बिजनेस स्टैंडर्ड - सोने की मांग
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सोने की मांग

संपादकीय /  April 19, 2018

बहुत बड़ी तादाद में भारतीय अक्षय तृतीया को सोना खरीदने के लिए शुभ अवसर मानते हैं। इस सप्ताह अक्षय तृतीया उस समय आई जब सोने की कीमतें पिछले साल की समान अवधि की तुलना में करीब 10 फीसदी ज्यादा थीं। फिलहाल सोने की मांग के बारे में कोई अनुमान लगाना संभव नहीं है। आमतौर पर अक्षय तृतीया के आसपास सोने की मांग ज्यादा होती है। इन दिनों इसकी कीमत ज्यादा है, ग्रामीण मांग के बारे में स्पष्टï कुछ नहीं कहा जा सकता है और नकदी की कमी का भी असर है। यानी कुल मिलाकर सोने की मांग के बारे में कोई स्पष्टï राय देना मुनासिब नहीं। बहरहाल, इस अवसर पर सोने की कीमतें प्रति 10 ग्राम 32,500 रुपये से ज्यादा रहीं। सोने की मांग के बारे में एक सामान्य अनुमान यह है कि इसकी बढ़ी हुई मांग दरअसल वृहद आर्थिक स्थिरता को लेकर चिंता का संकेत है। परंतु जैसा कि रिजर्व बैंक ने वर्ष 2018-19 की पहली दोमाही रिपोर्ट जारी करते हुए कहा, सोने के आयात के हालिया आंकड़ों के मुताबिक देश में सोने की खरीद में काफी तेजी से कमी आई है। 

 
बहरहाल, सालाना दृष्टिïकोण से देखा जाए तो कम आधार से ही सही लेकिन सोने का आयात वर्ष के आरंभ में बहुत तेजी से बढ़ा। क्रेडिट सुइस के नीलकंठ मिश्रा इसी संपादकीय पृष्ठï पर इस बारे में लिख चुके हैं। खुदरा स्तर पर पुन: इकठ्ठïा करने और बढ़ी हुई ग्रामीण मांग के चलते सोने का आयात वर्ष 2017 की तुलना में 67 फीसदी बढ़ा। कुल मिलाकर वर्ष 2017-18 में सोने के आयात का बिल 13 फीसदी बढ़कर 34 अरब डॉलर होने की उम्मीद है। भारत में इसका रिटर्न वैश्विक रिटर्न से एक फीसदी ज्यादा रहा। वर्ष 2017-18 में वैश्विक रिटर्न 6 फीसदी से कुछ ज्यादा था।
 
यह दलील दी जाती है कि सोने और महंगे रत्नों के आयात में इजाफे को पूंजी पलायन के रूप में देखा जाना चाहिए। निश्चित तौर पर अगर रत्न की मांग में हाल के दिनों में अत्यधिक तेजी आई है तो आगे यह दलील भी दी जा सकती है कि फिलहाल लोग उसे सोने की तुलना में अनिश्चितता से बचने के लिए बेहतर विकल्प मान रहे हैं। सोने की मांग और और वृहद आर्थिक अनिश्चितता के बीच का संबंध शायद इतना सीधा नहीं है। हालिया नीतिगत हस्तक्षेप की बात करें तो विश्व स्वर्ण परिषद ने कहा है खरीद में पारदर्शिता, क्षेत्र को धन शोधन निरोधक अधिनियम के दायरे में लाने और वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी को लागू करने से शायद आने वाले वर्ष में सोने की मांग में कमी आए। कई विश्लेषकों को उम्मीद है कि जब तक शेयर बाजार उत्साहित बने रहेंगे, सोने की मांग कमजोर बनी रहेगी। 
 
केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने चालू सप्ताह के दौरान ही इस वर्ष सरकारी स्वर्ण बॉन्ड की पहली खेप जारी की। सरकार को उम्मीद है कि सरकार इस वर्ष अपनी विभिन्न वित्तीय योजनाओं से 50 अरब रुपये की राशि जुटा लेगी। यह राशि पिछले वर्ष के बराबर ही है। हालांकि वर्ष 2015 में इन योजनाओं को जिस उम्मीद से जारी किया गया था ये उन पर खरी नहीं उतर सकीं। इससे यही संकेत मिलता है कि यह दावा सही है कि देश में सोने की मांग केवल इस मूल्यवान धातु से जुड़े रिटर्न को ही नहीं दर्शाती बल्कि यह नियमन और कर दायरे से परे इसके भंडारण मूल्य को भी परिलक्षित करती है। सरकार इस क्षेत्र पर निगरानी बढ़ाने का प्रयास लगातार कर रही है जो अपने आप में स्वागतयोग्य भी है और भविष्य में मांग को सीमित कर सकता है। यह भी एक खुला सवाल है कि पेटीएम जैसे मोबाइल वॉलेट सेवा प्रदाताओं द्वारा चलाई जा रही विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक स्वर्ण खरीद योजनाओं को कितने ग्राहक मिलेंगे।
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