बिजनेस स्टैंडर्ड - संसद सदस्यों को जिम्मेदार बना सकता है यह उपाय
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, April 25, 2018 12:05 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

संसद सदस्यों को जिम्मेदार बना सकता है यह उपाय

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  April 11, 2018

वर्ष 2018 का बजट सत्र गत सप्ताह समाप्त हो गया। परंतु बीते सात सप्ताह के दौरान सदन की कार्यवाही जिस तरह चली वह बहुत परेशान करने वाला था। बीते 18 सालों में यह बजट सत्र गुणवत्ता के लिहाज से सबसे कमजोर रहा।  मई 2014 में गठित 16वीं लोकसभा के अब तक के कार्यकाल में भी बजट सत्र में लोकसभा का प्रदर्शन सबसे कमजोर रहा। लोकसभा में यह सत्र 29 जनवरी से 6 अप्रैल तक चला। बीच में तीन सप्ताह का छोटा सा अंतराल हुआ था। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक लोकसभा निर्धारित अवधि के केवल 21 फीसदी के बराबर ही संचालित हुई। यह औसत मौजूदा लोकसभा के औसत कामकाज से बहुत कम रहा। इस लोकसभा में औसतन निर्धारित अवधि के 85 फीसदी वक्त तक काम हुआ है। राज्यसभा में औसतन 68 फीसदी से कुछ कम वक्त काम हुआ। लेकिन बजट सत्र में राज्यसभा केवल 27 फीसदी वक्त ही चली।

 
बजट पर चर्चा के मामले में भी यह 18 साल में सबसे कमजोर प्रदर्शन वाला वर्ष रहा। वर्ष 2000 से औसतन लोकसभा में बजट पर 53 घंटे और राज्यसभा में 23 घंटे चर्चा हुई। इस वर्ष लोकसभा में बजट पर 15 घंटे और 18 मिनट चर्चा हुई जबकि राज्यसभा में बमुश्किल 11 घंटे। वित्त विधेयक पर चर्चा और मंजूरी महज चंद मिनटों में निपट गई। विभिन्न मंत्रालयों की अनुमानित 260 खरब रुपये की अनुदान मांग को गिलोटिन (बिना चर्चा एकबारगी मतदान) कर दिया गया। यह अप्रत्याशित था कि वित्त विधेयक समेत तमाम संशोधन बिना किसी चर्चा के पारित हो गए। यह बताता है कि कैसे कानून निर्माण की संसदीय निगरानी कमजोर पड़ी। 
 
यहां तीन स्तरों पर नाकामी हाथ लगी और कोई समस्या को हल करने को तैयार नहीं दिख रहा। संसदीय कार्य मंत्री को यह बताना चाहिए कि क्यों सरकार संसद का सुचारु संचालन सुनिश्चित नहीं कर सकी। यह सरकार की जवाबदेही है। जब 2013-14 का आम बजट भी बिना किसी चर्चा के पारित हुआ था तो उस वक्त विपक्ष में मौजूद भाजपा ने कहा था कि यह कांग्रेसनीत संप्रग सरकार की जवाबदेही थी। कुछ भाजपा नेताओं का कहना था कि वह केवल विपक्षी दल की भूमिका निभा रही है। संसद को बाधित करने की चाहे जो भी वजह हों, सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। इस समय सरकार में भाजपा है तो यह जवाबदेही उसकी है। विपक्ष भी अपने हाथ नहीं झाड़ सकता। संसद को बाधित करने के बजाय उसकी भूमिका भी रचनात्मक विपक्ष की है। कांग्रेस को आत्मावलोकन करना चाहिए कि क्या वह कहीं अधिक बेहतर ढंग से काम कर सकती थी ताकि कम से कम वित्त विधेयक पर चर्चा हो पाती। 
 
