बिजनेस स्टैंडर्ड - भारत के कमजोर प्रदर्शन की क्या है वजह?
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भारत के कमजोर प्रदर्शन की क्या है वजह?

आकाश प्रकाश /  April 06, 2018

एक बार हम मौजूदा अनिश्चितताओं से निजात पा जाएं तो निवेशक भारत का रुख करेंगे क्योंकि भारत में लंबी अवधि के दौरान बेहतर वृद्धि की संभावना है। विस्तार से बता रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के मन में भारत को लेकर मोहभंग की सी स्थिति निर्मित होती जा रही है। बीते साल ज्यादातर वक्त वे बिकवाली करते रहे और भारत का प्रदर्शन भी तमाम उभरते बाजारों के बीच अब तक कमजोर बना हुआ है। इस वर्ष एशियाई बाजारों में केवल ऑस्ट्रेलिया में ही भारत से अधिक गिरावट आई। अन्य बड़े उभरते बाजारों में भारत सबसे निचले स्तर पर रहा। देश के कई लुभावने माने जाने वाले मिड कैप शेयर 20-25 फीसदी तक गिर गए। डॉलर के हिसाब से इनमें 10 फीसदी तक की गिरावट आई। कई निवेशकों के पोर्टफोलियो साल दर साल आधार पर गिरावट पर हैं। 
 
बाजारों का प्रदर्शन कमजोर क्यों हो रहा है? निवेशक किन बातों को लेकर चिंतित हैं? विदेशी निवेशक पीएनबी धोखाधड़ी और बैकिंग प्रणाली की दिक्कतों को लेकर चिंतित हैं। यह सब कब समाप्त होगा? फंसे हुए कर्ज में इजाफा कब खत्म होगा। किसी बैंकिंग तंत्र में उसके कॉर्पोरेट ऋण का 20-25 फीसदी फंसे हुए कर्ज में कैसे बदल सकता है जबकि मंदी भी न हो। बुरे से बुरे दौर में भी भारतीय अर्थव्यवस्था कभी 5 फीसदी से नीचे की दर से नहीं विकसित हुई। देश में एनपीए यानी फंसे कर्ज का सही आंकड़ा क्या होना चाहिए? ठीक उस वक्त जब हमें लग रहा था कि सरकार 32 अरब डॉलर की योजना के साथ इस समस्या से निपटने जा रही है तभी पता चला कि हमें इससे कहीं अधिक धनराशि की आवश्यकता है। एनपीए के बड़े मामलों के निपटारे में भी देरी हो रही है। एस्सार स्टील को एनपीए निस्तारण का चेहरा माना जा रहा था। माना जा रहा था कि इसके आधार पर ही निवेशक राजनीतिक इच्छाशक्ति का आकलन करेंगे। वह विवादित नजर आ रहा है। अगर यह परिसंपत्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रवर्तकों के पास चली जाती है तो आईबीसी सुधार पर सवाल खड़े होंगे। परिसंपत्ति की पहचान और प्रोविजनिंग के नए आरबीआई मानकों के आगमन के बाद बैंकों की बैलेंस शीट को फिर से झटका लगा। अधिकांश बैंक दोबारा घाटा दिखाएंगे और आने वाली तिमाहियों में भारी भरकम प्रोविजनिंग दिखाएंगे। एनपीए निवेशकों के धैर्य की प्रतीक्षा लेता नजर आ रहा है। बीते करीब पांच साल से हम सुन रहे हैं कि बुरा वक्त बीत चुका है और महज दो तिमाहियों में सब ठीक हो जाएगा। कई निवेशकों का मानना है कि बैंकिंग व्यवस्था और सरकारी बैंकों की दिक्कतें दूर किए बिना अर्थव्यवस्था उच्च वृद्घि दर की ओर वापस नहीं लौट सकती। 
 
आशंका तो यह भी है कि जीएसटी संभावना से कहीं अधिक जटिल हो सकता है। जटिलता के साथ दुरुपयोग भी आएगा और यह आशंका पैदा हो जाएगी कि कर संग्रह पर असर पड़े। क्या बहु प्रशंसित सुधार भी निराशा लेकर आएगा? विश्व बैंक ने अपनी हालिया रिपोर्ट में इस सुधार की जटिलता और ऊंची दरों की बात की है। कर वंचना रोकने के ई-वे बिल जैसे उपायों में लगातार देरी हो रही है। इससे हालात और बिगड़ेंगे। जीएसटी एक जरूरी सुधार है लेकिन निवेशक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि इसके लाभ सामने आने में बहुत अधिक समय लग सकता है।
 
