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एयर कंडीशनर लगाने से नहीं सोच बदलने से बनेगी बात

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  April 09, 2018

फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन एक विज्ञापन में गर्म चाय और गर्म नाश्ता लाने को कहते हैं जबकि उनके मित्र उनसे कहते हैं कि बाहर बहुत गर्मी है और उन्हें कुछ ठंडी चीज चाहिए। अमिताभ ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनका एयर कंडीशनर (एसी) कमरे को एकदम ठंडा कर देगा और वहां मौजूद लोगों को कुछ गर्म लेना होगा ताकि उनका शरीर गर्म रह सके। क्यों? साफ जाहिर है कि यहां मामला आराम का नहीं बल्कि अपना रुतबा या कुछ और प्रदर्शित करने का है। 

 
ऐसा तब है जबकि हम सभी यह जानते हैं कि इस दौर में ऊर्जा की सबसे अधिक खपत प्रशीतक यंत्रों में ही हो रही है। जाहिर है बिजली की मांग और इसी तरह कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम करने के क्रम में प्रशीतक और गर्म करने वाले उपकरणों की काफी अहम भूमिका है। ये जलवायु परिवर्तन के अहम कारक हैं। दिक्कत यह है कि हम अब तक इस बात को समझ नहीं पाए हैं। आखिर इमारतों को किस सहज तापमान के लिहाज से तैयार किया जाना चाहिए? भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा तैयार नैशनल बिल्डिंग कोड देश में इमारतों के डिजाइन का नियमन करता है। यह उनके लिए सहज तापमान का निर्धारण भी करता है। वर्ष 2005 में उसने गैर वातानुकूलित इमारतों के लिए 25-&0 डिग्री सेल्सियस और वातानुकूलित इमारतों के लिए ठंड में 21 से 2& डिग्री सेल्सियस और गर्मियों में 2& से 26 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान निर्धारित किया था। इसे बहुत कम बताया गया था। 
 
बाद में इसमें संशोधन किया गया लेकिन हालात और ज्यादा बुरे हो गए। नई संहिता वर्ष 2016 में सामने आई। इसमें जो फॉर्मूला दिया गया है उसके मुताबिक इमारत का आंतरिक तापमान उसके औसत बाहरी तापमान के आधार पर तय होगा। इसमें इमारतों की प्रकृति में भी इजाफा किया गया। इन्हें स्वाभाविक रूप से हवादार, मिश्रित और केवल वातानुकूलित आदि में बांटा गया। वातानुकूलित इमारतों की भी दो श्रेणियां हैं। जाहिर है इससे कोई नतीजा निकलने के बजाय भ्रम ही फैलना था। मैंने अपने एक सहयोगी से कहा कि अगर बाहर का औसत तापमान 40 डिग्री हो तो संहिता के मुताबिक भीतर क्या तापमान होना चाहिए। पता चला कि बिना एसी की परिस्थितियों में सहज औसत तापमान बढ़कर &4.4 डिग्री सेल्सियस तक हो जाता है जबकि एसी में केवल 25 डिग्री सेल्सियस होता है। यह दलील अपने आप में बड़ी विचित्र और भेदभाव वाली है। यह कथित मॉडल अहमदाबाद स्थित सीईपीटी विश्वविद्यालय के अध्ययन से निकला है और इसका मानना है कि वातानुकूलन एक ऐसा कारक है जो अब मानव जीवन के अभ्यास का हिस्सा बन चुका है। संहिता में कहा गया है, 'जो लोग साल भर वातानुकूलित जगहों पर रहते हैं उन्हें ठंडे तापमान की आदत हो जाती है। ऐसे में अगर तापमान तेजी से बदलता है तो उनकी हालत बहुत जल्दी खराब हो सकती है। इसके विपरीत जो लोग स्वाभाविक रूप से हवादार जगहों पर रहते या काम करते हैं वे तापमान में थोड़े बहुत बदलाव के साथ आसानी से तालमेल बिठा लेते हैं। उन्हें  मौसमी उतार-चढ़ाव की आदत होती है। यह उनके लिए रोज का सिलसिला होता है।'
 
