बिजनेस स्टैंडर्ड - नोटबंदी के नुकसान का जारी सिलसिला
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स्वरोजगार की अवधारणा पर डालें नई नजर

राधिका कपूर /  04 24, 2018

नोटबंदी का असर खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। प्रधानमंत्री ने करीब डेढ़ साल पहले टेलीविजन पर यह घोषणा की थी कि 500 और 1,000 रुपये के नोट बंद किए जा रहे हैं। अब भी देश में नकदी की तंगी दूर नहीं हुई है। आधुनिक बाजार अर्थव्यवस्था के सामने जो सबसे मूलभूत प्रश्न है वह एक मजबूत बुनियाद यानी मुद्रा आपूर्ति का है। मोदी और रिजर्व बैंक ने कुछ हद तक उसे कमजोर किया है।  कर्नाटक, तेलंगाना, बिहार और गुजरात समेत देश भर से एटीएम में नकदी न होने की खबरें आईं। आरबीआई ने इस बारे में कोई आंकड़ा जारी नहीं किया है। आर्थिक मामलों के सचिव ने अत्यधिक निकासी के कुछ आंकड़े पेश किए। ये आंकड़े आरबीआई के एटीएम से निकासी संबंधी आंकड़ों से मेल नहीं खाते। एसबीआई रिसर्च जैसे प्राथमिकता वाले संस्थानों ने इस भ्रम में और इजाफा किया: पहले उन्होंने दावा किया कि सिस्टम में 70,000 करोड़ रुपये की कमी है और बाद में कहा कि मार्च तिमाही में एटीएम निकासी की दर गिरी है। यह जानकारी भी सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध आंकड़ों के उलट है। 

 
सरकार और आरबीआई ने इसे लेकर जो प्रतिक्रिया दी है वह संतोषजनक नहीं रही है। एक ओर, हमसे कहा गया कि नकदी की मांग में इजाफा हुआ जिससे इसमें कमी आई जबकि दूसरी ओर उसी वक्तव्य में कहा गया कि नकदी की जरूरत से ज्यादा आपूर्ति है। दोनों बातें सच नहीं हो सकतीं। दो बातें स्पष्टï हैं। पहली, नोटबंदी ने देश की मौद्रिक स्थिरता पर व्यापक असर डाला। दूसरा, इस सरकार और आरबीआई ने दिखाया है कि वे वृहद अर्थव्यवस्था का बेहतर नेतृत्व करने में नाकाम रहे हैं। उन्होंने खुद यह घोषणा कर दी कि वे मांग में इस इजाफे से चकित हैं। 
 
अगर मांग में बढ़ोतरी हुई तो इसकी क्या वजह रही होगी? पहली बात, इसके लिए अस्वाभाविक एकबारगी वजह जिम्मेदार हो सकती हैं मसलन, क्षेत्रीय नव वर्ष उत्सव, कर्नाटक विधानसभा चुनाव, किसानों की जरूरत आदि। ऐसे कारकों का मिश्रण अधिकारियों के लिए अक्षमता के आरोपों के खिलाफ अच्छा बचाव साबित हो सकता है। गौरतलब है कि चुनाव, त्योहार और बुआई के मौसम का अनुमान लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है। दूसरा, विपक्ष के इस दावे पर भी गौर करना होगा कि बैंकों में  अविश्वास बढ़ रहा है। एक के बाद एक धोखाधड़ी के मामले सामने आने से और सरकार के राजकोषीय निस्तारण और जमा बीमा (एफआरडीआई) विधेयक के बारे में सामने आई जानकारियों ने इसमें मदद की। यह धारणा बनी कि यह विधेयक जमाकर्ताओं के पैसे की सुरक्षा करने में विफल है। वर्ष 2017-18 में जमा की वृद्धि दर बीते 54 वर्षों में सबसे अधिक धीमी रही। वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने पीटीआई से नाम जाहिर न करने की शर्त पर कहा था कि इसके लिए एफआरडीआई विधेयक जवाबदेह है। अखिल भारतीय बैंक अधिकारी महासंघ ने भी यही राय प्रकट की थी। अगर ये आशंकाएं सही हैं तो दोष एक बार फिर सरकार पर जाता है। ऐसे में नकदी की जमाखोरी का अंदाजा लगा लिया जाना चाहिए था।
 
