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मोदी का करिश्मा कर्नाटक में कारगर!

अर्चिस मोहन /  05 02, 2018

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर्नाटक में अगले 10 दिनों में करीब 20 जनसभाओं को संबोधित करेंगे जिनमें से तीन जनसभाओं को उन्होंने मंगलवार को संबोधित किया। कर्नाटक में तीन प्रमुख राजनीतिक दलों के नेतृत्वकर्ता ने बड़ी बेसब्री से चुनाव अभियान में मोदी के उतरने का इंतजार कर रहे थे। कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का हिंदुत्व का मुद्दा जातिगत निष्ठा के सामने खुद को स्थापित करने की कोशिश में है और सिद्धरमैया की सरकार के खिलाफ ठोस सत्ताविरोधी रुझान की कमी दिखती है। 

 
ऐसे में पार्टी को हार से बचाने और 224 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस को 113 सीटों के बहुमत के  आंकड़े तक पहुंचने से रोकने की जिम्मेदारी एक बार फिर से प्रधानमंत्री मोदी के कंधों पर आ गई है। राज्य में 12 मई को मतदान होना है और मतगणना 15 मई को होगी। लिंगायत, सवर्ण जाति और शहरी मतदाताओं के परंपरागत समर्थन से इतर अन्य मतदाताओं के बीच अपनी जगह बनाने के लिए भाजपा को अब तक संघर्ष करना पड़ा है। सिद्धरमैया की सरकार ने लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक दर्जा देने की सिफारिश की है जिसकी वजह से लिंगायतों का वोट भी भाजपा की वोट हिस्सेदारी में कम हो सकता है खासतौर पर उन जगहों पर जहां कांग्रेस ने लिंगायत उम्मीदवार उतारे हैं। कई छोटे लिंगायत मठों से संचालित शैक्षणिक संस्थान यह बात बखूबी समझते हैं कि इन संस्थानों और समुदाय को दीर्घावधि में अल्पसंख्यक दर्जा मिलेगा। गलत तरीके से उन्होंने अपने अनुयायियों को यह भी बताया कि अनुसूचित जातियों को जो लाभ मिलते हैं वही इस समुदाय को भी मिलेगा। वोक्कालिगा एच डी देवेगौड़ा के नेतृत्व वाले जनता दल (सेक्युलर) के साथ खड़े हैं जबकि ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि सिद्धरमैया के अहिंदा (आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यकों, ओबीसी (कुरुबा सहित) के लिए कन्नड़ शब्द) को कल्याणकारी योजनाओं में तवज्जो दी गई। सभी जातियों के लोग इस बात पर सहमति जताते हैं कि सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं के लिहाज से बी एस येदियुरप्पा ने एक प्रभावशाली सरकार चलाई थी। लेकिन सिद्धरमैया की सरकार इन योजनाओं के बारे में लोगों को जागरुक करने में ज्यादा असरदार रही। राज्य के कुछ क्षेत्रों में लगातार तीन सालों तक सूखा पड़ा जिस दौरान इन योजनाओं ने अपना रंग दिखाया। 12वीं सदी के दार्शनिक गुरु बसवेश्वर की शिक्षा की वजह से ही यहां के लिंगायत समुदाय में उत्तर भारत की तरह आक्रामक हिंदुत्व की अपील नहीं बन पाती है। भाजपा-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के नेतृत्व को भी यह सवाल परेशान कर रहा है कि क्या मोदी का करिश्मा कर्नाटक में भी रंग लाएगा। भाजपा और संघ के कार्यकर्ता मजबूत भारत बनाने की मोदी की कोशिशों और कांग्रेस पार्टी के भ्रष्टाचार का संदेश देने में व्यस्त हैं। लेकिन नेहरु-गांधी परिवार को अब भी कर्नाटक में सकारात्मक तरीके से देखा जाता है। यहां तक की भाजपा के वोटर भी इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को याद करते हैं। हालांकि ज्यादातर लोग सोनिया गांधी या मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बारे में कोई ठोस राय जाहिर नहीं करते हैं। उनका कहना है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में वे मोदी जैसे मजबूत नेता को वोट देंगे। 1998 के बाद से भाजपा ने कर्नाटक में 28 लोकसभा सीटें जीत चुकी है।
 
लोग 'नोटबंदी' को अब तक याद रखते हैं लेकिन उन्हें मोदी के इरादे पर संदेह नहीं है। केंद्र के लिए चिंता की बात यह है कि मुद्रा बैंक और उज्ज्वला योजना जैसी केंद्रीय योजनाएं असरदार नहीं रही हैं। कांग्रेस किसानों को यह बताने में सफल रही है कि सिद्धरमैया सरकार ने सहकारी बैंकों के कृषि ऋण को माफ किया है जबकि मोदी सरकार ने इन बैंकों की ऋण माफी रोक दी थी। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी की अपील ज्यादातर वर्गों में है और वह युवा और मध्यम वर्ग के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। यह सिद्धरमैया सरकार के लिए मुश्किल वाली बात है। कांग्रेस को ग्रामीण क्षेत्र के गरीबों की पार्टी माना जाता है जिसने पर्याप्त तरीके से शहरी वर्ग के मुद्दों का हल नहीं निकाला है जिनमें बेंगलूरु में बुनियादी ढांचा से जुड़ी समस्या भी शामिल है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में मध्यम वर्ग और जमीन आदि रखने वाले लोग सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं से खफा हैं। उनका मानना है कि इससे गरीब आलसी हुए हैं। संपन्न लोगों का मानना है कि सिद्धरमैया ने समाज को जातिगत आधार पर बांट दिया है जबकि मोदी देश को आगे बढ़ाने की बात करते हैं। सभी जातियों के गरीब लोगों का कहना है कि सूखे के दौरान सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं से उन्हें मदद दी गई जिसके लिए उनके मन में सिद्धरमैया के प्रति आभार है। इन लोगों में वोक्कालिगा और लिंगायत गरीब, आदिवासी, दलित और ओबीसी भी शामिल हैं। इस विभाजन से कांग्रेस को निश्चित तौर पर फायदा होगा लेकिन राज्य में शहरीकरण बढऩे और आमदनी में सुधार की वजह से कांग्रेस को निश्चित तौर पर इस वर्ग के लिए काम करना होगा अगर इसे दूसरी पारी में सरकार बनाने का मौका मिलता है। 
 
कर्नाटक की एक पोलिंग एजेंसी सीफोर सर्वे के मुताबिक सिद्धरमैया सरकार के पक्ष में रुझान देखा जा रहा है और इसने पार्टी के लिए 118-130 सीटों का पूर्वानुमान लगाया है। इसने जनता दल (सेक्युलर) की सीटें 2013 के विधानसभा चुनावों की 40 सीटों से घटाकर 30 सीटें कर दी हैं। इस सर्वे में भाजपा को 80 सीटें दी गई हैं। सर्वे का रुझान जमीनी स्तर के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के विचार से काफी मेल खाता है। कुछ लोगों का मानना है कि मोदी के करिश्मे से 20 सीटें अतिरिक्त मिल सकती हैं। हालांकि मोदी की अपील सीमित मानी जा सकती है क्योंकि ज्यादातर मतदाता हिंदी नहीं समझते हैं और प्रधानमंत्री अपने शब्दों से वह जादुई ताना-बाना नहीं बुन सकते जैसा कि वह उत्तर भारत में करने में सफल होते हैं।
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