बिजनेस स्टैंडर्ड - बैंक बोर्ड के समक्ष प्रतिष्ठा का सवाल
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बैंक बोर्ड के समक्ष प्रतिष्ठा का सवाल

श्यामल मजूमदार /  04 16, 2018

आम धारणा है कि निजी बैंकों का कॉर्पोरेट संचालन सरकारी बैंकों की तुलना में बेहतर होता है और उनका प्रबंधन पेशेवर होता है। लेकिन बीते कुछ दिनों में इस सोच पर प्रश्नचिह्नï लगा है। इस बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं श्यामल मजूमदार  

 
आमतौर पर यह माना जाता है कि निजी बैंकों का कॉर्पोरेट संचालन सरकारी बैंकों की तुलना में बेहतर होता है, क्योंकि उनके बोर्ड में अधिक योग्य सदस्य होते हैं और उनका प्रबंधन पेशेवर होता है। उनके निवेशकों में भी विविधता होती है जो बेहतर प्रबंधन और जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं।  बहरहाल बीते कुछ दिनों में इस सोच पर प्रश्नचिह्नï लगा है। इसके लिए देश के दो बड़े निजी बैंकों आईसीआईसीआई बैंक और ऐक्सिस बैंक के बोर्ड का आचरण उत्तरदायी है। जब उनके संस्थान संकट में आए तो देश के वित्तीय और औद्योगिक क्षेत्र के दिग्गजों से वाकई में बेहतर व्यवहार अपेक्षित था। 
 
आईसीआईसीआई बैंक की बात करें तो कुछ गड़बडिय़ां हुई हैं लेकिन कुछ भी साबित नहीं हुआ है। इस मामले में केवल आरोप ही सामने हैं। परंतु ये आरोप गंभीर हैं और इनमें बैंक की प्रतिष्ठïा को नुकसान पहुंचाने की क्षमता है। हालात से कहीं अधिक परिपक्व तरीके से निपटा जा सकता था। लेकिन बैंक बोर्ड शायद यह मानता है कि ऐसे मामलों में आक्रामकता ही सर्वश्रेष्ठï बचाव है।  इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर ने उस मामले में चल रही कानाफूसी पर मुहर लगा दी थी। एक दिन बाद ही बोर्ड ने कह दिया था कि बैंक की एमडी और सीईओ चंदा कोछड़ ने कुछ गलत नहीं किया। यह सच हो सकता है लेकिन बोर्ड आक्रामक रुख अपनाने से बच सकता था। बैंक के चेयरमैन ने एक झटके में सारे आरोप खारिज कर दिए और मीडिया में आई खबरों के समय को लेकर सवाल उठाए। 
 
वे यह भूल गए कि षडयंत्र के सिद्घांतों का जिक्र करने से धारणाएं बनाई-बिगाड़ी नहीं जा सकतीं। उदाहरण के लिए किसी को नहीं पता कि बोर्ड ने किस तरह की आंतरिक जांच करके अपना फैसला लिया। अंकेक्षण समिति ने इस मामले पर क्या कहा इस बारे में कुछ नहीं बताया गया।  बोर्ड ने स्वतंत्र बाहरी जांच से इनकार कर दिया जबकि यह नकारात्मक धारणा को रोकने का सबसे बेहतर तरीका था। दरअसल ऐसी जांच तो 2016 में पहली बार आरोप सामने आने पर ही शुरू कर दी जानी चाहिए थी।
 
रेटिंग एजेंसी फिच का यह कहना सही है कि ऋण देने वाली समिति में सीईओ की मौजूदगी और बैंक की स्वतंत्र जांच करने की अनिच्छा ने बैंक के कॉर्पोरेट संचालन की मजबूती को लेकर संदेह उत्पन्न कर दिए हैं।  इससे केवल निवेशक ही परेशान नहीं हैं बल्कि बैंक को अपने कर्मचारियों को भी जवाब देना होगा। इस घटना ने बैंक की छवि और हितों के टकराव तथा उसके मूल्यों पर असर डाला है।  ऐक्सिस बैंक के बोर्ड की हालत भी बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। यह अच्छी बात है कि बोर्ड ने जून 2009 में बतौर सीईओ शिखा शर्मा के प्रवेश के बाद से ही उनका मजबूती से बचाव किया है। तत्कालीन चेयरमैन पीजे नायक ने खुलकर उनकी उम्मीदवारी का विरोध किया था। 
 
बोर्ड ने उनके नेतृत्व में पूरा भरोसा जताते हुए जुलाई 2018 से 2021 तक उन्हें चौथी बार तीन साल का कार्यकाल सौंपने की बात कही। बल्कि एक साल पहले जुलाई 2017 में ही इस संबंध में घोषणा कर दी गई थी। हालांकि वह खुद ही इसकी इच्छुक नहीं थीं लेकिन उन्होंने बोर्ड को खुद पर दबाव बनाने दिया।  हालांकि आरबीआई द्वारा उनके प्रदर्शन पर सवाल उठाने के बाद उसी बोर्ड ने पद छोडऩे के उनके अनुरोध को स्वीकार कर लिया। क्या बोर्ड के इस फैसले पर सवाल नहीं बनते कि अचानक उसे उनकी क्षमताओं पर भरोसा क्यों न रहा? ऐक्सिस बैंक के अंशधारकों को यह अधिकार है कि इस बोर्ड और आरबीआई द्वारा सीईओ के प्रदर्शन के आकलन में इस अंतर की वजह जान सकें? अगर बैंक बोर्ड को उन पर इतना भरोसा था तो उसे कारण प्रस्तुत करने चाहिए थे। 
 
शिखा शर्मा का प्रदर्शन हाल के वर्षों में खास नहीं रहा है। बैंक के फंसे हुए कर्ज में मार्च 2015 से 2017 के बीच पांच गुना इजाफा हुआ। हाल ही में रिजर्व बैंक ने बैंक को फंसे कर्ज की गलत जानकारी देने के लिए दंडित भी किया था। वित्त वर्ष 2017 के अंत में बैंक ने 212 अरब रुपये का फंसा हुआ कर्ज घोषित किया था। बहरहाल, आरबीआई ने यह राशि 269 अरब रुपये बताई। यह अंतर 56 करोड़ रुपये का था।  वित्त वर्ष 2016 में ऐक्सिस बैंक ने 94.8 करोड़ रुपये का अंतर दिखाया जो घोषित राशि से 156 प्रतिशत अधिक था। नोटबंदी के दौरान ऐक्सिस बैंक के कर्मचारी कथित तौर पर काले धन को सफेद करते और अवैध रूप से मुद्रा बदलते पाए गए। गत वर्ष भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड ने भी ऐक्सिस बैंक को मूल्य के लिहाज से संवेदनशील वित्तीय जानकारी लीक होने के मामले में जवाबदेही तय करने की खातिर जांच कराने का आदेश दिया था। 
 
अगर बोर्ड यह खुलासा करे कि आरंभ में उसने सीईओ में इस कदर भरोसा क्यों जताया और बाद में अचानक पीछे क्यों हट गया तो इससे किसी का नुकसान नहीं होगा। यहां बाजार नियामक के नए नियम काम आ सकते हैं।  ये नियम बोर्ड को मजबूत बनाने से संबंधित हैं। इनमें एक समय में पदस्थ निदेशकों की तादाद कम करने और बोर्ड स्तरीय समितियों की भूमिका बढ़ाने की बात शामिल है। 
Keyword: bank, loan, debt, RBI,,
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