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विदेशी फंडों पर सेबी की नजर

पवन बुरुगुला / मुंबई April 30, 2018

बाजार नियामक ने करीब 15 दिन पहले प्रवासी भारतीयों के घरेलू बाजार में निवेश करने के नियमों को सख्त बना दिए। उसके बाद कई विदेशी फंड अब भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के जांच के दायरे में आ गए हैं।  सूत्रों के अनुसार नियामक ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) से निवेश और अंतिम लाभार्थी से संबंधित जानकारियां मांगी हैं। सेबी ऐसे प्रवासी भारतीयों द्वारा प्रबंधित फंडों का भंडाफोड़ करना चाहता है जो भारतीय मूल के व्यक्तियों (पीआईओ) के पैसों के हेरफेर से जुड़े हैं।
 
सेबी का एफपीआई नियमन किसी भी ऐसे फंड पर रोक लगाता है, जिसका नियंत्रण पीआईओ या एनआरआई द्वारा किया जा रहा हो। ऐसी इकाइयों को इस शर्त पर एफपीआई लाइसेंस की अनुमति होती है कि वह केवल निवेश सलाहकार के तौर पर काम करेंगे और अपना पैसा निवेश नहीं करेंगे। हालांकि वैश्विक फंड आमतौर पर कोष प्रबंधकों से कुछ सीड कैपिटल या आरंभिक पूंजी डालने को कहता है। ऐसे में कई प्रवासी कोष प्रबंध नवोन्मेषी ढांचे जैसे सीमित दायित्व साझेदारी (एलएलपी) के माध्यम से आरंभिक पूंजी निवेश करते हैं। ऐसे में इन एलएलपी के लाभार्थी या तो कोष प्रबंधक खुद होते हैं या फिर उनके परिवार के सदस्य लाभार्थी होते हैं। अब तक ऐसी कार्यप्रणाली को लेकर सेबी का रुख नरम रहा था। लेकिन पैसों को इधर से उधर करने में इसका दुरुपयोग होने से नियामक ने कड़ा रुख अपनाया है और कोष प्रबंधकों तथा भारतीयों के बीच संबंधों को लेकर चिंता जताई है।
 
इनमें से अधिकांश फंड मॉरीशस, केमन आईलैंडï्स और लक्जमबर्ग जैसे देशों से जुड़े होते हैं, जहां घरेलू कानून नरम हैं। इन फर्मों के गठन के लिए वहां न्यूनतम अनुपालन की जरूरत होती है। मामले के जानकार एक सूत्र ने बताया, 'कई भारतीय एफपीआई का बेजा इस्तेमाल करते हैं। यही वजह है कि सेबी अब इस पर कड़ी नजर रख रहा है।' कई देशों में नया फंड शुरू करने के लिए प्रबंध को खुद अपना पैसा लगाना होगा है। उदाहरण के तौर पर सिंगापुुर में कोष प्रबंधक को 240,000 डॉलर आरंभिक पूंजी का निवेश करना होता है। आईसी यूर्निवर्सल लीगल के पार्टनर तेजस चितलांगी ने कहा, 'फंड की स्थापना करने के लिए आरंभिक पूंजी या सामान्य साझेदार का योगदान जैसी अवधारणा आम है। लेकिन भारतीय मूल का कोई ऐसा निवेश करता है तो वह एफपीआई नियमों का सीधा उल्लंघन माना जाता है।' 
 
11 अप्रैल को जारी परिपत्र में सेबी ने एफपीआई के जरिये प्रवासी भारतीयों के निवेश की सीमा को घटा दिया था। एफपीआई नियमों के तहत प्रवासी भारतीय विदेशी फंड का लाभार्थी मालिक नहीं हो सकता। इसके साथ ही सेबी ने लाभार्थी मालिक की परिभाषा में भी बदलाव किया है। नए नियमों के तहत भारतीय मूल का कोई भी व्यक्ति साझेदारी वाले फंड में 15 फीसदी से ज्यादा और कंपनी के तौर गठित फंड में 25 फीसदी से ज्यादा का हिस्सा नहीं ले सकता। इसी तरह वित्तीय कार्यबल (एफटीएएफ) द्वारा अधिसूचित उच्चद जोखिम वाले देशों में गठित फंड में निवेेश की अधिकतम सीमा 10 फीसदी होगी। नियमों में बदलाव से पहले कुल निवेश की सीमा 51 फीसदी थी।
 
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में निवेश करने वाले फंड के वास्तविक मालिकों के बारे में जानकारी प्राप्त करना सेबी के लिए मुश्किल नहीं है। फिनसेक लॉ एडवाइजर्स के पार्टनर अनिल चौधरी ने कहा, 'सेबी की एफपीआई से संबंधित सभी लेनेदन की जानकारी तक पहुंच होती है। विदेशी फंडों की तिमाही रिपोर्ट से वह के मालिकों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकता है। अंतिम लाभार्थी की जानकारी के सेबी का विदेशी नियामकों के साथ कई तरह के आपसी समझौते होते हैं। ऐसे में सेबी के लिए जानकारी जुटाना कोई बड़ा मसला नहीं है।' बीते समय में काले धन पर गठित विशेष जांच दल ने पी-नोट्स के अत्यधिक इस्तेमाल और स्टॉक एक्सचेंजों का इस्तेमाल पैसों को इधर से उधर करने में दुरुपयों को लेकर आशंका जताई थी। इसके बाद सेबी ने विदेशी निवेश पर सख्ती शुरू की।
Keyword: fund, sebi, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),
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