बिजनेस स्टैंडर्ड - नकदी में कमी के लिए आरबीआई जिम्मेदार
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नकदी में कमी के लिए आरबीआई जिम्मेदार

अभिषेक वाघमारे /  04 22, 2018

दक्षिण भारत में नोटों की कमी की समस्या की शुरुआत हुई और इसके बाद पिछले दो हफ्ते के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में इस समस्या का सामना करना पड़ा। पूर्व निवेश बैंकर और कांग्रेस के डेटा एनालिटिक्स विभाग से जुड़े राजनीतिक अर्थशास्त्री प्रवीण चक्रवर्ती ने अभिषेक वाघमारे से इस विषय पर बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश : 

 
नकदी की कमी की समस्या की आखिर मूल वजह क्या है?
 
इस समस्या की जड़ के बारे में बात करने से पहले हम उन पहलुओं पर बात करते हैं जो नोटों की कमी से भी ज्यादा हैरान करते हैं। 17 अप्रैल को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने कहा कि उनके करेंसी चेस्ट और खजाने में पर्याप्त नकदी है। ठीक इसी दौरान वित्त मंत्रालय ने कहा कि नकदी की मांग में असामान्य तेजी देखी जा रही है। जब मुद्रा प्रबंधन का काम विशेष रूप से आरबीआई के दायरे में आता है, लेकिन आरबीआई और सरकार के बीच में ही भ्रम की स्थिति है, तो समस्या यहीं दिखती है। यह कहना कि हमारे पास पर्याप्त पूंजी है लेकिन एटीएम में समस्या या फिर ज्यादा नकदी निकालने जैसी बातों से शीर्ष बैंक की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती है। 
 
आप सरकार या आरबीआई किससे ज्यादा सहमत हैं?
 
क्रेडिट सुइस की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 1 अप्रैल से 13 अप्रैल के बीच 450 अरब रुपये नकदी की मांग थी जिसका जिक्र वित्त मंत्री ने भी किया लेकिन पिछले दो सालों में समान अवधि के दौरान (अप्रैल के शुरुआती 13 दिनों) नकदी की मांग करीब 500 अरब रुपये थी। सरकार को इसके बारे में स्पष्टीकरण देना चाहिए कि अगर इस साल नकदी की मांग पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले कम थी तब आखिर सरकार ने मांग में असामान्य बढ़ोतरी को दोष क्यों दिया?
 
इसके अलावा 2,000 रुपये के नोट गायब होने, चुनाव और रबी कटाई सीजन की भी चर्चा की जा रही है। आपका इस पर क्या कहना है?
 
कटाई का सीजन और चुनाव क्या सभी राज्यों में या कुछ राज्यों में हर साल नहीं होगा? उनका यह तर्क कारगर नहींं है। जहां तक 2,000 रुपये के नोटों की बात है, जुलाई 2017 की रिपोर्ट में यह कहा गया था कि फरवरी 2017 में ही छपाई का काम बंद हो गया था यानी अब तो एक साल से ज्यादा का वक्त हो गया। अगर मामला ऐसा है तो नोटों की कमी अप्रैल 2018 में ही क्यों हुई, सितंबर 2017 या दिसंबर 2017 में क्यों नहीं हुई? इससे संकट की वास्तविक वजह स्पष्ट नहीं हो रही। कुछ लोगों ने 2,000 रुपये के नोटों की गतिशीलता की तरफ इशारा किया है, लेकिन आखिर यह मुद्दा नया क्यों है जब एक साल पहले ही नोटों की छपाई बंद हो गई थी?
 
क्या आपका मानना है कि अर्थव्यवस्था में पर्याप्त नोट है? क्या भारत को ज्यादा नकदी की जरूरत है?
 
