बिजनेस स्टैंडर्ड - हिंदू मतों के एकीकरण का बदलता समीकरण
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हिंदू मतों के एकीकरण का बदलता समीकरण

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  April 08, 2018

देश के मतदाताओं में मुस्लिमों की तादाद बमुश्किल 15 फीसदी है। वे भाजपा को वोट नहीं देते। यहां तक कि सन 1989 के बाद की राजनीति में जब कांग्रेस हिंदी प्रदेश में अपना वोट बैंक गंवा बैठी तो मुस्लिमों ने भाजपा को दूर रखने के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग (अपिव) में सबसे मजबूत जाति यादवों का साथ देना शुरू कर दिया। यदाकदा वे मायावती के दलितों के साथ भी नजर आए। इस गणित से हताश भाजपा नेताओं ने कहना शुरू कर दिया कि भारत पर शासन कौन करेगा यह मुस्लिम तय करते हैं।

 
सन 2014 में नरेंद्र मोदी ने इसे बदल दिया। उन्होंने राजनीतिक रूप से सही दिखने की सारी प्रतीकात्मकता और पाखंड को त्याग दिया। दलील यह थी कि अगर मुस्लिम भाजपा को वोट नहीं देना चाहते तो मत दें, हमारे पास दूसरे मतदाताओं की भरमार है। उन्होंने साफ कर दिया कि अल्पसंख्यकों को अलग से कुछ नहीं मिलेगा। वे भी सबका साथ, सबका विकास में शामिल थे।  मुस्लिमों ने मोदी को वोट नहीं दिया फिर भी भाजपा को चुनावों में जबरदस्त जीत मिली। उसने लोकसभा में 282 सीट जीतीं जिनमें से एक भी मुस्लिम प्रत्याशी नहीं था। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में एक भी मुस्लिम प्रत्याशी नहीं खड़ा किया जबकि वहां 19 फीसदी मुस्लिम आबादी है। इसके बावजूद उसे प्रदेश में 71 लोकसभा सीटों पर जीत मिली। यह मिथक टूट गया कि मुस्लिम जिसे चाहते हैं वही देश पर राज करता है। भाजपा और खुद मोदी ने मुस्लिम नामों के समायोजन में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। संदेश एकदम साफ था कि आप अगर हमारे लिए वोट नहीं करते तो हम सत्ता में भी आपसे साझेदारी नहीं करेंगे।
 
ऐसा हुआ क्योंकि तमाम हिंदू सामाजिक समूहों में उनकी स्वीकार्यता थी। ये वे समूह हैं जो अब तक भाजपा से दूरी बनाए रखते आए थे या अपनी अलग-अलग जातियों के प्रति वफादार थे। सन 2014 के आम चुनाव में बहुत बड़ी तादाद में गैर यादव पिछड़ा वर्ग भाजपा से जुड़ गया। उन चुनावों में उत्तर प्रदेश में मायावती की बसपा को 80 में से एक भी सीट नहीं मिली। 2017 के विधानसभा में 5 फीसदी से भी कम वोटों के साथ उनकी पार्टी को 400 से अधिक विधानसभा सीटों में से केवल 19 पर जीत मिली। इस आधार पर भी यह माना जा सकता है कि बड़ी तादाद में दलितों ने भी भाजपा की ओर रुख किया। लोकसभा में भाजपा के 282 सांसदों में से 40 दलित हैं जो आरक्षित सीटों से जीते।
 
परंतु बीते कुछ महीनों में देश भर में दलितों की नाराजगी और बढ़ते आक्रोश से नए साल खड़े हुए हैं। इसकी शुरुआत रोहित वेमुला और ऊना से हुई। परंतु जमीन से जुड़े युवा और मुखर दलित नेताओं के उभार, भीमा-कोरेगांव का घटनाक्रम और उसके बाद अनुसूचित जाति जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद हुए विरोध से हालात बदल गए हैं। भाजपा 15 फीसदी मुस्लिमों का परित्याग कर 85 फीसदी हिंदुओं के वोट पर दांव खेल रही थी लेकिन अब यह मुश्किल नजर आ रहा है। अगर दलित नाराज हुए तो यह आंकड़ा घटकर 70 फीसदी पर आ जाएगा। उत्तर प्रदेश से पार्टी के तीन दलित सांसदों ने अपनी शिकायत ऊपर पहुंचाई है और उसमें यह संदेश साफ है।
 
सीएसडीएस के सुप्रसिद्ध चुनाव विश्लेषक संजय कुमार ने अगस्त 2016 में डेक्कन क्रॉनिकल में एक लेख में यह पुष्टि की थी कि 2014 में भाजपा को पहले के मुकाबले सबसे अधिक दलित मत मिले थे। उनके मुताबिक बीते कुछ लोकसभा चुनावों का 10-12 फीसदी का यह आंकड़ा बढ़कर सीधे 24 फीसदी हो गया। उसने 19 फीसदी वोट वाली कांग्रेस और 14 फीसदी वाली बसपा को पीछे छोड़ दिया था। दलितों की हालिया नाराजगी इस लाभ को छीन सकती है। समाजवादी पार्टी और बसपा के बीच का गठबंधन मामले को और अधिक जटिल बना रहा है। गोरखपुर और फूलपुर चुनावों के नतीजों ने बताया है कि यह गठबंधन किस कदर नुकसान पहुंचा सकता है। एक अहम बात यह भी भी कि चुनाव न लडऩे वाली बसपा अपने वोट स्थानांतरित करने में सक्षम रही। 
 
