटिश सैन्य कमांडर होते थे। मानो हालात को जटिल बनाने के लिए इतना काफी नहीं था लिहाजा जंग में शामिल दोनों पक्षों के सैन्य संचालन का जिम्मा 'मूल-निवासी' कमांडरों को दे दिया गया। भारत में करियप्पा को कश्मीर युद्ध का अभियान संभालने के लिए चुना गया था। उस समय लेफ्टिनेंट जनरल के रैंक पर तैनात करियप्पा को दिल्ली एवं पूर्वी पंजाब कमान का नेतृत्व करने को कहा गया। उन्होंने फौरन इस कमान का नाम बदलकर पश्चिमी कमान कर दिया। भ्रम पैदा होने की वजह यह है कि करियप्पा ने अपनी ही तरह कुर्ग के निवासी मेजर जनरल के एस थिमैया को जमीनी स्तर पर कमान सौंपी थी। इन दोनों अधिकारियों के नामों में 'के' अक्षर समान था जो उनके कोदांडेरा समुदाय से संबंधित था। कश्मीर युद्ध में साथ काम करने वाले इन अधिकारियों ने काफी नाम कमाया था और आगे चलकर सेना प्रमुख भी बने। 

 
करियप्पा के रक्षा मंत्री बलदेव सिंह थे जो अपनी खुशमिजाजी के लिए मशहूर थे। लेकिन थिमैया के समय वी के कृष्ण मेनन रक्षा मंत्री थे और इन दोनों के बीच तनातनी खूब चर्चा में रही। साम्यवाद में गहरी निष्ठा रखने वाले मेनन को अंग्रेजीदां और कड़क सेना प्रमुख पसंद नहीं आया। थिमैया भी अपने मंत्री की रोज-रोज की धमकी और दखलंदाजी से उबने लगे थे। पत्रकार स्वर्गीय इंदर मल्होत्रा इस असहज रिश्ते की कहानी अक्सर बताते थे। कहा जाता है कि एक बार थिमैया ने मेनन की तरफ से बुलाने पर यह कहते हुए जाने से मना कर दिया कि वह छुट्टïी पर हैं। जब छुट्टïी की वजह के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा था, 'बस इतना कह दो कि मुझे मेननजाइटिस हो गई है।' ऐसे में अचरज नहीं है कि थिमैया ने 1959 में अपना इस्तीफा दे दिया। हालांकि प्रधानमंत्री नेहरु के समझाने पर वह इस्तीफा वापस लेने को राजी हो गए और कार्यकाल पूरा कर 1961 में सेवानिवृत्त हुए।
 
एक आम आदमी इन बातों और कुर्गी संयोग के बारे में जानकर शायद संदेह में पड़ जाए। लेकिन प्रधानमंत्री और उनका कार्यालय ऐसी उलझन में भला कैसे पड़ सकता है? इसके पीछे कोई भरोसेमंद लगने वाली अवधारणा होनी चाहिए।  आजादी के बाद के 25 साल का हमारा इतिहास कई जंगों से भरा है। पाकिस्तान (1947-48, 1965 और 1971) और चीन (1962) जैसी बड़ी लड़ाइयों के अलावा हैदराबाद (1947), गोवा (1960) और नाथूला (1967) की छोटी लड़ाइयां भी हुईं। 1971 को छोड़कर बाकी किसी भी लड़ाई में भारत को स्पष्ट जीत नहीं मिली थी जबकि 1962 में हमारी शिकस्त हुई थी। कई दशकों तक नेताओं ने यह सोच पैदा करने की कोशिश की कि अगर सत्तासीन नेताओं ने सेना को नीचा नहीं दिखाया होता तो सेना बहुत कुछ हासिल कर ली रहती। 
 
यह कहना अति-सरलीकरण होगा कि नेताओं ने सेना की नाकामी को छिपाने के लिए यह कड़वा घूंट पिया था। दरअसल उनके पास कोई चारा ही नहीं था। वह उपनिवेशवाद के खात्मे के बाद का खतरनाक दौर था। लोकतांत्रिक संस्थाएं अभी आकार ले रही थीं और हमारे आसपास सेना सत्ता पर काबिज हो रही थी। ऐसे में नेहरु समेत समूचा राजनीतिक तबका नागरिक-सैन्य समीकरणों को लेकर चिंतित था। देश के सामने नागरिक या राजनीतिक उत्कृष्टता को स्थापित करने की चुनौती थी। उसी के साथ हमें सरकार एवं सेना के बीच तनाव से भी बचना था। इस दौरान राजनीतिक-सैन्य परिदृश्य का सामरिक सिद्धांत बनाया गया जिसके मुताबिक सैन्यबल और उनके कमांडर कभी कोई गलती नहीं कर सकते हैं। नाकामियों या सफलता की कमी के लिए सारा जिम्मा नेताओं को लेना होगा। हालांकि सफल सैन्य अभियान का श्रेय बांट दिया जाएगा, जैसा इंदिरा गांधी ने 1971 की लड़ाई में किया। उसके बाद से कुछ नहीं बदला है। करगिल युद्ध (1999) वाजपेयी सरकार से कहीं ज्यादा सैन्य नेतृत्व की नाकामी था। पाकिस्तानी सेना हमारी सीमा के भीतर इतना भीतर कैसे आ पाई और किसी की नजर भी नहीं पड़ी? एक बार फिर सुविधाजनक मिथक गढ़ा गया। पूरा दोष असैन्य खुफिया तंत्र की नाकामी पर डाल दिया गया और कुछ सैन्य अधिकारियों को ही जिम्मेदार बताया गया। अब तो हमें करगिल के बारे में केवल जीत और वीरता के किस्से ही याद हैं। पृथकता के सिद्धांत के लिहाज से सेना को किसी भी आलोचना से परे रखना महत्त्वपूर्ण था और अब भी है। सेना के भीतर संस्थागत निरंतरता होने से किसी एक सैन्य कमांडर को दोषी ठहराने से समूची संस्था अपमान के घेरे में आ जाएगी। राजनीतिक नेतृत्व तो आते-जाते रहेंगे और हमेशा विरोधियों के निशाने पर रहेंगे। 
 