तीसरी बात, क्रेडिट सुइस के नीलकंठ मिश्रा का कहना है कि कम से कम 2009 से नकदी की मांग दो पखवाड़ों में बढ़ती आई है। एक तो दीवाली का पखवाड़ा और दूसरा नए वित्त वर्ष का पहला पखवाड़ा। यदि यह बात सही है तो सरकार का अतिरिक्त मांग का दावा मौसमी है और इसका अनुमान भी लगा लिया जाना चाहिए था।  चौथा, फिलहाल प्रचलित नकदी के स्वरूप पर भी नजर डाली जा सकती है। बहुत कम लोग 2,000 रुपये का नोट लेनदेन में इस्तेमाल करते हैं लेकिन नकदी जमा करने के लिए वह बेहतर विकल्प है। 200 के नोट तेजी से छापे जा रहे हैं। वह दो तरह से प्रयोग में आ सकता है। 2,000 के नोट जमा करने वाले उसका छुट्टा 200 से करा सकते हैं। ताकि वे आसानी से लेनदेन कर सकें। या फिर इससे अत्यधिक नकदी की स्थिति बन सकती है क्योंकि लोग 2,000 के नोट जमा कर रहे हैं। बहरहाल, सच यही है कि सरकार और आरबीआई दोनों को इसका अंदाजा होना चाहिए। परंतु लगता नहीं कि ऐसा था। लग तो ऐसा रहा है मानो सरकार और आरबीआई तकनीकी और राजनीतिक मांग के आधार पर नकदी को आगे बढ़ा रहे हैं।
 
अब आखिरी बात पर आते हैं। नोटबंदी ने देश की मौद्रिक स्थिरता को गहरा नुकसान पहुंचाया। अभी भी बहुत कम नकदी प्रचलन में है। जो नकदी है भी उसमें भी उच्च मूल्य वर्ग और कम मूल्य की मुद्रा में सुसंगतता नहीं है। हो सकता है इस समय नोटबंदी से ज्यादा नकदी प्रचलन में हो लेकिन देश की नॉमिनल जीडीपी भी बहुत ज्यादा है। अगर उपभोक्ताओं का व्यवहार नोटबंदी के पहले जैसा है तो नकदी की कमी होनी ही है। विवेक कौल के मुताबिक करीब 1,30,000 करोड़ रुपये की कमी अर्थव्यवस्था में है। सरकार ने नोटबंदी को उचित ठहराने की एक दलील यह थी कि भारत डिजिटल भुगतान की ओर बढ़ेगा और नकदी की कम आवश्यकता होगी। सरकारी अधिकारी शायद उसी मान्यता को सच मानकर चल रहे हैं। संकट की एक वजह यह भी हो सकती है। जबकि हकीकत यह है कि नोटबंदी से कोई बदलाव नहीं आया है। हां, लोग नकदी की उपलब्धता को लेकर और अधिक चिंतित अवश्य रहने लगे हैं। उन्हें नकदी की कमी से उपजी दिक्कतों का अहसास हो चुका है और इसलिए नकदी जमा करने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। नोटबंदी की नीति गलत और खतरनाक थी। 
 
आरबीआई ने मौद्रिक स्थिरता के गारंटर की अपनी विश्वसनीयता को क्षति पहुंचाई है। सरकार अपनी नाकामी को स्वीकार न करके आगे और नुकसान की राह बना रही है। देश में नकदी की कमी है, मांग में मौसमी इजाफे से निपटने में नाकामी हाथ लग रही है और नकदी की अस्थायी कमी होने पर भी अफरातफरी का माहौल बन रहा है। इस नुकसानदेह नीति की जवाबदेही कौन लेगा? 
Keyword: demonetisation, note, narendra modi,,
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