उत्तर प्रदेश के तीनों शिकायत करने वाले सांसद इस नई असुरक्षा को दर्शाते हैं। वेमुला से भीमा-कोरगांव मामले तक नई तस्वीरें उभर रही हैं। ग्वालियर में एक ऊंची जाति के व्यक्ति द्वारा दलितों पर गोली चलाए जाने की तस्वीर ने इसमें इजाफा ही किया है। सच यह है कि एससी एसटी ऐक्ट को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर सरकार कुछ खास करने की स्थिति में नहीं है। सावधानी से पढऩे पर ऐसा भी नहीं लगता कि कानून को एकदम शिथिल कर दिया गया हो। परंतु इसे लेकर दलितों का देशव्यापी गुस्सा और प्रदर्शन बहुत कुछ कहता है। 
 
प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह इसकी अनदेखी नहीं कर सकते। वे यह मानकर नहीं चल सकते कि 2019 में सब ठीक हो जाएगा। वे 2019 में दलितों के 24 फीसदी मतों को गंवाना नहीं चाहते। पार्टी को कुल मिलाकर 31 फीसदी मत मिले थे और अगर कुल दलितों का एक चौथाई उन्हें दोबारा मत नहीं देता तो उनके लिए अपना मत प्रतिशत बरकरार रखना मुश्किल हो जाएगा। माना जा सकता है कि पार्टी ऊंची जातियों को अधिकतम अपने साथ कर चुकी है। यही वजह है कि आरक्षण पर प्रधानमंत्री ने खुलकर अपनी राय रखी और अमित शाह ने ओडिशा में एक दलित के घर भोजन किया।
 
दलित उभार का ताजा चरण अतीत से अलग है। अब बड़ी तादाद में दलित स्कूल और कॉलेज जा रहे हैं और इंटरनेट आसानी से उपलब्ध है। नई पीढ़ी जागरूक है। उसकी आकांक्षाएं केवल सुरक्षा, भोजन, सर पर छत और पारंपरिक उद्यमों की रक्षा तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया और व्हाट्स ऐप भी दलित युवाओं को तमाम राज्यों तक नेटवर्क मुहैया कराते हैं। जिग्नेेश मेवाणी जैसे युवा और पहली बार विधायक बनने वाले नेता उत्तर, मध्य या पश्चिमी भारत में हर जगह अच्छी खासी भीड़ जुटाने में सक्षम हैं। यह दलित उभार वैचारिक स्तर पर भी पहले से अधिक सशक्त है। यह रुझान वाम के करीब और भाजपा के स्पष्ट विरोध में है।
 
सन 1989 तक भाजपा को लगता था कि वह हिंदू समाज के बंटवारे के कारण जीत नहीं पाती। सबसे पहले लालकृष्ण आडवाणी ने इसे महसूस किया और धर्म के जरिये जातीय बिखराव को समाप्त करने का प्रयास किया। उन्हें काफी हद तक कामयाबी मिली। परंतु जल्दी ही जातीय वफादारी पुन: हावी हो गई। इसीलिए हिंदी हृदय प्रदेश में भाजपा को टुकड़ों में ही सत्ता मिली। कभी भाजपा के बहुमत वाले उत्तर प्रदेश में मायावती और मुलायम सिंह यादव व अखिलेश यादव आठ बार मुख्यमंत्री बने। मायावती और अखिलेश ने तो अपना कार्यकाल पूरा भी किया।
 
मोदी और शाह ने 2014 में जो गणित लगाया वह आडवाणी की तुलना में अधिक सक्षम साबित हुआ। वे मोदी के करिश्मे और अच्छे दिन के वादे के साथ हिंदू राष्ट्रवाद का उभार लाने में सफल रहे। गुजरात में उनके प्रदर्शन के कारण अच्छे दिन का वादा विश्वसनीय लग रहा था। इसकी मदद से भाजपा ने हिंदी प्रदेश में तमाम जातीय गुणा-गणित को विफल कर दिया। अगर पिछड़ा वर्ग और दलित भाजपा को वोट नहीं देते तो इतनी बड़ी जीत संभव नहीं थी। अब यह गणित खतरे में है। जातीय गोलबंदी फिर अपनी जगह बदलती नजर आ रही है। सत्ता विरोधी माहौल, रोजगार की कमी, 15 साल में पहली बार उत्तर प्रदेश में उच्चवर्ण के मुख्यमंत्री का उदय, इन सबने मिलकर जाति को महत्त्वपूर्ण बना दिया है। भाजपा इसे बहुत जल्दी समझ गई। मोदी और शाह बोल तो रहे हैं लेकिन उनकी तीन समस्याएं हैं। उनके पास कोई बड़ी और विश्वसनीय दलित छवि नहीं है। दूसरा, अतीत में भाजपा मोदी और शिवराज सिंह चौहान जैसे बड़े पिछड़ा नेता तैयार करने में कामयाब रही है लेकिन 2014 के बाद केवल उच्च वर्ग का ही उभार नजर आ रहा है। खासकर उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में। तीसरा, उनकी पार्टी और खुफिया तंत्र दलितों की बढ़ती हताशा को समय पर समझ पाने में नाकाम रही। बहरहाल, अब पार्टी इसे समझ चुकी है तो देखना होगा कि 2019 के आम चुनाव तक वह कितना नुकसान होने से बचा पाती है।
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