वृहद अर्थव्यवस्था में कमजोरी का सिलसिला जारी है। कच्चा तेल 65-70 डॉलर प्रति बैरल पर जा पहुंचा है। यह स्तर अर्थव्यवस्था और राजकोष दोनों को नुकसान पहुंचा सकता है। चुनावों का वक्त आ रहा है और सरकार के राजकोष पर अंकुश न रख पाने की आशंका सर उठा रही है। अधिकांश पर्यवेक्षकों का मानना है कि सरकार राजकोषीय लक्ष्य हासिल करने में चूक जाएगी। बॉन्ड प्रतिफल भी चिंता का संकेत दे रहे हैं। आरबीआई ने 1 अप्रैल, 2018 से औपचारिक रूप से मुद्रास्फीति के लिए 4 फीसदी का लक्ष्य स्वीकार कर लिया है। ऐसे में मौद्रिक रियायत की कोई गुंजाइश अब नजर नहीं आती। आसान नकदी और कम ब्याज दरों का दौर खत्म हो रहा है। अब सवाल है कि दरों में कब और कितना इजाफा किया जाएगा? अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा है लेकिन इसके स्थायित्व पर सवाल है। क्या यह नोटबंदी के खात्मे का आधार प्रभाव है? या फिर अर्थव्यवस्था अपने बुरे दौर से गुजर चुकी है? हमें मौजूदा शेयर कीमतों को बरकरार रखने के लिए दो अंकों में वृद्धि हासिल करनी होगी। कई निवेशक प्रतीक्षा करने का रुख अपनाएंगे। मोदी सरकार के आगमन के वक्त से ही हम आय में सुधार की बात कर रहे हैं 
 
लेकिन निराशा ही हाथ लगी। बीते पांच साल में हर तिमाही में आय के अनुमान कम हुए। निवेशक इसकी भरपाई हमेशा नहीं करेंगे। ताजा चिंता राजनीति से जुड़ी है। निवेशकों को अनिश्चितता पसंद नहीं। कुछ माह पहले तक मोदी सरकार की वापसी तय मानी जा रही थी लेकिन अब यह बात दावे से नहीं कही जा सकती। वैश्विक निवेशकों को अभी किसी वैकल्पिक व्यवस्था में यकीन नहीं लेकिन अनिश्चितता बढऩे से उनका विश्वास भी डगमगाएगा। घरेलू पूंजी की आवक मजबूत बनी हुई है लेकिन कई संस्थागत विदेशी निवेशकों का मानना है कि अभी इस आवक को एक पूर्ण चक्र से गुजरना है। क्या दरें बढऩे पर भी यह आवक जारी रहेगी? कीमतों में अस्थिरता और कई निवेशकों के वक्तव्य बताते हैं कि बीते एक साल में उन्हें कोई प्रतिफल नहीं मिला है। लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ पर लगे कर से भी नुकसान हुआ है। अमेरिका से भारत में निवेश करने वाले अधिकांश दीर्घावधि की पूंजी कर रियायत वाली है। उपरोक्त कर ने उनके प्रतिफल को प्रभावित किया। घरेलू स्तर पर भी उसने प्रतिफल को प्रभावित किया। अगर घरेलू पूंजी की आवक का दौर बदलता है तो बाजार संकट में आ जाएगा।
 
नई तकनीक को लेकर भारत की तैयारी और स्थिति भी संदेह के घेरे में है। चीन जहां नवीकरणीय ऊर्जा, बिजली से चलने वाले वाहन, कृत्रिम बुद्धिमता और विनिर्माण में अव्वल है वहीं भारत पूरे परिदृश्य में कहीं नजर नहीं आता। उपभोक्ता इंटरनेट के क्षेत्र में भी चीन की कंपनियां आगे बढ़ रही हैं। जल्दी ही हमारे इंटरनेट का बड़ा हिस्सा उनके कब्जे में होगा। ये सारी चिंताएं जायज हैं। आने वाले वर्षों में भारत 7 से 8 फीसदी की वृद्धि दर हासिल कर सकता है। आय में सुधार होगा और दो अंकों की वृद्धि देखने को मिलेगी। इस वर्ष के अंत तक वृहद आर्थिक स्थितियों में स्थिरता आएगी और राजनीतिक अनिश्चितता भी कम होगी। बीते पांच साल में क्रमिक वैश्विक वृद्धि में भारत का योगदान करीब 10 फीसदी रहा है। आने वाले दशक में यह 12 फीसदी हो सकता है। हमारी आर्थिक वृद्धि के कारोबारी आय तथा शेयर बाजार के प्रदर्शन में बदलाव की अवस्था चीन से कहीं बेहतर है। एक बार हम मौजूदा अनिश्चितताओं से पार पा जाएं तो निवेशक भारत का रुख करेंगे।
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