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हरित प्रगति के मामले में चीन की तेज गति

नितिन देसाई /  05 01, 2018

अगर चीन अपने कार्बन-रहित आर्थिक प्रगति के अभियान में सफल हो जाता है तो भारत पर भी इस राह पर चलने का वैश्विक दबाव बढ़ जाएगा। बता रहे हैं नितिन देसाई

 
हरित प्रगति की रूपरेखा तय करने में चीन क्या पूरी दुनिया का अगुआ बन सकता है? अगर पिछले एक साल में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग और प्रधानमंत्री ली कछ्यांग के दिए बयानों पर गौर करें तो चीन के इस दिशा में बढऩे की संभावना नजर आती है। चीनी नेतृत्व ने पर्यावरण को अधिक अहमियत देने के लिए विकास पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने की मंशा जताई है। एक साल पहले हुए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के 19वें अधिवेशन में 'आसमान को फिर से नीला बनाने' का नारा गूंजा था। अधिवेशन में सरकार ने दो नए मंत्रालयों- प्राकृतिक संसाधन मंत्रालय और पारिस्थितिकी पर्यावरण मंत्रालय के गठन की घोषणा की थी जो विभिन्न संबद्ध एजेंसियों को एक साथ लाने का काम करेंगे। वैश्विक नजरिये से यह बात अहम है कि चीन की यह पहल क्या उसे जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर जारी संघर्ष का अगुआ बना देगी? पिछले कुछ वर्षों में चीन का कार्बन उत्सर्जन कमोबेश स्थिर रहा है लेकिन वर्ष 2015 में जीवाश्म ईंधन पर चीन की निर्भरता प्राथमिक ऊर्जा उपभोग का 87 फीसदी रही है। हालांकि चीन का कार्बन-रहित प्रगति का अभियान पूरी रफ्तार से चलता नजर आ रहा है। पिछले साल चीन का सौर ऊर्जा में हुए वैश्विक निवेश का 54 फीसदी और नवीकरणीय एवं ऊर्जा-दक्ष तकनीकों में हुए कुल निवेश का करीब 40 फीसदी अंशदान रहा। इस तरह 2017 में चीन ने कार्बन-रहित प्रगति की अपनी पहल के तहत कुल 132.6 अरब डॉलर का निवेश किया जो भारत के निवेश से 12 गुना अधिक है।
 
पेट्रोलियम उत्पादों पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए चीन इलेक्ट्रिक वाहनों को बड़ी तेजी से अपना रहा है। वर्ष 2016 में चीन में दुनिया के सर्वाधिक बिजली-चालित कारें थीं। दुनिया भर में करीब 20 लाख इलेक्ट्रिक कारें हैं। 20 करोड़ से अधिक इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन, 33-40 लाख की संख्या में धीमी गति के इलेक्ट्रिक वाहन और तीन लाख से अधिक बिजली-चालित बसों की मौजूदगी के साथ चीन परिवहन साधनों को बिजली-आश्रित बनाने में सिरमौर है। दुनिया भर में बिकने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों का आधा चीन ही खरीदता है। वहां पर इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद पर सब्सिडी भी मिलती है। हाल ही में चीन ने ब्रिटेन और फ्रांस के साथ मिलकर पेट्रोलियम-आधारित वाहनों पर प्रतिबंध की तारीख तय करने की भी बात कही है।
 
अगर चीन अपनी आर्थिक गतिविधियों को कार्बन-रहित कर पाने में सफल रहता है तो वह 2030 के निर्धारित समय से पहले ही अपना उत्सर्जन लक्ष्य हासिल कर लेगा। ऐसा होने पर इस दशक में सालाना 4-5 फीसदी वृद्धि के साथ उत्सर्जन कर रहे भारत पर वैश्विक दबाव बढ़ जाएगा। पर्यावरण पर चीन के इतना जोर देने की मूल वजह यह है कि शहरी मध्य वर्ग की संख्या तेजी से बढ़ी है और कम्युनिस्ट पार्टी की तमाम काउंसिल में उन्हें अच्छा-खासा प्रतिनिधित्व भी मिला हुआ है। शहरी मध्य वर्ग के लोग नौकरियों एवं आय की ही मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे जीवन की बेहतर गुणवत्ता भी चाहते हैं। यह काफी कुछ वैसा ही है जैसे अमीर देशों की राजनीति में पर्यावरण संबंधी चिंताओं का मुखर होना। चीन की सरकार ने भी इस पर अनुकूल प्रतिक्रिया दी है। स्थानीय स्तर पर वायु-प्रदूषण की हालत में आए सुधार को इसकी एक वजह माना जा रहा है। अच्छा मौसम रहने और सरकार के कठोर उपायों का असर यह हुआ कि पेइचिंग में पिछली सर्दियों में पीएम 2.5 का स्तर 35 फीसदी तक कम हो गया। 
 
