बिजनेस स्टैंडर्ड - कर सुधार में कुछ खास बातों की दरकार
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कर सुधार में कुछ खास बातों की दरकार

पार्थसारथि शोम /  04 23, 2018

प्रत्यक्ष कर संहिता में कराधान के आठ सिद्घांतों को अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं पार्थसारथि शोम

 
हाल ही में मैंने प्रत्यक्ष कर संहिता तैयार करने विशिष्टï पहलुओं के बारे में लिखा था। इस आलेख में मैं कर डिजाइन की मूलभूत बातों की चर्चा करूंगा। 
 
सिद्घांत: जब अर्थव्यवस्थाएं बेहतर काम करती हैं तो इक्विटी चिंता का विषय नहीं होती। परंतु जब उसकी स्थिति ठीक नहीं होती तब बेहतर कराधान उन लोगों की रक्षा करते हैं जो कमजोर हों। दूसरा, बेहतर कर दरें किसी अर्थव्यवस्था को अवांछित या अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव से भी बचाव मुहैया कराती हैं। उदाहरण के लिए संकट और संकट के बाद के दिनों में। तीसरा, करों को इस तरह तैयार किया जाना चाहिए कि कर प्रोत्साहन को न्यूनतम कर संसाधन आवंटन की किफायत से जुड़े मामलों को हल करें। ये मामले तमाम क्षेत्रों में सापेक्षिक कीमतों को विसंगतिपूर्ण बनाते हैं और उत्पादन के लिए गलत संकेत देते हैं। 
 
उन तीन सिद्घांतों के अलावा चौथी बात यह है कि किसी भी देश का प्राधिकार ऐसे कर ढांचे में रुचि दिखाएगा जिसमें बेहतर दिनों में आयकर की मदद से और अपस्फीति के दिनों में वैट या जीएसटी के जरिये राजस्व जुटाने का माद्दा हो। पांचवां, कर तैयार करने वालों के नेक इरादों के बावजूद अगर कर कानून जटिल हो और उसकी व्याख्या करना मुश्किल हो तो कर व्यवस्था अपनी धार खो बैठती है और कानूनी प्रक्रिया में उलझ जाती है। यह कानूनी प्रक्रिया कई दफा काफी लंबी खिंचती है। छठी बात, सहजता और करदाताओं के अनुपालन की सुगमता को कर डिजाइन का एक अहम पहलू माना गया। सातवां, कर प्रशासन में पारदर्शिता, उसका भ्रष्टï न होना और कानून को निरपेक्ष ढंग से लागू करना और प्रशासनिक नियम कायदों का इस्तेमाल मिलकर व्यवस्था की सफलता तय करते हैं। आठवां, कर ढांचे से कारोबारी निर्णय प्रक्रिया की स्थिरता नहीं खत्म होनी चाहिए। उत्पादन, आपूर्ति और वृद्घि के लिए वह अहम है। 
 
सैद्घांतिक टकराव: इन सिद्घांतों में टकराव हो सकता है और सुधार के नतीजे अनियमित हो सकते हैं। एक निष्प्रभावी कर अल्पावधि में राजस्व बढ़ाता है लेकिन यह आर्थिक वृद्घि पर बुरा असर डाल सकता है और मध्यम अवधि में राजस्व में स्थिरता आ सकती है। पूंजीगत लाभ पर कर लगाने से आय के स्रोतों में असमानता आ सकती है। इसके बावजूद पूंजीगत आय का विपरीत कर उपचार पूंजी संग्रहण को कमजोर कर सकता है और आर्थिक वृद्घि को नुकसान पहुंचा सकता है। इसी आशंका के चलते बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पूंजी प्रतिफल पर कर लगाने को लेकर लंबे समय तक ऊहापोह की स्थिति रही। समस्या के दोनों सिरों यानी कर की कमी और दोहरे कराधान से निपटने की प्रक्रिया निहायत धीमी रही। हम दोहरे कराधान से दूर रहने के समझौतों की दिशा में तेजी से आगे नहीं बढ़ सके। कई मामलों में तो अतीत से प्रभावी कराधान भी देखने को मिला। 
 
