बिजनेस स्टैंडर्ड - मुद्रा की विनिमय दर कौन सी बेहतर!
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मुद्रा की विनिमय दर कौन सी बेहतर!

अजय शाह /  04 18, 2018

उतार-चढ़ाव वाली विनिमय दर के साथ आर्थिक और वित्तीय स्थिरता हासिल करने में ही समझदारी है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय शाह

 
अमेरिका के ट्रेजरी विभाग ने हाल ही में भारत को मुद्रा संबंधी छेड़छाड़ के लिए निगरानी सूची में डाल दिया है। उसके तीन परीक्षणों में से दो एकदम बेमानी हैं लेकिन तीसरी जांच में जरूर कुछ ऐसी बातें हैं जो चिंतित करती हैं। भारत ने सन 2003 और 2007 में डॉ. वाई वी रेड्डïी के कदमों के चलते बाजार आधारित विनिमय दर हासिल करके अहम उपलब्धि हासिल की थी। उसके बाद डॉ. डी सुब्बाराव ने मुद्रा कारोबार से दूरी बरतने का निर्णय लिया। सुधारों से पीछे हटते हुए हम सन 2007 से पहले की स्थिति में चले गए। यह आरबीआई के सांविधिक लक्ष्य यानी मुद्रास्फीति को लक्षित करने से इतर है और देश को अधिक संवेदनशील स्थिति में डालता है। अप्रैल 2018 में जारी अमेरिकी ट्रेजरी ने एक दस्तावेज जारी किया जिसका शीर्षक है- अमेरिका के प्रमुख कारोबारी साझेदार देशों की वृहद आर्थिक और विदेश विनिमय नीतियां। इसमें पहली बार भारत का उल्लेख आया। इस दस्तावेज में अमेरिकी ट्रेजरी के अन्य देशों द्वारा मुद्रा के साथ छेड़छाड़ पर नजर रखने की बात सन 1988 और 2015 के विधान से शामिल है। इसमें तीन तरह के परीक्षण शामिल हैं। 
 
पहला परीक्षण- अमेरिका के साथ एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार अधिशेष जो विश्लेषण के आधार पर गलत है। किसी देश की आर्थिक नीति का आकलन उसकी समग्रता में किया जाना चाहिए। भारत के लिए एक बात हमेशा से संभव थी और वह यह कि वह सऊदी अरब के साथ भारी घाटे और अमेरिका के साथ भारी अधिशेष पर कारोबार कर रहा है।   दूसरा परीक्षण- चालू खाते के घाटे का अधिशेष भी विश्लेषण के मोर्चे पर गलत है। मौजूदा चालू खाता नीति अधिशेष कुछ और नहीं बल्कि निवेश और बचत के बीच का अंतर है। जब देश में निवेश में गिरावट आती है तो इसी बचत को चालू खाते के अधिशेष के रूप में चित्रित किया जाता है। दुनिया के तमाम देशों में हालात में बदलाव के साथ ही निवेश को स्थानांतरित करना चाहिए। इसका परिणाम बड़े घाटे के रूप में सामने आता है। अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजार को चाहिए कि पूंजी अधिशेष वाले देशों से पूंजी को बेहतर निवेश वाले देशों में ले जाए। दुनिया में बेहतर परिस्थिति वही होती है जहां कुछ देशों का चालू खाते का घाटा अच्छा खासा हो जबकि अन्य में चालू खाते के अधिशेष की स्थिति हो। 
 
तीसरा परीक्षण खासा रोचक है। अमेरिकी ट्रेजरी व्यापक मौद्रिक कारोबार और एकतरफा मौद्रिक हस्तक्षेप पर नजर रखता है। भारत इन मानकों का उल्लंघन करता हुआ प्रतीत होता है। डॉ. रेड्डïी ने मौद्रिक कारोबार को लेकर जो भी बदलाव किए थे उनके बाद डॉ. सुब्बाराव ने मुद्रा बाजार को लेकर कोई कदम नहीं उठाने की नीति अपनाई। आरबीआई ने मोटे तौर पर मुद्रा बाजार से दूरी बना ली और विनिमय दर का निर्धारण आपूर्ति और मांग के आधार पर होने लगा। परंतु बाद के वर्षों में यह लाभ बरकरार नहीं रह गया। दुर्भाग्यवश हम इसे गंवा बैठे। अब हम सन 2003-2007 के दरमियान की स्थिति में लौट चुके हैं। 
 
सवाल यह उठता है कि ऐसी विनिमय दर जरूरी क्यों है जो बाजार के हालात के मद्देनजर बदलती रहे? पहला मसला तो झटकों से निपटने का है। जब समय अच्छा होता है तो पूंजी देश में आती है और अगर हम विनिमय दर को बढऩे देंगे तो इससे पूंजी की उछाल में स्थिरता आएगी। परंतु जब समय खराब होता है तो पूंजी देश से बाहर जाने लगती है। उस स्थिति में अगर हम विनिमय दर को बिगडऩे देंगे तो इससे भी दिक्कत हो सकती है। विनिमय दर का लचीलापन वृहद आर्थिक उतार-चढ़ाव से निपटने में मदद करता है।
 
