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वैश्विक जीडीपी के 225 प्रतिशत तक पहुंचा वैश्विक कर्ज

बीएस संवाददाता / नई दिल्ली April 19, 2018

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने उभरती और विकसित अर्थव्यवस्थाओं से ऐसी नीतियों से बचने के लिए कहा है जो आर्थिक उतार-चढ़ाव को बढ़ाती हों। ऐसा उसने इनका सार्वजनिक ऋण अपने ऐतिहासिक रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंचने के बाद कहा है। आईएमएफ में राजकोषीय मामले विभाग के निदेशक विटोर गैस्पर ने कहा कि 2016 में वैश्विक ऋण 164 हजार अरब डॉलर की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया। यह वैश्विक जीडीपी के लगभग 225 प्रतिशत के बराबर है।

पिछले दस सालों में अधिकतर ऋण उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के पास है और ऋण में बढ़ोतरी के लिए अधिकतर उभरती अर्थव्यवस्थाएं जिम्मेदार हैं। गैस्पर ने देशों को सुझाव दिया कि बढ़ते जोखिम के बीच समय रहते वे अपनी सार्वजनिक वित्तीय हालत को मजबूत बनाएं। ऋण की वृद्धि में 2007 के बाद से अकेले चीन ने 43 प्रतिशत का योगदान दिया है।

गैस्पर ने एक प्रेसवार्ता में कहा, 'उन्नत और उभरती अर्थव्यवस्थाओं का सार्वजनिक ऋण इस समय ऐतिहासिक ऊंचाइयों पर है। उन्नत अर्थव्यवस्थाओं का ऋण और जीडीपी अनुपात जीडीपी के 105 प्रतिशत से अधिक है। ऐसा स्तर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से अब तक नहीं देखा गया है।'

उन्होंने कहा कि देशों को ऐसी राजकोषीय नीतियों को आगे बढ़ाना चाहिए जो आर्थिक उतार -चढ़ाव और सार्वजनिक ऋण को कम करने को प्रोत्साहन दें। एक सवाल के जवाब में गैस्पर ने कहा कि ऋण का उच्च स्तर विशेषकर जब वह लगातार तेजी से बढ़ रहा हो तो वह वित्तीय स्थिरता के लिए जोखिम लाता है और व्यापक आर्थिक गतिविधियों के लिए घातक होता है। यह उन कारणों में से एक है जिसके चलते हम सरकारों से अब इस बेहतर समय में उनके राजकोषीय बफर के पुनर्निमाण के लिए कह रहे हैं। उन्हें मजबूत सार्वजनिक वित्तीय प्रणाली बनाने के लिए कह रहे हैं ताकि वह कभी भी आ जाने वाले बुरे वक्त के लिए तैयार रहें।

उभरती अर्थव्यवस्थाओं में ऋण का औसत स्तर उनके जीडीपी का 50 प्रतिशत है जिसे भूतकाल में वित्तीय संकट के तौर पर देखा जाता था। वहीं कम आय वाले विकासशील देशों में ऋण और जीडीपी का औसत अनुपात जीडीपी के 44 प्रतिशत के बराबर है।

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