बिजनेस स्टैंडर्ड - रक्षा क्षेत्र में सुधारों से ही बढ़ेगी भारत की ताकत
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रक्षा क्षेत्र में सुधारों से ही बढ़ेगी भारत की ताकत

प्रेमवीर दास /  April 04, 2018

भारतीय सेना जब तक अपनी कमियों एवं चुनौतियों को पहचान कर उन्हें दूर नहीं करती है तब तक आधुनिकीकरण को अंजाम नहीं दिया जा सकेगा। बता रहे हैं प्रेमवीर दास

 
सामान्य तौर पर जब सेना के शीर्ष अधिकारी सार्वजनिक मंच पर आते हैं तो वे अपनी बात बड़ी शिद्दत से रखते हैं और मीडिया भी उनकी बात को खूब बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है। ऐसे में नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा का कुछ दिनों पहले एक टेलीविजन चैनल को दिया गया साक्षात्कार सुनना एक सुखद आश्चर्य जैसा था। उस साक्षात्कार में एडमिरल लांबा ने नौसेना के समक्ष चुनौतियों को लेकर खुलकर एवं शालीन तरीके से अपनी बात रखी। एडमिरल लांबा ने छह प्रमुख मुद्दे उठाए। पहला, भारत के सुरक्षा हित बड़ी तेजी से समुद्र की गतिविधियों पर केंद्रित होते जा रहे हैं। दूसरा, दुश्मन की संभावित गतिविधियों के संदर्भ में भारतीय नौसेना मुंबई पर समुद्र के रास्ते 26 नवंबर, 2008 को हुए आतंकी हमले जैसी किसी भी पाकिस्तानी हरकत का फौरन जवाब देने के लिए तैयार है। तीसरा, नौसेना हिंद महासागरीय क्षेत्र में चीनी नौसेना की बढ़ती हलचल पर करीबी निगाह रख रही है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस इलाके में भारतीय नौसेना को बढ़त हासिल है। चौथा, दक्षिण चीन सागर के नजदीक होने और अपनी बड़ी ताकत के बूते चीन को वहां पर कहीं बेहतर स्थिति हासिल है। पांचवां, भारतीय नौसेना ने भारत-प्रशांत क्षेत्र में अपनी तैनाती बढ़ाई है। और छठा, उन्होंने कुछ महत्त्वपूर्ण साजोसामान की खरीद में देरी की बात स्वीकार करते हुए हालात जल्द सुधरने की उम्मीद जताई। अब इन सभी बिंदुओं का हम आलोचनात्मक विश्लेषण करते हैं।
 
यह सही है कि भारत के सुरक्षा हित समुद्री क्षेत्र खासकर हिंद-प्रशांत और हिंद महासागरीय क्षेत्र में तेजी से केंद्रित हो रहे हैं। किसी भी सुरक्षा सम्मेलन या बैठक में अक्सर इन क्षेत्रों से जुड़े मुद्दे हावी रहते हैं। जनवरी में आसियान देशों के नेताओं और हाल में फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैनुअल मैक्रों के साथचर्चाओं में समुद्री सुरक्षा का मसला एजेंडे में सबसे ऊपर रहा था। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ संवाद के दौरान भी यही स्थिति होती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि ये सुरक्षा चिंताएं हमारे बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए किए गए आवंटन में क्यों नहीं प्रदर्शित होती हैं? इसका जवाब यह है कि हम एक समग्र राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति को आकार देने में नाकाम रहे हैं।
 
समुद्र के भीतर पाकिस्तानी नौसेना पर हमारी श्रेष्ठता को साबित करने की जरूरत नहीं है। लेकिन लंबे समुद्री तट पर निगरानी रखना महत्त्वपूर्ण है और नौसेना प्रमुख का यह कथन संतोषजनक है कि एक दशक पहले की तुलना में हालात अब अलग हैं। चीन अधिक विस्तृत चर्चा का हकदार है। हिंद महासागरीय क्षेत्र में चीन का दखल जगजाहिर है लेकिन उसके जहाजों और पनडुब्बियों पर नजर रख पाने की हमारी क्षमता खासी वास्तविक है। इस पक्ष को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है कि दोतरफा समुद्री तटों और दक्षिणी भारत में दर्जनों हवाईपट्टिïयां हैं जहां से समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने के अलावा हवाई हमले भी किए जा सकते हैं। अंडमान निकोबार द्वीपसमूह में मौजूद हवाईपट्टिïयों और आसमान में मौजूद उपग्रहों से भी नजर रखी जा सकती है। इन सभी कारणों से हिंद महासागर के उत्तरी इलाके में भारत की निगरानी क्षमता बढ़ जाती है।
 