दूसरे शब्दों में कहें तो अमीरों को वातानुकूलक की आदत होती है और वे केवल कम तापमान में ही सहज रहते हैं जबकि गरीब ज्यादा गर्मी बरदाश्त कर लेते हैं क्योंकि उनके शरीर को इसकी आदत होती है। यह भारतीय शैली का समाजवाद है। यह सबके लिए आरामदेह वातावरण और परिस्थितियां तय नहीं करता है। बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहता है कि ऊर्जा की सीमा के चलते सबको और खासतौर पर अमीरों को उ"ा तापमान की आदत डालनी चाहिए। इसके विपरीत हमारी सरकार यह तय करती है कि अमीरों को अधिक ऊर्जा का इस्तेमाल करने का मौका मिले क्योंकि उन्हें  उसमें राहत मिलती है। आश्चर्य नहीं कि अमिताभ ब"ान अमीरी की उसी छवि को मजबूती प्रदान करते हैं। देश की भवन निर्माण संहिता में भी वर्ग भेद नजर आ रहा है। 
 
इसके विपरीत जापान जैसे देश में किसी भी सरकारी इमारत या वाणिज्यिक प्रतिष्ठïान में एयर कंडिशनर का तापमान 28 डिग्री सेल्सियस के नीचे रखा ही नहीं जा सकता। वहां इस मामले में अमीरों और गरीबों के बीच कोई भेदभाव नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि जब बाहर तापमान बहुत ज्यादा होता है और लोग अपने सहज कंफर्ट जोन में नहीं होते हैं तब उन्हें सहज रहने के लिए वैसा पहनावा अपनाना होता है। यानी आप अमीरों को केवल इसलिए ऊर्जा की खपत नहीं करने देते रह सकते क्योंकि उन्हें इसकी आदत है। बहरहाल अगर फिलहाल इस सहजता के आधार पर तापमान निर्धारित करने की बात को छोड़ भी दें तो भी सवाल यह है कि सहजता का अर्थ क्या है? तापमान आधारित सहजता के चार चर हैं- तापमान, आद्र्रता, उष्मा विकिरण और हवा की गतिशीलता। इसके अलावा दो अहम मानवीय चर भी हैं- पहनावा और व्यक्तिगत चयापचय दर। दूसरे शब्दों में कहें तो हम जगह के डिजाइन के आधार पर भी काफी आराम सुनिश्चित कर सकते हैं। ऐसा सूरज की सीधी रोशनी, उष्मा विकिरण से बचा जा सकता है और बेहतर हवादार व्यवस्था सुनिश्चित की जा सकती है। यानी पारंपरिक इमारतों में अपनाए जाने वाले कार्य व्यवहार की ओर वापसी जो बेहतर वास्तु के साथ बने हों। यानी हमें अपनी इमारतों को छ"ो या बालकनी आदि की मदद से सूर्य की सीधी रोशनी से बचाना होगा। इसका यह भी अर्थ हुआ कि हमें अधिक तादाद में वृक्ष लगाने होंगे ताकि गर्मी से अ'छा बचाव हो सके। इसका एक अर्थ यह भी हुआ कि हमें आराम से रहने के लिए कहीं अधिक हवादार व्यवस्था अपनानी होगी। ऐसा करना अपने पंखे को और अधिक तेज करने की तुलना में काफी अधिक महत्त्वपूर्ण है। यह विडंबना ही है कि हमारा पंखा ही हमारे आराम को बढ़ाएगा, न कि हमारा महंगा और अधिक क्षमता वाला नया एसी। जरूरत इस बात की है कि हम गर्मी और नैसर्गिक सहजता को लेकर उस सोच को त्याग दें जो संहिता बनाने वालों में नजर आ रही है। 
Keyword: air conditioner, amitabh, housing,,
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