इन दशकों के बारे में संभवत: सर्वाधिक वस्तुनिष्ठ विवरण हाल ही में प्रकाशित किताब 'आर्मी ऐंड नेशन: द मिलिट्री ऐंड इंडियन डेमोक्रेसी सिंस इन्डिपेंडेंस' में किया गया है। येल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्टीवन विल्किंसन इन तनावों को बेहद डरावने अंदाज में पेश करते हैं। मसलन, सेना में पंजाबी समुदाय के दबदबे से घबराए नेताओं ने इसका दायरा बढ़ाने की कोशिश की। जगजीवन राम ने राज्यों की आबादी पर आधारित भर्ती कोटा का ऐतिहासिक फैसला किया। हालांकि सभी राज्य अपना हिस्सा भर नहीं पाते हैं और बचा हिस्सा दूसरे राज्यों को दे दिया जाता है। लेकिन इस व्यवस्था ने उपनिवेशवादी शासन के 'लड़ाकू नस्ल' जैसे फर्जी सिद्धांत को धीरे-धीरे पलटने का काम किया है। आज दूसरे राज्यों का छोड़ा हुआ कोटा लेने के मामले में सबसे आगे रहने वाला केरल शायद ही कभी लड़ाकू माना जाता था। विल्किंसन के मुताबिक 1962 की त्रासदी के बाद भारतीय सेना को ढर्रे पर लाने में दो रक्षा मंत्रियों- वाई बी चव्हाण और जगजीवन राम का अहम योगदान रहा। इन नेताओं ने कभी भी किसी जनरल को दोषी नहीं ठहराया। 
 
बीते दशकों में इस इतिहास का एक अति-राष्ट्रवादी संस्करण गढ़ा गया जिसके मुताबिक जनरल तो हमेशा सही काम कर रहे थे लेकिन नेता ही उनके रास्ते में आ गए। जैसे, अगर करियप्पा, थिमैया या मानेकशॉ को खुली छूट मिली होती तो कश्मीर का कोई हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में नहीं होता, चीन को सबक सीखा दिया गया होता, 1965 में पाकिस्तान को बुरी तरह मात दी जाती और 1971 में अगर 15 दिनों तक लड़ाई और चलती तो पश्चिमी पाकिस्तान हमारे कब्जे में आ जाता। कोई भी आधिकारिक सैन्य दस्तावेज इनमें से किसी भी धारणा की ओर इशारा नहीं करता है। लेकिन एक नए लोकतंत्र में हमारी सेना सबसे मजबूत का अहसास जरूरी था और इसने सैनिकों को सत्ता संरचना से बाहर भी रखा। 
 
आरएसएस के आख्यान में तो यह सोच और भी मजबूत हुई। सैन्य इतिहास का आरएसएस संस्करण कुछ यूं कहता है: करियप्पा, थिमैया या चौधरी जैसे जनरलों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री से कुछ और दिनों की मोहलत मांगी थी लेकिन नेहरु-गांधी ने विदेशी ताकतों के दबाव में आकर इसकी इजाजत नहीं दी। इस मामले में आरएसएस केवल लाल बहादुर शास्त्री को ही छूट देता है। लेकिन शब्दाडंबर के इस शोर में आप इसे छिपा ले जाते हैं। आरएसएस से संबंधित किसी भी शख्स से पूछने पर आपको यही तर्क सुनने को मिलेंगे। इस प्रक्रिया में कालक्रम, नाम और अवधि का भी घालमेल हो जाता है लेकिन यह बात बखूबी पेश कर दी जाती है कि एक ताकतवर सेना को कमजोर एवं डरपोक कांग्रेस सरकारों ने आगे नहीं बढऩे दिया। प्रधानमंत्री मोदी भी इसी सोच से ताल्लुक रखते हैं। उनका और उनके सहयोगियों के बीच तथ्यों को लेकर घालमेल होने की भी यही वजह है। 
 
(द प्रिंट के साथ विशेष व्यवस्था के तहत प्रकाशित)
Keyword: defense, military, india,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या मोदी सरकार के चार साल में जमीन पर हुआ है विकास?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.