कर सुधार की विशिष्टता: यह सवाल उठता है कि कर सुधार कितने भौगोलिक क्षेत्र में विस्तार का औचित्य रखते हैं? पहली बात तो यह है कि अर्थशास्त्र का कोई भी सर्वेक्षण या विधिक जानकारी यही बताती है कि विभिन्न शोधकर्ताओं और लेखकों ने कर विशिष्टïता का अपने-अपने तरीके से प्रयोग किया है। अर्थशास्त्री किफायती मानकों पर जोर देते हैं। वे ऐसे ढांचे को पसंद नहीं करते जिसमें बहुत सारे कर प्रोत्साहन हों। कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि जिस व्यवस्था में कराधान को व्यय नीतियों पर इक्विटी हासिल करने के लिए प्रयोग किया जाता है वे अच्छी नहीं होतीं। विधिक विशेषज्ञ कानून की स्पष्टïता पर ध्यान केंद्रित रखते हैं। अगर कानून अस्पष्टï है तो वे उसकी काल्पनिक व्याख्या करते हैं। तब अंतिम निर्णय न्यायपालिका का होता है। फिर भी किसी प्रशासक का सबसे बेहतर कर ढांचा वही होता है जो सबसे अधिक राजस्व दिलाए। यह वैसा ही है मानो कर अर्थशास्त्रियों तथा विधिक विशेषज्ञों और कर अर्थशास्त्रियों तथा प्रशासकों के बीच कांच की कोई दीवार हो। विधिक विशेषज्ञ और कर प्रशासक के बीच कानून की व्याख्या को लेकर भी मतांतर हो सकता है। यह उनकी पेशेगत अवधारणा से संबद्घ है। इस अंतर को दूर करना अहम चुनौती है।
 
ऐसे अंतरों के बावजूद जब सुधार होता है तो प्रमाण यही बताते हैं कि तकरीबन पांच साल बाद नई तरह की चुनौतियां सामने आ जाती हैं। पहली, जिन पर बुरा असर पड़ता है वे गुटबंदी शुरू कर देते हैं। अक्सर वे मजबूती के साथ अपने अधिकार बहाल कराने का प्रयास करते हैं। आमतौर पर वे क्षेत्र आधारित कर प्रोत्साहन, कर अवकाश, कम वैट दर आदि की बात करते हैं। इस प्रकार जो लोग कर अनुपालन की कठिनाइयों का जिक्र कर रहे होते हैं वे कर प्रोत्साहन के हमेशा उत्सुक नजर आते हैं। 
 
दूसरी बात यह है कि अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में चार, पांच या छह साल में सरकार बदल जाती है। नया प्रशासन सार्वजनिक नीति पर अपनी छाप छोडऩा चाहता है। कर नीति भी इसमें शामिल है। तीसरी बात यह कि कर सुधार शब्द अपने आप में सुधार शब्द की व्याख्या को लेकर पूरी तरह स्पष्टï नहीं है। किसी भी बदलाव को सुधार का नाम दे दिया जाता है और लगातार सरकारों ने एक के बाद एक अपने पूर्ववर्ती के कदमों को बदलने का प्रयास किया है। जाहिर है इन बदलावों को शायद ही सुधार कहा जा सकता है। कुछ मामलों में प्रशासकों ने बदलाव के लिए बाकायदा एक व्यापक विभाग का गठन किया। इससे एक विचित्र व्याख्या निकली कि कर नीति या कर प्रशासन सुधार शायद कभी संतुलित अवस्था प्राप्त नहीं कर सकते। चौथा, बढ़ती वैश्विक पहुंच और करों के अंतरराष्ट्रीयकरण के बीच किसी देश का कर ढांचा अंतरराष्ट्रीय कराधान की बहुपक्षीय गतिविधियों तथा राजनीतिक या व्यापारिक गतिविधियों से भी प्रभावित होता है। यानी बाहरी झटके देश के भीतर के कर सुधारों को प्रभावित कर सकते हैं। 
 
जोखिम बनाम अनिश्चितता: मैं इनमें से आठवें सिद्घांत यानी कारोबारी निर्णय में स्थिरता को उसके महत्त्व के लिए अलग से रेखांकित करता हूं। एक निवेशक निवेश करने के पहले जोखिम का आकलन करता है। निवेश पर जोखिम का यह आकलन बाजार के माहौल, मौजूदा कर ढांचे और जोखिम के प्रति उसके रवैये से तय होता है। परंतु अनिश्चितता उसके कारोबारी मॉडल को प्रभावित करती है। अगर निवेश का निर्णय समय पर ले लिया जाए और सरकार कर कानून को अतीत की तिथि से बदल दे तो उसके निवेश का आधार ही लडख़ड़ा जाएगा और अनिश्चितता का माहौल बनेगा। कर प्राधिकार इस कानूनी उपाय का प्रयोग गंवाए गए राजस्व की वसूली में करता है। यह उचित सिद्घांत नहीं है। 
 
ध्यान देने वाली बात है कि अप्रत्यक्ष स्थानांतरण का गैर कराधान अपने आप में अलंघनीय नहीं है। अप्रत्यक्ष स्थानांतरण को कराधान से सुरक्षित रखना एक कानूनी मिथक है। संभवत: उनके कराधान की कठिनाई या अव्यवहार्यता उन्हें कानून में गैर कर योग्य बनाती है। आदर्श रूप में देखा जाए तो अप्रत्यक्ष स्थानांतरण पर कर लगना चाहिए लेकिन अतीत की तिथि से नहीं। किसी भी नई प्रत्यक्ष कर संहिता में इस पहलू को ध्यान में रखना चाहिए। अपने अंतिम विश्लेषण में यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि इन आठों सिद्घांतों का ध्यान रखा गया है या नहीं।
Keyword: income tax, CBDT, आयकर विभाग कराधान,
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