ओमान, सेशल्स और फ्रांस जैसे देश इस पहुंच को और बढ़ा सकते हैं। चीन की ऊर्जा आपूर्ति में बाधा डालने की हमारी क्षमता को अब हल्के में नहीं लिया जा सकता है। लिहाजा परिचालन और लॉजिस्टिक स्तर पर चीन को हिंद महासागर में हमारी बराबरी करने में काफी मेहनत करनी होगी। हालांकि यह इस पर भी निर्भर करेगा कि हम इन लाभों को बनाए रखने के लिए अपनी नौसेना में निवेश करना जारी रखें।  हालांकि भारतीय नौसेना की सैन्य स्थिति में कुछ कमियां भी हैं। इनमें सबसे गंभीर बात पनडुब्बियों की कम उपलब्धता है। मझगांव गोदी में बनी पहली स्कॉर्पीन पनडुब्बी को कई साल की देरी के बाद नौसेना के सुपुर्द किया जा सका है। इसके बाद पनडुब्बियों की कुल संख्या एक दर्जन के पार पहुंच गई है। लेकिन इनमें से अधिकतर 20 साल से अधिक पुरानी हैं। कुछ पनडुब्बियों का आधुनिकीकरण किया गया है लेकिन वे हमारी मौजूदा जरूरतों की पूर्ति नहीं कर पाती हैं। स्कॉर्पीन से इतर देखने की योजना अधर में लटकी हुई है। इसके अलावा बहुद्देशीय हेलीकॉप्टरों के विकल्प पर भी तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। नौसेना के लिए खरीद की प्रक्रिया धीमी है और पिछले चार वर्षों में कोई सुधार नहीं दिखा है। हालांकि सैन्य साजोसामान के घरेलू निर्माण मेक इन इंडिया के मामले में नौसेना हमारी सेना के दो अन्य अंगों की तुलना में बेहतर स्थिति में है लेकिन पनडुब्बी के संदर्भ में हालात काफी खराब हैं। नौसेना प्रमुख खुद यह मान चुके हैं कि हमें तत्काल गंवाए गए समय की भरपाई करने की जरूरत है।
 
लेकिन चुनौतियों के मद्देनजर सेना को आधुनिक बनाने के लिए संसाधनों की भी जरूरत है। जरूरत के लिहाज से रक्षा बजट के लिए आवंटन कम होने को लेकर अक्सर चिंता जताई जाती है। लेकिन हम इस हकीकत को नजरअंदाज कर देते हैं कि दूसरी जरूरतों को देखते हुए रक्षा मद में आवंटन को तत्काल बढ़ा देना संभव नहीं है। ऐसे में सशस्त्र सेना के पास अपनी सीमाओं के भीतर काम करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। लिहाजा सेना के अलग क्षेत्रों की जरूरत पर नए सिरे से विचार करने और जवानों की कमी जैसी खामियों को दूर किए जाने तक भारत की जरूरत के लिहाज से आधुनिक सेना नहीं बना सकते हैं। बजट में फिलहाल 15 फीसदी हिस्सा आवंटित है लेकिन उससे नौसेना को कोई खास फायदा नहीं होने वाला है। इसी तरह वायुसेना को भी अधिक संसाधनों की जरूरत है। थलसेना के उप प्रमुख हाल ही में यह कह चुके हैं कि उसके 68 फीसदी साजोसामान 'विंटेजÓ श्रेणी में आ चुके हैं लिहाजा सेना के इस अंग की भी क्षमता बढ़ाने की जरूरत है।
 
पिछले कई दशकों में राजनीतिक नेतृत्व ने सेना को आधुनिक रूप देने की जरूरतों को पूरा करने के बहुत कम प्रयास किए हैं। अक्सर सेनाओं के प्रमुखों पर ही यह जिम्मेदारी डाल दी जाती है। लेकिन इससे बात नहीं बनने वाली है लिहाजा हम आगे भी सेनाओं को संसदीय समितियों के समक्ष अपने संसाधनों की कमी की शिकायत रखते हुए देखते रहेंगे। उच्चतम स्तर पर संकल्पवान कदम उठाने से ही हमारी सुरक्षा चिंताओं की आलोचनात्मक समीक्षा हो सकेगी और फिर सशस्त्र बलों के लिए अधिक व्यवहार्य एवं संतुलित ढांचा तैयार किया जा सकेगा। ऐसा नहीं होने तक यथास्थिति जारी रहेगी और आगे स्थिति और खराब ही होगी। लेकिन देश के घरेलू हालात को देखते हुए ऐसा हो पाना आसान नहीं है।
 
(लेखक नौसेना की पूर्वी कमान के पूर्व कमांडर हैं। वह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के भी सदस्य रहे हैं।)
Keyword: defense, military, navy,,
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