तीसरी नाकामी राज्यसभा के सभापति और लोकसभा अध्यक्ष की है। राज्यसभा के सभापति देश के उपराष्ट्रपति भी हैं। सभापति और लोकसभा अध्यक्ष दोनों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर दोनों सदनों में सुचारु कामकाज की परिस्थितियां बनाने का काम करना चाहिए था।  इस गतिरोध से निजात कैसे मिले? सांसदों को अपनी जिम्मेदारी से यूं भागने नहीं दिया जा सकता। उन्हें सरकार के व्यय और कर नीति बदलाव संबंधी प्रस्तावों पर चर्चा और बहस करनी ही चाहिए। यह प्रक्रिया अहम है क्योंकि वित्त विधेयक में ऐसे प्रावधान हैं जो उन कानूनों में बदलाव कर सकते हैं जो सीधे कराधान नीति के दायरे में नहीं आते। सन 1990 के दशक में व्यय प्रस्तावों का आकलन संसद की स्थायी समितियों के साथ बजट में करने की बात कही गई। ये समितियां अपनी रिपोर्ट संसद के समक्ष पेश करतीं और दोनों सदनों के सदस्य इन पर चर्चा करते। इस प्रयोग से यह सुनिश्चित हुआ कि कम से कम व्यय प्रस्तावों का प्राथमिक मूल्यांकन हो। हालांकि बजट मंजूरी प्रक्रिया को गति देने के लिए कुछ प्रस्तावों को फिर भी गिलोटिन किया गया। 
 
संसद की स्थायी समितियों की व्यवस्था वित्त विधेयक के प्रस्तावों पर चर्चा सुनिश्चित नहीं कर सकती। इस वर्ष नए कर प्रस्ताव गठित किए गए थे लेकिन फिर भी वित्त विधेयक पर शायद ही कोई चर्चा हुई। ऐसी स्थिति न तो संसदीय लोकतंत्र के लिए बेहतर है और न ही बिना सुधारात्मक कदमों के इसे जारी रहने देना चाहिए।  अब वक्त आ गया है कि सांसदों को जवाबदेही के ढांचे के अधीन लाया जाए। अगर सांसद, व्यक्तिगत तौर पर या सामूहिक तौर पर वित्त विधेयक को बिना किसी चर्चा के पारित होने देते हैं तो उन्हें जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए और भारतीय समेकित निधि पर फंड के लिए निर्भर हर सरकारी संस्थान को ऐसी संसदीय लापरवाही की कीमत चुकानी चाहिए। याद रहे कि सरकार केवल बजट को संसदीय मंजूरी मिलने के बाद ही सीएफआई से फंड जारी कर सकती है। 
 
एक तरीका यह हो सकता है कि कर प्रस्ताव समेत बजट को तब तक पारित नहीं माना जाए जब तक कि एक निश्चित अवधि तक इन पर चर्चा नहीं हो जाती। चूंकि सन 2000 के बाद से बजट पर लोकसभा में औसतन 53 घंटे चर्चा हुई है इसलिए नया नियम 50 घंटे का हो सकता है। इसी तरह राज्यसभा में 20 घंटे की न्यूनतम चर्चा का प्रावधान हो सकता है क्योंकि सन 2000 से अब तक वहां औसतन 23 घंटे की चर्चा बजट पर हुई है। इसे कारगर बनाने के लिए यह नियम हो कि अगर बजट पारित नहीं हुआ तो सीएफआई से फंड जारी नहीं होगा। अमेरिका के तर्ज पर सरकार का कामकाज ही ठप हो जाएगा। लोगों को पता होना चाहिए कि उनके सांसद कितने गैर जिम्मेदार हो गए हैं। आज बिना बहस के बजट पास करने की उनकी लापरवाही पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अब वक्त आ गया है कि उन्हें बजट पर चर्चा करने के लिए मजबूर किया जाए। अगर वे इससे बचना चाहते हैं तो लोगों को पता चलेगा जब वित्त वर्ष के आखिरी दिन यानी 31 मार्च के बाद शासकीय प्रतिष्ठान ठप हो जाएंगे। ऐसे में उन्हें लोगों की नाराजगी का सामना करना पड़ेगा। शायद यह बात उनको अधिक जिम्मेदार बनाए।
Keyword: budget, session, parliament, narendra modi, development, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या ई-कॉमर्स पर प्रस्तावित नीति होगी कारगर?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.