लेकिन चीन में कार्बन-रहित प्रगति की रफ्तार को आगे बढ़ाने वाला एक और कारक भी है। चीन इन दिनों मध्यम-आय के जाल में उलझा बताया जा रहा है लेकिन इसे मध्यम-आय अवरोध कहना बेहतर होगा। हाल के दशकों में चीन की प्रगति श्रम की अधिकता वाले निर्यात-आधारित विनिर्माण गतिविधियों पर टिकी रही है। लेकिन जैसे ही चीन मध्यम आय के स्तर पर पहुंचा और मजदूरी में बढ़ोतरी हुई तो श्रम-प्रधानता वाले विनिर्माण में उसकी प्रतिस्पद्र्धी बढ़त कम हो गई और बाजार में अधिक मौजूदगी से संरक्षणवादी कदमों को भी न्योता मिला। चीन को अब उच्च तकनीक वाले उत्पादों के क्षेत्र में आगे बढऩा है और उसे नकल के बजाय नई खोज को तवज्जो देनी होगी। इसके अलावा उसे निर्यात के अलावा घरेलू बाजारों पर भी ध्यान देना होगा। इस कायापलट को ही मध्यम-आय अवरोध कहा जा सकता है और इस बाधा को पार करने के लिए कार्बन-रहित विकास पहला कदम है।
 
दक्षिण कोरिया और चीन जैसे अपेक्षाकृत छोटे देशों ने इस बाधा को सफलता से पार किया है लेकिन चीन की अर्थव्यवस्था काफी बड़ी है और अगर वह इस बाधा को पार कर लेता है तो वह पश्चिमी देशों के तकनीकी एवं आर्थिक वर्चस्व को चुनौती देने की स्थिति में पहुंच जाएगा। ऐसा लगता है कि चीन के नवीकरणीय ऊर्जा एवं इलेक्ट्रिक वाहन कार्यक्रम को शुरुआती कदम रखने के नाते बढ़त हासिल करने के इरादे से डिजाइन किया गया है। बीसवीं सदी में पेट्रोलियम एवं बिजली-संचालित अर्थव्यवस्थाओं के मामले में अमेरिका, यूरोप और जापान को ऐसी ही बढ़त वाली हैसियत हासिल थी। चीनी नेतृत्व को यह समझ में आ चुका है कि आने वाले दशकों में आर्थिक शक्ति प्राकृतिक संसाधनों के बजाय सीमांत तकनीकों पर नियंत्रण से निर्धारित होगी। चीन ने दूरदर्शिता दिखाते हुए इन तकनीकों के लिए जरूरी प्राकृतिक संसाधन लिथियम और कोबाल्ट मंगाना शुरू कर दिया है।
 
आर्थिक प्रभुत्व के एक साधन के तौर पर कार्बन-रहित प्रगति की दिशा में आगे बढऩा चीनी कम्युनिस्ट पाटी के 19वें अधिवेशन में राष्ट्रपति शी चिनफिंग के भाषण से भी सही लगता है। उस भाषण में शी ने विकास की रणनीति पेश की थी। दरअसल चीन चाहता है कि अब वह संसाधनों की अधिकता वाले विकास के बजाय ज्ञान की सघनता वाले विकास की राह पर चले। चीन सरकार और कंपनियां पहले से ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स और ऑटोमेशन में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं। इन तकनीकों के लिए बड़े डेटा उपयोग की जरूरत होती है और उसके लिए चीनी कंपनियों को तगड़ी लड़ाई लडऩी पड़ी है। चीन की ई-कॉमर्स एवं ई-भुगतान सेवा कंपनियों का जुटाया हुआ डेटा उसके बहुत काम आया है। इस दौरान चीन ने बेहद व्यवस्थागत ढंग से बड़ी अमेरिकी कंपनियों को कारोबार से बाहर रखा और टेंसेंट होल्डिंग्स, अलीबाबा और बाएडु जैसी कंपनियों को आगे बढ़ाया। उसने अपने उच्च शिक्षा नेटवर्क को भी उन्नत करने में भारी निवेश किया है। इसी का नतीजा है कि चीन के सात और हॉन्गकॉन्ग के पांच विश्वविद्यालय टाइम्स एजुकेशन सप्लीमेंट्स की रैंकिंग में शीर्ष 200 शिक्षण संस्थानों में शामिल हैं। वहीं भारत का एक भी संस्थान इस रैंकिंग में जगह नहीं बना पाया है।
 
शी ने चीन को बहुमुखी व्यापार के रक्षक के तौर पर पेश करने की कोशिश की है और मुक्त व्यापार प्रणाली इसमें एकदम सटीक बैठती है। शी ने हाल ही में बाओवा फोरम में कारोबार को उदार बनाने और चीनी बाजार तक आसान निवेश पहुंच की जो बातें कही थीं, वे महज जुबानी जमा खर्च थीं और असल में वे डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन के व्यापार युद्ध का जवाब देना चाह रहे थे। लेकिन मुमकिन है कि चीनी योजनाकारों को यह अहसास हो कि ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था के लिए आयात बंदिशों को शिथिल करना जरूरी होता है। बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव चीन की ढांचागत पहुंच को उसकी सीमाओं से परे ले जाता है और उसमें वर्चस्व कायम करने की मंशा निहित है।
 
भारत के लिए संदेश पूरी तरह स्पष्ट है। जैसे ही हम मध्यम-आय अवरोध की तरफ बढ़ते हैं तो हमें हरित प्रगति, तकनीकी विकास और नवाचार एवं गुणवत्तापरक शिक्षा वाली पारिस्थितिकी तैयार करने में अपनी सभी कमियों पर काबू पाना होगा। अगर हम ऐसा नहीं कर पाते हैं तो पश्चिम पर तकनीकी निर्भरता के बजाय हम चीन पर निर्भर बनकर रह जाएंगे।
Keyword: china, india, carbon, pollution,,
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