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पुरानी नीति बेहतर

संपादकीय /  04 26, 2018

गत 22 अप्रैल को विश्व पृथ्वी दिवस से चंद रोज पहले प्लास्टिक से होने वाला प्रदूषण समाप्त करने की कोशिश में सरकार ने प्लास्टिक कचरा प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2018 पेश किए। बहरहाल, ये नियम कचरे को कम करने के बजाय बढ़ाने की वजह बनते दिखते हैं। नए मानकों में निर्माताओं, पुनर्चक्रण करने वालों और प्लास्टिक के उपभोक्ताओं की कारोबारी सुगमता को ध्यान में रखा गया है जबकि इसकी कीमत पर्यावरण और जन स्वास्थ्य को चुकानी होगी। वर्ष 2016 में प्रस्तुत प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नीति के कई सख्त और मजबूत प्रावधान या तो समाप्त या बेहद शिथिल कर दिए गए हैं। नई नीति में शायद ही कोई ऐसा प्रावधान है जो पेट्रोलियम आधारित गैर अपघटनीय और प्रदूषण फैलाने वाले प्लास्टिक के उत्पादन को हतोत्साहित करता हो। वहीं जैविक रूप से अपघटित होने वाले और कंपोस्ट बनने योग्य प्लास्टिक के विकल्पों के निर्माण और उपयोग को बढ़ावा देने के लिए भी कोई प्रस्ताव नहीं रखा गया है। 

 
भारत में हर रोज करीब 25,940 टन प्लास्टिक का कचरा तैयार होता है। इसके अवशेष पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों में सैकड़ों साल तक रहने वाले हैं। प्लास्टिक की विषाक्तता जमीन और जलीय दोनों जगहों पर जीवन के लिए अत्यंत नुकसानदेह है। भोजन की बात करें तो यह इंसानी हार्मोन में छेड़छाड़ कर सकता है जिससे गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। प्लास्टिक की सामग्री खासतौर पर बैग और बोतलें सड़कों पर यूं ही बिखरी रहती हैं। इनकी वजह से नालियां जाम होने की खबरें आए दिन मिलती हैं। ये बोतलें और प्लास्टिक आवारा पशुओं की जान भी ले लेते हैं। नई प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नीति ने इन सब बातों की अनदेखी की है। यह सच है कि प्लास्टिक को पूरी तरह अनदेखा नहीं किया जा सकता। कृषि, वाहन, पैकिंग, सूचना प्रौद्योगिकी और जैवचिकित्सा उद्योग आदि कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां उसका इस्तेमाल अपरिहार्य है। परंतु प्लास्टिक का विघटन न होना और उसके जलने से निकलने वाली जहरीली गैस गंभीर चिंता का विषय हैं। ऐसे में प्लास्टिक के कचरे का उचित प्रबंधन आवश्यक है। दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो रहा है।
 
देश के प्लास्टिक कचरे में से 70 फीसदी से भी अधिक का निपटान असंगठित क्षेत्र करता है। जाहिर है यह काम बहुत कुशलता से नहीं किया जाता। वर्ष 2016 के नियमों में एक उल्लेखनीय बात जिसमें बदलाव किया गया है वह है बहुस्तरीय प्लास्टिक को चरणबद्घ तरीके से चलन से बाहर करना, नष्टï न हो सकने योग्य प्लास्टिक के उत्पादन को कम करना और प्लास्टिक की थैलियों की सुस्पष्टï कीमत तय करना। हालांकि इस उपाय का क्रियान्वयन बहुत शिथिल अंदाज में हुआ लेकिन इससे प्राकृतिक तंतुओं या उन चीजों से बने थैलों की तादाद बढ़ी जिनकी इजाजत है। अब इस प्रावधान को रद्द कर दिया गया है। अहम बात यह है कि ऐसा बहुस्तरीय प्लास्टिक जिसे दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है और जिसे चरणबद्घ रूप से समाप्त किया जाना था, उससे जुड़े मानक शिथिल कर दिए गए हैं। 
 
नई नीति में प्रतिबंध केवल उस बहुस्तरीय प्लास्टिक पर है जिसका दोबारा इस्तेमाल संभव नहीं या जिसका कोई वैकल्पिक इस्तेमाल नहीं। यानी अब बहुस्तरीय प्लास्टिक की ऐसी कोई श्रेणी ही नहीं बची जिसे समाप्त किया जाए। हर उत्पाद का कोई न कोई वैकल्पिक इस्तेमाल सुझाया जा सकता है ताकि प्रावधान से बचा जा सके। इसके अलावा नई नीति में उत्पादक की विस्तारित जिम्मेदारी पर भी नरमी बरती गई है। इसके तहत प्लास्टिक उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों को यह सुनिश्चित करना होता था कि वे अपने उत्पाद का पर्यावरण प्रबंधन मजबूत करें। ऐसे में कह सकते हैं कि नए नियमों में कई खामियां हैं जिन्हें दूर किया जाना चाहिए और 2016 की नीति को वापस लाया जाना चाहिए। अगर उसे ठीक से क्रियान्वित किया जाए तो प्लास्टिक प्रदूषण से बचा जा सकता है। 
Keyword: plastic, pollution,,
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