भारतीय अर्थव्यवस्था में निश्चित अनुपात में मुद्रा की जरूरत है जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि पर निर्भर होता है। वर्ष 2008-09 और 2015-16 के दौरान जीडीपी के मुकाबले चलन में रहने वाली मुद्रा का अनुपात 11.5 फीसदी और 12 फीसदी के बीच था जो नोटबंदी के बाद कम होकर 8.7 फीसदी हो गया। चलन वाली मुद्रा और जीडीपी का अनुपात अब 10.7 फीसदी के स्तर पर आ गया है जिससे सीधे तौर पर यह अंदाजा मिलता है कि अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी नकदी से कम पैसे उपलब्ध हैं। मौजूदा संकट दरअसल नोटबंदी को उचित ठहराने की सरकार की अतार्किक कोशिश और बाजार के मुकाबले डिजिटल ट्रांजेक्शन में आई तेजी के बीच बने द्वंद्व का नतीजा है और अर्थव्यवस्था को ऊपर से अप्रत्याशित दबाव से जूझना पड़ता है। 
 
तो क्या नोटों की कम छपाई ही नकदी कमी की एक प्रमुख वजह है?
 
मैं एक उदाहरण दे रहा हूं, मान लीजिए कि मैं वजन कम करने के लिए संतुलित आहार ले रहा हूं और मुझे ज्यादा भोजन की जरूरत नहीं है। मैं अपना वजन इसलिए कम कर रहा हूं क्योंकि मैंने कम भोजन लेना शुरू कर दिया है। लेकिन यह तर्क नहीं दिया जा सकता है कि ïकिसी का वजन इस वजह से कम हो रहा है क्योंकि उसको ज्यादा भोजन की 'जरूरत' नहीं है। इसी तरह आप पूंजी के ज्यादा निकाले जाने या फिर लॉजिस्टिक्स मसले को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते जब मुद्रा जरूरत से कम ही मात्रा में उपलब्ध हो। मुद्रा में कमी की वजह से नकदी निकाले जाने की रफ्तार भी घटी, लॉजिस्टिक्स मुद्दे नजर आने लगे जो महज लक्षण हैं। आरबीआई पहले से ही कम नकदी छाप रहा है और यही समस्या है।
 
नोट कमी की समस्या का वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से भी संबंध है?
 
जो लोग जीएसटी के दायरे से नीचे हैं उन सभी छोटे कारोबारियों को भी नकदी का इस्तेमाल करना पड़ता है। हालांकि जीएसटी के तहत निश्चित रूप से कराधान ढांचे में बदलाव किया गया है लेकिन ऐसा कोई डेटा या सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि जीएसटी से नकदी की जरूरत कम हो गई है। जीएसटी के तहत इस तरह के बदलाव को देखा जाना अभी जल्दबाजी ही होगी।
 
आखिर इस तरह की मुश्किल के लिए कौन जिम्मेदार है?
 
मुद्रा प्रबंधन पर आरबीआई को सरकार द्वारा आदेश देना ठीक नहीं है जो काम शीर्ष बैंक के दायरे में आता है। लेकिन हम यह जानते हैं कि नियमों में बदलाव किया गया है और कोई भी पुराना नियम अब कारगर नहीं है। आरबीआई द्वारा प्रेस विज्ञप्ति जारी किए जाने से पहले वित्त मंत्री ने जो बयान दिया उसमें ही असंगति झलकी और इससे अंदाजा मिला कि सरकार और आरबीआई के बीच में ही भ्रम की स्थिति बनी हुई है और इस संस्था पर सरकार का ज्यादा प्रभाव है।
 
क्या आपको लगता है कि बैंकों में लोगों का भरोसा कम हुआ है और वे घर में नकदी रख रहे हैं?
 
इस तरह के रुझानों की पुष्टि करने के लिए कोई आंकड़े मौजूद नहीं हैं लेकिन वास्तविकता यही है कि देश में ज्यादा नकदी की जरूरत है और अर्थव्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए जरूरी नकदी के लिए आरबीआई प्रमुख तौर पर जिम्मेदार है। डिजिटलीकरण और नकदी की मांग में अचानक तेजी जैसे बहानों के साथ सरकार भले ही आरबीआई की नाकामी पर पर्दा डाले लेकिन इनमें से कोई भी वैध स्पष्टीकरण नहीं है।
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