जब विनिमय दर में लचीलापन होता है तो सीमा पार गतिविधियों के निजी मुद्रा के जोखिम प्रबंधन से मिल जाने की संभावना रहती है। जब आरबीआई मुद्रा के जोखिम के प्रबंधन का काम करता है तो यह उन लोगों के लिए मुफ्त प्रबंधन होता है जो मुद्रा के जोखिम को बिना हेजिंग के छोडऩा चाहते हैं। परंतु मुद्रा कारोबार में बड़ा विचलन आता ही है और यह उन पक्षों को कहीं अधिक नुकसान पहुंचाता है जो इसके लिए तैयार नहीं होते। इसलिए एक स्थिर विनिमय दर लोगों को आश्वस्त करती है और तब बड़े कदम से होने वाला नुकसान भी खासा बड़ा होता है। ऐसे में बेहतर यही है कि विनिमय दर में तमाम छोटे-छोटे बदलाव आएं। यानी विनिमय दर में हर समय उतार-चढ़ाव आता रहे। 
 
तीसरे मसले का संबंध केंद्रीय बैंक के लक्ष्य से है। बहुत संभव है कि केंद्रीय बैंक को अमेरिकी डॉलर की तुलना में स्थिर विनिमय दर का लक्ष्य देना संभव है। उदाहरण के लिए हॉन्गकॉन्ग ऐसा कर चुका है। परंतु इसके परिणामस्वरूप केंद्रीय बैंक घरेलू मौद्रिक परिस्थितियों पर अपना नियंत्रण खो देता है। भारत ने एक अलग रास्ता चुना जो कि उचित ही है: वर्ष 2015 के बाद से आरबीआई ने 4 फीसदी की खुदरा महंगाई का औपचारिक लक्ष्य तय किया। एक बार यह लक्ष्य तय हो जाने के बाद (पहले समझौता फिर कानून), आरबीआई का ध्यान घरेलू मौद्रिक परिस्थितियों पर हो जाता है। खरीदारी या डॉलर का अर्थ है स्थानीय मुद्रा बाजार में रुपया डालना या निकालना। यह स्थानीय मौद्रिक हालात में हस्तक्षेप होता है। विनिमय दर प्रबंधन घरेलू मौद्रिक नीति के साथ टकराव में रहता है। 
 
आरबीआई के मुद्रास्फीति को निशाना बनाने में सबसे बड़ी समस्या यह है कि आज की तरह मौद्रिक नीति काफी हद तक निष्प्रभावी है। विनिमय दर का लचीलापन आरबीआई की क्षमताओं में इजाफा करता है। जब मौद्रिक नीति समिति दरों में इजाफा करती है तो तो देश में और अधिक पूंजी आएगी, लचीली विनिमय दर बढ़ेगी जिससे वस्तु व्यापार सस्ता होगा और मुद्रास्फीति में कमी आएगी।  भारतीय अर्थव्यवस्था और विश्व अर्थव्यवस्था कई तरह के भूराजनैतिक और आर्थिक जोखिम से दो चार हैं। निश्चित तौर पर इसके बाद एक और बुरा दौर आएगा। उन हालात में रुपये के अवमूल्यन से संघर्ष करना कहीं अधिक कष्टïप्रद हो सकता है। उदाहरण के लिए वर्ष 2013 में कमजोर रुपये की एक छोटी सी समस्या नीतिगत गलतियों के चलते एक बड़ी समस्या में तब्दील हो गई थी। भारत ने रुपये के अवमूल्यन से निपटने के लिए अल्पावधि की ब्याज दर 440 आधार अंक बढ़ाने का निर्णय किया। इसके अलावा भी कई कठोर कदम उठाए गए। इन उपायों का विनिमय दर पर अपेक्षित असर नहीं पड़ा। बल्कि इससे अर्थव्यवस्था को अत्यंत बुरा झटका लगा। वर्ष 2003-2007 जैसी परिस्थितियों में वैसे ही जोखिम का शिकार हो जाने की आशंका है। जबकि उन हालात ने ही रेड्डïी और सुब्बाराव को सुधारों के लिए प्रेरित किया।  एक ऐसी विनिमय दर जिसमें किसी तरह का उतार-चढ़ाव न हो वह जेहनी सुकून के लिए ठीक हो सकती है लेकिन समझदारी की बात यही है कि उतार-चढ़ाव भरी विनिमय दर के साथ आर्थिक और वित्तीय स्थिरता हासिल की जाए।
 
Keyword: money, exchange, economy,,
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